मुगल शहजादी

संसार का सातवां अजूबा ताजमहल अब नहीं रहेगा शामिल अजूबों में महल के कई कक्षों में विराजेगें भोले नाथ कहा सुनी गहमा गहमी धूम धड़ाम मचल उठी है कोर्ट कचहरियों में मगर मुमताज़ सोई है स्पर्धा रहित शाहजहां के बगल में शून्य हो चुकी दो दृष्टियों में ताजमहल बना रहेगा हमेशा मक़बरा ही शिव और शिवाला की लड़ाई में प्रतिभाग करने से कर दिया इनकार मुगल शहजादी ने किंतु मज़हब के अलावों में दहकेगी जोश की आंच जब झुलसाने लगेगी आँच राहगीरों को तब चिंगारी भड़काने वाले दुबक जायेगें अपने अपने उगाए धार्मिक दरख्तों के पीछे भावनात्मकता से भरे कच्चे घड़े फूटेंगे दहकती भयानक धार्मिकता में जो घड़े होंगे थोड़े जिद्दी वे चटकाए जाएंगे रिसेगा उनसे गर्म लहू मगर वे भी उसे पोंछेंगे नहीं फिर जिद्दी मटके फोड़े जायेंगे सरेशाम चौराहों पर मुमताज़ की कब्र में नहीं होगी फिर भी कोई हलचल न ही उन जीवित मटकों में जो जानते हैं दीपक का कोई मज़हब नहीं होता उजाला परोसना उसकी नियति होती है। ***