यथार्थ बोध एंव नारी संवेदनाओं का कलात्मक पक्ष

संवेदनाओं का कलात्मक पक्ष ( विशेष संदर्भ -बॉस भर टोकरी ) कल्पना मनोरमा आज के स्त्री लेखन विशेष कर हिंदी कविता की विस्तृत दुनिया में अपना एक कोना सुरक्षित कर चुकी हैं. जहाँ अधिकतर कविताएँ यथार्थ की पथरीली जमीन को तोड़ने के दावे के साथ उसे वैसे ही ऊसर छोड़ आगे बढ़ जाती हैं , वहीँ कल्पना की ज्यादातर कविताएँ उसी सख्त , ऊसर जमीन पर अपनी कल्पना के ही नहीं यथार्थ के कड़वे बीज को जो इस समाज ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी आधी आबादी को सौपें थे , उसे उन्होंने संस्कारों की मिट्टी में अपनी संवेदनाओं की नमी के साथ रोप दिया है. शब्द दर शब्द आज वही मेहनत अपनी सुगंधि से साहित्य संसार को तो सुवासित कर ही रही है , उन्होंने उसको ही संस्कार व् संस्कृति के रूप में संजो कर ‘ बांस भर टोकरी ’ में संकलित कर पुनः इसी समाज को लौटा दिया हैं. धरती ने कब बीज को अपनी छाती में छिपा कर रखा है ? वह तो उसे अपने को उलीच कर दे देती है. इसीलिए उसे पुनर्नवा कहा जाता है. ये कविताएँ भी उसी तरह कि हैं , इनसे गुजरते हुए आपको यह एहसास बराबर होता चलेगा कि कुछ भी समतल नहीं , यथार्थ की खुरदरी जमीन से अपने अच्छे-बुरे अनुभवों से बराबर संवाद कर...