हँसो,जल्दी हँसो

चित्र : अनुप्रिया एहसासों की स्याही से कहानी लिखे तो ठीक , नहीं तो उसे चेज़ करते रहना अब टाइफाइड के लक्षणों से कम नहीं लगने लगा था। कभी-कभी प्रकाशित आकांक्षा मन को जाग्रत करने में चुक जाती है और धुँधले निष्कर्ष व्यक्ति को चलाने में सहायक बन जाते हैं। बहरहाल उस दिन ऑफिस से लौटकर मेरा मन था कि जल्दी सो जाऊँ और सुबह देर तक सोती रहूँ। लेकिन बिस्तर पर पहुँचने के बाद स्मृतियों के चाँद ने पुरज़ोर ज्योत्सना बिखेर दी तो नींद को चाँद के हिंडोले पर छोड़ मैं खिड़की में जा बैठी। धरती के दुःख रात के नीरव बहाव में बहते जा रहे थे और मैं हमदर्द उजाले की तलाश में भटकती जा रही थी। रात के स्याह सन्नाटे में पेडों पर हवा में झूलते पत्तों की खरखराहट और इक्का-दुक्का पंछियों के चहकने से पहर बदलने की आहट ने विचारों से निकालकर मुझे खिड़की के दरमियाँ कर दिया। घड़ी पर नज़र गई तो काँटे रात के डेढ़ बजाते दिखे। क्षितिज पर जिधर मैं देख रही थी लपलापकर एक तारा टूटा और लकीर बनाता हुआ धरती की गोद में आ गिरा। देखते हुए विचार कौंधा। "टूटकर तारे जब ज़मीन पर गिरते ही हैं तो लोग तारे क्यों बन जाते हैं ? क्या गज़ब का कॉ...