मन के पिंजरे

          मन के पिंजरे

वर्तमान समय का एक लोकप्रिय विश्वास है कि मनुष्य को सबसे अधिक बाँधने का काम परंपराएँ करती हैं। जैसे ही रूढ़ियों और बंधनों की बात आती है उँगली सबसे पहले परंपरा की ओर उठती है। मानो मानवीय दुखों के पिंजरे बाहर खड़े हों और उनकी चाबियाँ किसी और के हाथ में हों। पर क्या सचमुच ऐसा है?

जीवन के अनुभव धीरे-धीरे एक दूसरी बात सिखाते हैं। बहुत से पिंजरे ऐसे होते हैं जिन्हें मनुष्य स्वयं बनाता है। वे पिंजरे लोहे या लकड़ी के नहीं होते। वे हमारी धारणाओं भय पूर्वाग्रहों असुरक्षाओं और अहंकार से बने होते हैं। मनुष्य उन्हें इतना अपना मान लेता है कि उनकी सलाखें दिखनी बंद हो जाती हैं।

परंपराएँ निश्चित रूप से प्रश्नों से परे नहीं हैं। उनमें बहुत कुछ ऐसा हो सकता है जिसे बदलने की आवश्यकता हो। समय के साथ हर समाज अपने अनुभवों की समीक्षा करता है। लेकिन यह मान लेना कि जो कुछ पुराना है वह अनिवार्य रूप से बंधन ही है एक सरल निष्कर्ष होगा। जीवन इतनी सरल रेखाओं में नहीं चलता।

यदि परंपराएँ केवल पिंजरे होतीं तो मनुष्य पीढ़ियों तक उनसे जुड़ा क्यों रहता? हर परंपरा में कोई न कोई स्मृति अनुभव संबंध या सामूहिक बुद्धि छिपी होती है। समस्या तब पैदा होती है जब हम परंपरा के जीवित तत्व को छोड़कर केवल उसके जड़ रूप को ढोने लगते हैं। तब वह सहारा नहीं बोझ बन जाती है।

लेकिन यही बात हमारे विचारों और विश्वासों पर भी लागू होती है। जो विचार कभी हमें आगे बढ़ाते थे वे भी समय के साथ बंधन बन सकते हैं। इस संभावना पर हम शायद ही कभी विचार करते हैं। विकास का अर्थ इसलिए केवल तोड़ना नहीं है।

यदि विकास का अर्थ केवल विध्वंस होता तो हर नई पीढ़ी अपने पूर्वजों की सारी उपलब्धियों को नष्ट कर देती। पर ऐसा कभी नहीं हुआ। मनुष्य आगे इसलिए बढ़ पाया क्योंकि उसने सहेजा सँवारा और आगे पहुँचाया। यदि पीढ़ी दर पीढ़ी मिली विरासतों को पूरी तरह छोड़ दिया गया होता तो आज हमारे पास भाषा न होती। स्मृतियाँ सुरक्षित न रखी गई होतीं तो साहित्य न होता। ज्ञान को सहेजा न गया होता तो अनुभवों का संचय भी संभव न होता और विकास की अवधारणा भी अर्थहीन हो जाती।


सच तो यह है कि मनुष्य अनुपयोगी को धीरे-धीरे छोड़ देता है और जो उसके जीवन को सहारा देता है उसे बचाए रखता है। परंपराएँ भी इसी कसौटी से गुजरती हैं। वे केवल इसलिए नहीं टिकतीं कि वे पुरानी हैं बल्कि इसलिए टिकती हैं कि उनमें जीवन के किसी अनुभव किसी आवश्यकता या किसी सामूहिक बुद्धि का अंश मौजूद होता है।

विकसित होने के लिए तोड़ने से अधिक देखने की दृष्टि चाहिए। यह समझ चाहिए कि क्या समय के साथ अप्रासंगिक हो चुका है और क्या अब भी जीवनदायी है। जो अनुपयोगी है उसे छोड़ देना उचित है। जो मनुष्य को समृद्ध करता है उसे सहेजते हुए आगे बढ़ाना भी उतना ही आवश्यक है। विकास का मार्ग अंधे अस्वीकार से नहीं बल्कि समझ और चयन से होकर गुजरता है।

एक पेड़ को देखिए। उसका विकास उसकी जड़ों को काटने से नहीं होता। वह अपनी जड़ों से रस लेकर नई शाखाएँ निकालता है। यदि वह अपने पुराने हिस्सों को पूरी तरह अस्वीकार कर दे तो उसका अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। विकास और विनाश एक ही बात नहीं हैं। विकास में चयन होता है। विवेक होता है। सहेजने की क्षमता होती है।

मनुष्य के भीतर भी यही प्रक्रिया चलती है। हम अक्सर अपने भय को सिद्धांत का नाम दे देते हैं। अपनी असुरक्षा को मूल्य समझ बैठते हैं। अपने पूर्वाग्रहों को सत्य मान लेते हैं। फिर उन्हीं के भीतर कैद होकर शिकायत करते हैं कि हमें किसी और ने बाँध रखा है। जबकि कई बार बंधन बाहर नहीं भीतर होता है। कई बार ये पिंजरे हम पर थोपे नहीं जाते बल्कि हम स्वयं उन्हें चुन लेते हैं।

आत्मबोध आसान नहीं होता। किसी बाहरी शक्ति को दोष देना अपेक्षाकृत सरल लगता है। कठिन काम है अपने भीतर झाँकना और यह स्वीकार करना कि कुछ सलाखें हमने स्वयं खड़ी की हैं। यह स्वीकार जितना ईमानदार होता है उतना ही मुक्तिदायक भी।

शायद परिपक्वता का अर्थ भी यही है कि हम हर चीज़ को दो हिस्सों में बाँटकर न देखें। पुराना और नया। परंपरा और आधुनिकता। बंधन और स्वतंत्रता। जीवन इन सरल विभाजनों से कहीं अधिक जटिल है। कभी-कभी जो हमें बंधन लगता है वही हमें संभाले हुए होता है। और कभी जो हमें स्वतंत्रता प्रतीत होती है वही एक नया पिंजरा बन जाती है।

इसलिए विकसित होना तोड़ना कम और सहेजना अधिक है। यह पहचानना कि क्या छोड़ देना चाहिए और क्या बचाकर रखना चाहिए। यह समझना कि हर विरासत बोझ नहीं होती और हर विद्रोह मुक्ति नहीं देता।

जिस दिन यह बात समझ में आ जाती है उस दिन मनुष्य का संबंध अपने अतीत से भी बदल जाता है और अपने आप से भी। तब वह परंपराओं का अंधानुकरण नहीं करता और उनका अंधा विरोध भी नहीं करता। वह चुनता है। परखता है। समझता है। और शायद वहीं से सच्ची स्वतंत्रता की शुरुआत होती है।

क्योंकि सबसे मजबूत पिंजरे वे नहीं होते जो दुनिया बनाती है बल्कि वे होते हैं जिन्हें हम स्वयं अपने भीतर गढ़ लेते हैं।

उन्हें पहचान लेना ही मुक्ति की पहली सीढ़ी है।

                     लेखिका:  कल्पना मनोरमा 

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