नमक की गुड़िया ये नहीं

चित्र : अनुप्रिया " उम्र आधी गुज़र जाने के बाद भी शाम गहराने से पहले मैं दरवाज़े की कड़ी खोल देती हूँ ताकि ऑफ़िस से लौटते हुए पति को बाहर प्रतीक्षा न करनी पड़े। अब आप चाहे तो इसे मेरा डर कह सकते हैं या अपना चैन बेमतलब क्योंकर गमाऊँ वाला रवैया या फिर जो आपका मन , कहें लेकिन मैं करती ऐसा ही हूँ। " विचारों की तहों में उलझे क्रोशिया चलाते हुए मैं दीवार घड़ी पर नज़र दौड़ाती हूँ ,’ आज़ तो छह बजने वाले हुए , दरवाज़ा तो मैंने खोला ही नहीं। मदन यानी मेरे पति कहीं बिफ़र न पड़ें। ’ हाथ में पकड़ा क्रोशिया और धागे की पोनी को बेड पर छोड़ जल्दी से दरवाजे की कड़ी खोल देती हूँ। लौटकर बिस्तर पर फैली चीज़ों को जगह पर सहेज ही पाती हूँ कि मदन साहब सपाट चेहरे के साथ घर में प्रवेश करते हैं। “ अरे! आपके हाथ में ये पोस्टमैन वाला बैग ? क्या डिमोशन कर डाकिया बना दिए गए हो ?” उनका हुलिया देखकर मैं अपने मन के माहौल को खुशनुमा बनाए रखने की ख़ातिर मज़ाकिए लहजे से पूछती हूँ। “ क्या बकवास है ? अपनी कॉलोनी की कुछ किताबें , रजिस्ट्री और पत्रिकाएँ हैं। एक नए ज्वाइनी डाकिए की ड्यूटी इधर ही चल रही है। चलते सम...