ऋतुपति आवे पाहुना

फागुन जूड़े में लगा , चली बसंती नार ऋतुपति आवे पाहुना , झुक गई मन की डार!! चलो सखी बगिया चलें , लाएं चुन कचनार मदन सजीला आएगा , पहनेगा उर हार।। मन पाखी उड़ता फिरे , खोजे मन का मीत पात पात मिल गा रहा , बासंती मन गीत।। हवा जोगिया बन चली , धूप बनी तलवार सूरज बोला नेह से , ठंड गई उस पार ।। आओ नभ से उतर कर , कामदेव महराज धरती ठिठुरी पड़ी है , साधो इसके काज।।