मूर्छा

चित्र गूगल से साभार! मेरे गृह सहायकों में दामी तीसरी थी। वह सर्वेन्ट क्वाटर्स से नहीं अपितु बाहर से काम पर आती थी। आश्विन मास की नवरात्रि का पहला दिन था। सेंटर टेबल पर रखे आकर्षक काँच के कटोरे में लाल गुड़हल के फूल लहक कर कमरे में रौनक बिखेर रहे थे। दामी के आने का समय देखकर मैंने गेट की कड़ी पहले से ही खोल दी। दामी समय की पक्की थी सो आ धमकी। जैसे ही उसकी नज़र कटोरे पर पड़ी तो उदास स्वर में वह बोल पड़ी। " मैम साब! ये फूल सुबा से बहुत ढूंढ़ा , नहीं मिला। आप को काँ से मिला ?" " नहीं पता, सुबह जगदीश लाया। क्यों तूने फूल ढूंढा? " मैंने उसकी ही टोन में बोला। "मातारानी को चढ़ाने के बास्ते मेम साब!" जगदीश मेरे घर का रसोईया था। उसने अपना नाम मेरे मुँह से सुना तो दौड़ा-दौड़ा ड्राइंग रूम में भागा चला आया। "यस मेम! आपने बुलाया मुझे?" मैं कुछ कहती उसके पहले दामी को आया देखकर वह खुद बोल पड़ा! " दामी, चाय पियेगी क्या ? मैं बना रहा हूँ । " उसका इतना कहना ही था कि दामी ने अपनी त्योरियाँ चढ़ा लीं । और तांमियाँ सींक-सलाई हाथ नचाते हुए उसपर खिसिया कर बरस पड़ी।...