रिचुय्ल
निक्कू का बचपन वैसा ही था जैसा कि सभी बच्चों का होता है। भाई के साथ मौज-मस्ती, माँ की लोरी के साथ दूध-भात-रोटी और दोस्तों के साथ खेलना। लेकिन उसका दिमाग़ तेज़ था। इस बात का अंदाजा तब लगया गया जब निक्कू खिलौनों को छोड़ पेन-पेपर की ओर आकर्षित हो गया था । जिस उम्र में बच्चे घोड़ा , हाथी , बंदूक और चोर-सिपाही वाले खेल खेलते हैं , निक्कू बेढंगे ही सही कागज़ों , दीवारों व फर्श पर चित्र उकेरने लगा था। भाई की नोटबुक पर पेन्सिल चलाना पहले तो शैतानी में गिना गया लेकिन प्रयोग के तौर पर उसकी माँ निक्कू को पेपर-पेन्सिल पकड़ाने लगी थी। तिरछी-सीधी रेखाएँ या उलझे हुए गोले बनाने में निक्कू खूब किलकता। उसके इस खेल पर मोहित उसकी माँ को लगने लगा कि बड़ा होकर निक्कू ज़रूर चित्रकार ही बनेगा। उसका एक कारण ये भी था, निक्कू रेखाओं को एक दूसरे के साथ इस तरह जोड़ता कि देखने वाले को पेपर पर किसी न किसी चित्र की शक्ल उभरी हुई दिखती। जब निक्कू थोड़ा बड़ा हुआ तो एक दिन उसका रेखा-स्वांग जलपरी की आकृति लेकर पेपर पर उभरा। माँ ने रबड़ से थोड़ा सुधार दिया! फिर तो निक्कू के पिता भी उस चित्र को जलपरी कहने लग...