इस बार क्वार में

छोटी-छोटी तितलियों वाले दिन खोज लाते हैं भूलीं-सी यादें मेरे मन की बचपन के गाँव में पसरी होगी खुशबू रँधे भात-सी हवा के अन्नमय झौकों के साथ गाँव के इस पार से लेकर उस पार तक बेरी में लगने लगे होंगे फूल मधुमक्खियों के झुण्ड टूटने लगे होंगे बेरी और बबूल के छतनार पेड़ों पर खेत में झुक आईं होंगी रामभोग धान की रुपहली और सुआपंखी बालियाँ बाबा की गोल-गोल आँखों में खिंच गया होगा सालभर की जरूरतों का बड़ा वितान अम्मा के आँगन में फूल पड़ा होगा हरसिंगार मनभर याकि उनके सपनों की बन्द किलियाँ गई रात चुपके से फूलने लगी होंगी हरसिंगार के संग-संग उतरने लगी होगी चाँदनी अम्मा की खटिया पर दबे पाँव बताने उनको " इस बरस होगी तुम्हारी हर साध पूरी" अम्मा हमेशा की तरह मुस्कुराई होगी किन्तु होंठों के भीतर ही भीतर " समय से पहले की हँसी छूंछी होती है" कहती थीं अम्मा हमसे जब हम खिलखिला पड़ते थे तारों के टूटने पर हरी लहरिया की सूती धोती की कोर के नीचे चमकने लगी होगी नारंगी बिंदी शगुनों वाली, भोर के गीले माथे पर ...