जीवन की आपाधापी में

जीवन की आपाधापी में तुम्हें चैन से देख न पाया ।। किसने रोका किया पढ़े थे किसने मंतुर कौन चढ़ा था घोड़ हुआ था क्यूँ कर आतुर कान खींचते चौमासे में हिस्से सब भींगा ही आया।। दिवस हुए न सगे निशा क्या होती अपनी पाथ-पाथ कर उपले घर की छूटी हफनी कूटी सरसों खलिहानों में लगी भूख , पनझोरा खाया।। दूर खड़ी है खुशी टेरती रहती हर दिन मन गमके , उठे हिलोर चुभे ना दुख का पिन तो चलकर देखें उसे बिहँस जो जग पर छाया ।। **