कागा सब तन खाइयो
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" एक काम बनाने में दूसरा कब बिगड़ जाए , कहा नहीं जा सकता। वैसे ही एक को मनाने में दस रूठ जाएँ और पहले वाला भी न मने तो घाटा पहल करने वाले का ही होगा न ? फिर भी मैं करुँगी । " लवलीन ने नीम पर बैठी चिड़िया से बोला और तार से कपड़े उतारने लगी। पति के साथ वह खुश थी लेकिन नेपथ्य से आते मौन कोहराम उसे जीने नहीं दे रहा था। उसी ठहराव को वह खत्म करना चाहती थी। " क्या एक बहू अपने दोनों घरों में खुशहाली की चाहत नहीं रख सकती ?" लवलीन ने कैलेण्डर में बेटे की सालगिरह वाली तारीख पर गोला लगा दिया। शाम गहरा चुकी थी, कपड़े आयरन टेबल पर टिका उसने झटपट मंदिर में दीपक जला दिया। मिल्क फीडर तैयार कर बेटे को पकड़ाते हुए कुशन के सहारे टिका , रसोई में चली गयी। ट्रिन ट्रिन ट्रिन कॉलबेल बजी और बजती रही। गुड्डू दौड़ सकता तो झट से पापा के लिए दरवाज़ा खोल देता। बहुत देर जब गेट नहीं खुला तो प्राकेत ने मोबाइल पर अपने घर आने की सूचना पत्नी को दी। पसीना पोंछते लवलीन ने दौड़कर गेट खोल दिया। “ आजकल तुम कहाँ खोई-खोई रहती हो लवी ?” “.......” “ अच्छा चलो एक कप गरमागरम चाय बना दो, मैं हाथ मुँह धोकर आया। ...