आते तुम घर काश!

चंद्र दूज का सोहना, उगता जब आकाश धरती धुनती माथ तब,आते तुम घर काश!! चांद पकड़ने को उड़े, अलग-अलग दो मित्र मिलकर साधे छोर जो, निखरा पूरा चित्र।। राही उड़ते जा रहे ,थे अपने ही रंग चंद्रहार उद्धृत हुआ, झपटे दोनों संग।। अम्मा आज उदास थीं, चलो मिला उपहार भगनी-भ्राता कर रहे, ममता को साकार।। प्रेमी को प्रेमी मिला, प्रिया हो गई साथ नारंगी नभ पर दिखे, प्रेम पगे-से माथ।। नत नयनन से देखती, घरनी घर की कोर कभी चमती चांद-सी, नचती मैं बन मोर ।। किरणहार जब पहनता, बनता दुल्हा चांद नहीं छिपा रहता पड़ा,कहीं किसी की मांद।। ***