सुनो स्त्री!

थरथराता हुआ उजाला उतरा जब आसमान से पेड़ ने साध लिया पहले कंधों पर फिर धीरे से उतार दिया धरती पर जैसे झुनझुना पकड़ा कर सुला देती है पालने में शिशु को पनिहारिन माँ तूफान में कांपते विकल पेड़ों को थाम लेती है पृथ्वी जैसे बरसाती आवारा बूंद को पी लेती है अधचटकी सीप सुनो स्त्री! तुम किसके बल बूते हंसने की हिम्मत जुटाती हो ? न न न बताना मत! मौलिकता का अपहरण हो जायेगा मैंने तो सिर्फ प्रश्न पूछकर तुम्हें , तुम्हारा होना याद दिलाया है जैसे रोटी नहीं बनी है क्या ? पूछकर मां से याद दिला देते थे बाबा मुझे , भूख की उत्तर की मारकता प्रश्न के विस्तार में निहित है तुम्हें चौकन्ना रहना होगा।