“सब्जी की दुकान है या चौराहा? कमला झोला लेकर ज़रा मेरे आगे-आगे तो चलना।” मैंने अपनी गृह सहायिका को बोला ही था कि एक सज्जन ने घूरते हुए कहा,“मैडम सुना नहीं आपने,अपना काम अब खुद करने की आदत डाल लीजिए।” “क्यों भई ?” मैंने उनसे पूछा। “कोरोना जी का आदेश है की अपना काम स्वयं करो,नहीं तो मरो।” कहते हुए सज्जन ने ठठा कर हँस दिया। बेवक्त की हँसी ने मेरे मन को झुंझलाहट से भर दिया था। “वैसे आपको बता दूँ कमला मेरे परिवार की सदस्य है।” सज्जन की ओर घूरते हुए कहा। “कमली तू बता न! घर में कौन-सी सब्ज़ी की जरूरत है ? लोगों को आदत होती हैटांग...।” मैंने बुदबुदाकर मन को शांत किया। ”आप ही देख लो जिज्जी जो आप को अच्छा लगे उसी की जरूरत बन जाएगी।” कमला स्लेटी मसूड़े दिखाते हुए हँस दी। “अच्छा, तू मेरा मजाक बना रही है?” “राम राम जिज्जी आपकी मजाक,मेरी जुबान ही कट जाए।” “अच्छा ठीक है, बातें मत बना, झोला ठीक से पकड़।” “सब्ज़ी खरीदने का काम तुझे ही मुबारक हो कमली।” “जिज्जी आप बाहर चली जाओ, मैं ख़रीद लेती हूँ।” कमला को शायद मेरे ऊपर तरस आ रहा था। “कोई बात नहीं आज तो मैं ही।” मैंने उससे ...