तुम्हारे जाने के बाद (श्रद्धांजलि )

माँ मनोरमा जन्म फ़रवरी १९५४ - गमन १३ दिसम्बर २०१४ अगर आज तुम हमारे बीच होतीं , तो हम फरवरी में तुम्हारी छाँछठवीं सालगिरह मना रहे होते। वो भी बिल्कुल नासमझ बचपन को मन में समेटे हुए क्योंकि माँ के रहते इंसान कब बड़ा हुआ है! लेकिन तुम्हारे जाने के बाद ये बातें सब हवा हो गईं। हम अचानक बेमतलब के बड़े हो गए और नादानियाँ छोड़ पतझड़ के ठूँठों में फूल तलाशते-से भटकने लगे। तुम थीं तो तुम्हारे दुनिया से विदा लेने की बात सोचने मात्र से हमारी आँखें भर आती थीं। न जाने कितनी बार बचपन के सपनों में हमने देखा था कि तुम हमें अकेला छोड़कर दुनिया से चली गयीं हो और हम बौराये-से घर-आँगन और खेतों में हूकते-बिलखते फिर रहे हैं। सपना टूटते-टूटते देर हो जाती,तो हमारी देह पसीने-पसीने होकर आँख खुलती और जब तुम्हें अपने साथ सोया देखते तो चैन आ जाता था। सुबह होते ही हम तुमसे पूछते थे कि आख़िर इतने गंदे वाले सपने हमें क्यों आते हैं ? तुम धीरे से हँसते हुए कहती थीं । " हम जिसको जितना ज़्यादा प्यार करते हैं , उतना ही ज़्यादा उसके खोने के सपने हमें डराते रहते हैं ल...