वस्तुओं की हथेलियों में
हमारी हथेलियों की तरह से ही वस्तुओं की हथेली में समय के दाग़ होते हैं , कुछ अमिट रेखायें और ऋतु चक्र होते हैं। उनका जीवन भी हमारे जीवन से प्रभावित होता है क्योंकि उनकी मुट्ठियों में हमारे जीवन की मिठास और खटास मौन रूप से बन्द पड़ी होती है। जिसे हम काल की चपेट में आकर भले भूल जाते हैं लेकिन वस्तुएँ उन्हें नहीं भूलतीं। समय उनके हृदय से उन बातों को हिलाना चाहता है पर चाहकर भी हिला डुलाकर मिटा नहीं पाता। समय मत्समौला मलंग बनकर अथक बटोही-सा चलता , चलता बस चलता जाता है लेकिन वस्तुयें ऐसे मनमौजी वक्त को भी वैसे ही प्रेम और ममता से अपने अंतर में सहेज लेती हैं , जैसे स्वयं समय अपने हमजोली मौसमों को सहेजता है। दरअसल वस्तुएँ समय से टक्कर लेने का माद्दा रखती हैं। वस्तुओं की एक अपनी ही जुबान होती है। इतिहास उसकी भाषा और व्याकरण को समझता है। क्या इतिहास वस्तुओं का सहयात्री होता है ? इस बात को प्रख्यात इतिहासकार रामचन्द्र गुहा जी अच्छे तरह से जानते होंगे। वस्तुओं को जब ध्यान से देखो तो वे धीरे-धीरे हमारे कानों में कुछ-कुछ फुसफुसाने लगती हैं। हमें उनकी भाषा अगर आती होती तो न जाने वस्तुओं के माध्...