मन के पिंजरे
मन के पिंजरे वर्तमान समय का एक लोकप्रिय विश्वास है कि मनुष्य को सबसे अधिक बाँधने का काम परंपराएँ करती हैं। जैसे ही रूढ़ियों और बंधनों की बात आती है उँगली सबसे पहले परंपरा की ओर उठती है। मानो मानवीय दुखों के पिंजरे बाहर खड़े हों और उनकी चाबियाँ किसी और के हाथ में हों। पर क्या सचमुच ऐसा है? जीवन के अनुभव धीरे-धीरे एक दूसरी बात सिखाते हैं। बहुत से पिंजरे ऐसे होते हैं जिन्हें मनुष्य स्वयं बनाता है। वे पिंजरे लोहे या लकड़ी के नहीं होते। वे हमारी धारणाओं भय पूर्वाग्रहों असुरक्षाओं और अहंकार से बने होते हैं। मनुष्य उन्हें इतना अपना मान लेता है कि उनकी सलाखें दिखनी बंद हो जाती हैं। परंपराएँ निश्चित रूप से प्रश्नों से परे नहीं हैं। उनमें बहुत कुछ ऐसा हो सकता है जिसे बदलने की आवश्यकता हो। समय के साथ हर समाज अपने अनुभवों की समीक्षा करता है। लेकिन यह मान लेना कि जो कुछ पुराना है वह अनिवार्य रूप से बंधन ही है एक सरल निष्कर्ष होगा। जीवन इतनी सरल रेखाओं में नहीं चलता। यदि परंपराएँ केवल पिंजरे होतीं तो मनुष्य पीढ़ियों तक उनसे जुड़ा क्यों रहता? हर परंपर...