टुकड़ा भर आराम

क्षणिक मौत है नींद जिसे सहजता से प्रतिदिन ग्रहण किया जाता है सोने वाला जिस वक्त में मरा होता है उसी वक्त में वह लोगों के विश्वास में जिंदा होता है जबकि जिंदा रहकर वह लोगों के जेहन में मरा होता है नींद में उम्र की डोर थामकर साँसें बैठती हैं करने वाला बिना एहसास किए साँसें जाया करता है तो क्या साँसें आत्मा का वायु रूप है ? यदि हैं तो सपनों का देश कहाँ है ? कहाँ से चलकर सपने रोज़ व्यवधान उत्पन्न करने आते हैं जो बेहद टटके और जीवंत लगते हैं क्या जीवन बस मौत की कहानी लिखता है ? क्या मौत के हाथ जीवन का उदय होता है ? क्या सपने अपने ही कार्यों के शिलालेख होते हैं ? सारे प्रश्न सिरहाने रखकर आज रात सोऊँगी सुना है कि प्रश्न कर्ता कभी अनसुना और अनुत्तरित नहीं रहता ? तमाम जटिलताओं के मध्य नींद, टुकड़ा भर आराम है. ****