भीगती हूँ मैं

भीगती हूँ मैं! बिना बरसात के भी मन की गहराइयों तक आये दिन कभी-कभी लगातार जब देखती हूँ छोटी-छोटी आँखों को झुर्रियों का भार उठाकर दो निवालों का इंतजाम करते चौराहों पर सन्नाटे की आगोश में सिसकते उन बच्चों को देखकर भीगती हूं जिनके विरोध के बावजूद भी दिया जाता है नशा तरह तरह का और जब वे हो जाते हैं आदी नशे के तब तड़पाया जाता उन्हें नशे के लिए नशा देने वाले जानते हैं तड़पन की कीमत नशेड़ी बच्चे करते हैं उस तड़पन में वे सारे काम जिससे हो जाती है शर्मसार इंसानियत मैं भीगती हूँ देखकर खून के उन धब्बों को जो किसी चिड़िया के स्वयं का जीवन बचाने की जद्दोजहद में निकल कर गिरा होगा जमीन पर उसके नाज़ुक परों से सटे शारीर से मैं भीग-भीग जाती हूं हवाई अड्डे पर हाथ हिलाते उन बूढ़े बेबस दम्पत्ति को देेखकर जिनको छोड़कर जा रहा होता है उनका कोई बहुत अपना उनसे दूर हां कभी-कभी भीगती हूँ मैं सावन की सुरमई बरसात में भी लेकिन ऐसा होता है ना के बराबर जब से छोड़ा है हाथ बचपन ने।