जीवन के गाढ़े रंग

शारदीय नवरात्रियों के पवित्र दिन चल रहे हैं। इन दिनों हवा भी गंगा स्नानकर चलती है। बेसाख़्ता पौधों पर फूल खिले हुए हैं। मन की खुशी सब ज़ाहिर करते हैं , पंछी भी। गुमसुम दिखने वाले कबूतरों की गोल आँखें भी आजकल कानों की ओर खींची-सी दिखाई पड़ती हैं। मानो वे भी हँसकर पर्यावरण की निर्मलता का जश्न मना रहे हों । चारों ओर हवा में हवन सामग्री की सुगन्ध फैली रहती है। माता के भजन तो नहीं लेकिन ' अम्बे तुम हो जगदम्बे काली , जय दुर्गे खप्पर वाली , तेरे ही गुण गायें भारती , ओ मैया...।" आरती की धुन कभी-कभी हवा की छन्नी से छनकर मेरे कानों तक पहुँच जाती है । मेरी बालकनी में एक कबूतर के जोड़े ने अपनी जचकी फैला रखी है। आते-जाते मैं भी उनकी खुशी में शरीक हो जाती हूँ । नवांकुत के आने की खुशी हम इंसानों को ही हर्ष प्रदान नहीं करती , उन दोनों कबूतरों के चेहरों पर भी साफ़ देखी जा सकती है। औलाद शब्द न जाने अपने भीतर कितनी मिस्री के भाव समेटे होते हैं। बालकनी के कोने में घोंसले पर रखे दो अंडों पर बैठ कर उनको कभी पतली गर्दन , गढ़े रंग वाला कबूतर सेयता है , तो कभी मोटी गर्दन हल्...