Posts

बचपन वाली पीली पड़ चुकी किताब से

Image
  सच कहा जाता है कि रचनाकार के लिए विषयों की कमी नहीं होती, उसे रुक कर दृश्यों, वस्तुओं और व्यक्तियों को अलग नजरिए से देखना आ जाए । इन्स्टा पर घूमते हुए एक दृश्य पर नज़र टिक गयी । उसका कारण  एक तो मुझे घीचा सिल्क की साड़ी बेहद पसन्द है ।  दूसरे मॉडल की सुंदरता को देखकर उसकी माँ का ख्याल हो आया । और जब माँ-बेटी दोनों याद आने लगीं तो " रिश्ते " नामक शब्द पर आकर विचारों की सुई अटक गई कि इन दोनों माँ-बेटी के बीच रिश्ता कैसा होगा? संबंध का अर्थ मेल या जोड़ होता है। यानी कि किसी एक का किसी दूसरे व्यक्ति के साथ मेल होना या तादात्म...। संबंधी का अर्थ , वह व्यक्ति, जिसके साथ संबंध जोड़ा जाता है या कुदरती तौर पर जुड़ा होता है किन्तु इन दोनों प्रकार के संबंधों में कभी तनाव तो कभी मधुरता का आना-जाना अपरिहार्य माना जाता है। ये बातें श्रुति ज्ञान से प्राप्त की गई हैं।     लेकिन अब जबकि साथ में अपनी बुद्धि की बात सुनी-गुनी तो " रिश्ता " नामक शब्द या तत्व उस व्यक्ति से बड़ा होता है,   महसूस हुआ , जिसके साथ ये जुड़ा होता है।   कितनी बार किसी रिश्ते में बंधे व्यक्...

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन

Image
ये बात सब जानते है कि दिन की वास्तविक संगत सुनहरी और निर्मल है लेकिन ग्रहण हमें करनी होती है , इसलिए उसे अपने अनुसार ढाल लेते हैं। कभी कहते हैं कि आज का दिन बहुत पुरसुकून भरा था और कभी दिन को लताड़ते हुए उसकी इतनी बुराई करते हैं कि समाने आकर अगर वह सुन ले तो कभी लौटकर हमारी ओर देखे तक नहीं।   खैर , आज  सुबह आँख खुलते ही अनायास दिमाग़ में एक अजनबी विचार ने दस्तक दी  और  दिन पार करते हुए भी टटका विचार बराबर मेरे साथ चलता रहा। किसी भी प्रकार से सुबह से शाम तक हर छोटी-छोटी घटनाओं और इच्छाओं में उसका दमन नहीं हो सका। एक छोटा-सा विचार दमदारी से अन्य   विचारों के साथ मन में विहार करता हुआ जीवित बना रहा, और अब देखिये उसी की महिमा कि लिखकर उससे हाथ छुड़ाने बैठ गयी हूँ।   आज न जाने क्यों संसार में जीव के आवागमन पर थोड़ा हटकर  ध्यान अटक गया। जब चिन्तन जीवन-मृत्यु को देखने लगा तो सुने हुए ज्ञान के अनुसार पता चला कि संसार में आवागमन में व्यक्ति द्वारा किए कर्म सूत्रधार की भूमिका अदा करते है। जिस तरह का कर्म जीव करता है ,  उसी के अनुसार इहिलोक-परलोक में फल को प्राप...

रिश्तों की अल्पना

Image
  सहानुभूति ( सिंपैथी) समानानुभूति (एंपैथी) इन दो शब्दों में से मारे मरुवा हम पहले शब्द को बड़ी मुश्किल से जान पाते हैं और इसपर भी हमें नाज़ होता है कि समस्त करुणा का लेन देन हम समझ गए हैं। आत्मसात करने की बात तो अभी कही ही नहीं गई। अब दूसरा शब्द कहता है कि ," बहनी हमरी बात भी कर लेव।" तो इस का दर्द महसूस करते हुए मैंने देखा कि हम इस के पास से होकर नहीं , दूर से भी नहीं गुजरते हैं। तो बताइए रिश्तों की अल्पना सुंदर कैसे बनेगी ? रिश्ते की मर्यादा किसी दो के बीच ही संघनित हो सकती है इसलिए इन दोनों शब्दों का अर्थ भी रिश्ते में बंधे वस्तु या व्यक्ति दोनों को ही समझना होगा। एक बात और कि रिश्ता लघु शब्द नहीं , इसमें प्रकृति से लेकर भूगोल , इतिहास , समाजशास्त्र , पाकशास्त्र सब के सब निहित होते है। इस चिड़िया को जब ध्यान से देखा तो मुझे लगा कि बस ये नन्हा सा जीव पेड़ के साथ अपना रिश्ता लचीला , हरा और खुशबूदार बनाए रखने के लिए , उक्त दोनों शब्दों को बरतते हुए , उसके अर्थ और भाव के साथ तालमेल बैठाती हुई लग रही है। जिंदगी पढ़ो तो कठिन है , समझो तो अबूझ लगती है और आहिस्ता आहिस्ता ...

बुद्ध न होते

Image
  कह देते यदि मन की पीड़ा तो शायद तुम बुद्ध न होते।। *** पूजा अर्चन यज्ञ नेम जप , करते रहते भरम उजागर छोड़ न देते यदि तुम घर को तो शायद तुम शुद्ध न होते।। *** खुद को रखकर धुरी बीच में नाप गए सबके मन आगर अहम मार दफनाते खुद के तो शायद फिर युद्ध न होते।। *** मन कर लेते कबिरा जैसा लोई  जैसा  देह  समर्पण साँस-साँस में जपते सच को तो शायद प्रभु क्रुद्ध न होते।।  ***

फ़िरोजी मफ़लर

Image
सुनो! नवंबर की पीली शामों में तुम अकेले-अकेले घूमने मत जाया करो धूप छलावा है   तुम उसकी गुनगुनी ऊँगली पकड़े चलते रहोगे, वह दाँव दे कर   तुम्हें खिसक जाएगी प्रेमी के साथ   फिर तुम्हें तुम्हारा रास्ता खोजने से भी नहीं मिलेगा सूखे पत्तों में अक्सर पते गुम जाते हैं   ठहरो, हम चलेंगे साथ -साथ पिछले बरस का अधूरा   फ़िरोजी मफ़लर   बुनाई के अंतिम मोड़ पर है।  ***    

ड्राइव ओवर

Image
" गाड़ी को साफ  कब से   नहीं करवाया है ?" कैब में बैठते हुए सविता ने डांटने वाले लहजे से कहा। " मैम , ओटीपी बताइए प्लीज़। " ड्राइवर ने उसे अनसुना करते हुए अपनी कही। "1082,  अब ए.सी. भी चला दो , क्या जान ही लोगे  ?" साड़ी का पल्लू नाक पर रखते हुए सविता फिर बोली। " गाड़ी नॉन ए.सी. है। " ड्राइवर ने रुखाई से कहा। " तुमने कितनी गंदी गाड़ी बुक की है केतन, कुछ पता है तुझे? " सविता ने झुँझलाते हुए बेटे का फोन खड़का दिया। " क्या हुआ मम्मी ? अच्छी नहीं है तो उतर जाओ। दूसरी करवा देता हूँ। " बेटा सामान्य स्वर में ही बोला। " कार्यक्रम में न जाना होता तो जरूर यही करती। खैर छोड़ो। "  गुस्सा निगलते हुए सविता ने पर्स से मास्क निकाल कर नाक तक चढ़ा लिया। गाड़ी की अधखुली चारों खिड़कियाँ धूल , धुँवा , मिट्टी और सड़क के किनारे मुँह खोले कचरे के डिब्बों से उठती बदबू अंदर की ओर धकेलती जा रही थीं। सविता का मन ग्लानि से भरता चला गया। " आपकी गाड़ी नॉन ए.सी. है, ये बात ‘ ऊबर एप ’ पर अपडेट क्यों नहीं की  ? दिमाग खराब करते ह...

मेरी दहलीज़ पर

Image
  भोर का बालपन घुटनों के बल चलकर आया था उस रोज़ मेरी दहलीज़ पर गोखों से झाँकतीं रश्मियाँ ममता की फूटती कोंपलें उसकने लगी थीं मेरी हथेली पर बदलाव की उस घड़ी में छुप गया था चाँद , बादलों की ओट में सांसें ठहर गई थीं हवा की बदल गया था भावों के साथ मेरी देह का रंग मैं कोमल से संवेदनशील और पत्नी से माँ बन गई।   आँचल से लिपटी रातें सीली-सी रहतीं मेरे दिन दौड़ने लगे थे उँगलियाँ बदलने का खेल खेलते पहर वे दिन-रात मापने लगे सूरज का तेज विचारों में भरता मेरा प्रतिबिम्ब अंबर में चमकने लगा नूर निखरता भावनाओं का मैं शीतल चाँदनी-सी झरती रही बदल गया था भावों के साथ मेरी देह का रंग मैं कोमल से संवेदनशील और पत्नी से माँ बन गई।  लेखिका:  अनीता   सैनी  ' दीप्ति ' शब्दों के उपहार से बड़ा और क्या हो सकता है? मेरे बड़े बेटे परीक्षित के जन्मदिन पर अनीता जी ने अपने वयस्त समय से वक्त निकाल कर स्त्री की साझी भावनाओं को कविता का रूप दिया जो एक माँ का मन महका गयी ।  इसके लिए आपका बहुत आभार!