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Showing posts with the label लेख

गलती और चरित्र एक ही बात नहीं

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            गलती और चरित्र एक ही बात नहीं        बुनियादी चिंतन : बालिका से वामा | स्तंभ 34 जीवन में लिए गए कुछ निर्णय सही सिद्ध होते हैं। कुछ गलत साबित होते हैं। कुछ संबंध टिकते हैं। कुछ टूट जाते हैं। कुछ अवसरों पर हमें संतोष मिलता है। कुछ अवसरों पर लगता है कि शायद हम बेहतर कर सकते थे। जबकि मनुष्य होने का अर्थ ही अपूर्ण होना है। फिर भी स्त्रियाँ अपनी किसी गलती को केवल एक घटना की तरह नहीं देख पातीं। वे उसे अपने व्यक्तित्व से जोड़कर देखने लगती हैं। चूक होने पर वे यह नहीं सोचतीं कि निर्णय गलत था। उन्हें लगने लगता है कि स्वयं उनमें ही कोई कमी है। यहीं से एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठता है। स्त्री की पृष्ठभूमि क्या रही। उसे स्नेह और संस्कार देने वाले हाथ तथा मन कैसे थे? क्योंकि कोई भी भावनात्मक प्रवृत्ति अचानक विकसित नहीं होती। ऐसे में यह समझना आवश्यक है कि इसका कारण केवल सामाजिक प्रशिक्षण है या इसके पीछे मनुष्य की कुछ गहरी भावनात्मक संरचनाएँ भी कार्य करती हैं। मानी हुई बात है कि लड़कियों को बचपन से संबंधों की भाषा निज भाषा से पहले स...

मन के पिंजरे

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          मन के पिंजरे वर्तमान समय का एक लोकप्रिय विश्वास है कि मनुष्य को सबसे अधिक बाँधने का काम परंपराएँ करती हैं। जैसे ही रूढ़ियों और बंधनों की बात आती है उँगली सबसे पहले परंपरा की ओर उठती है। मानो मानवीय दुखों के पिंजरे बाहर खड़े हों और उनकी चाबियाँ किसी और के हाथ में हों। पर क्या सचमुच ऐसा है? जीवन के अनुभव धीरे-धीरे एक दूसरी बात सिखाते हैं। बहुत से पिंजरे ऐसे होते हैं जिन्हें मनुष्य स्वयं बनाता है। वे पिंजरे लोहे या लकड़ी के नहीं होते। वे हमारी धारणाओं भय पूर्वाग्रहों असुरक्षाओं और अहंकार से बने होते हैं। मनुष्य उन्हें इतना अपना मान लेता है कि उनकी सलाखें दिखनी बंद हो जाती हैं। परंपराएँ निश्चित रूप से प्रश्नों से परे नहीं हैं। उनमें बहुत कुछ ऐसा हो सकता है जिसे बदलने की आवश्यकता हो। समय के साथ हर समाज अपने अनुभवों की समीक्षा करता है। लेकिन यह मान लेना कि जो कुछ पुराना है वह अनिवार्य रूप से बंधन ही है एक सरल निष्कर्ष होगा। जीवन इतनी सरल रेखाओं में नहीं चलता। यदि परंपराएँ केवल पिंजरे होतीं तो मनुष्य पीढ़ियों तक उनसे जुड़ा क्यों रहता? हर परंपर...

हाँ और ना के बीच स्त्री का सच

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हाँ और ना के बीच स्त्री का सच मानव सभ्यता की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक संवाद है। संवाद ही रिश्तों, समाज और संस्कृति की नींव बनाता है। किंतु संवाद तभी सार्थक होता है जब उसमें सभी पक्षों को अपनी बात कहने और अपनी इच्छाअभ व्यक्त करने की स्वतंत्रता हो। स्त्री के संदर्भ में यह प्रश्न विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि इतिहास और समाज दोनों ने अनेक बार उसकी आवाज़ को सीमित करने का प्रयास किया है। ऐसे में “हाँ” और “ना” जैसे साधारण प्रतीत होने वाले शब्द स्त्री के जीवन में गहरे अर्थ ग्रहण कर लेते हैं। इन दोनों के बीच उपस्थित संकोच, मौन, दुविधा और दबाव को समझे बिना स्त्री की सहमति को समझना संभव नहीं है। सहमति (Consent) केवल किसी प्रश्न के उत्तर में दिया गया एक शब्द नहीं है। यह व्यक्ति की स्वतंत्र इच्छा, भावनात्मक स्वीकृति और मानसिक सहजता से जुड़ी हुई प्रक्रिया है। मनोविज्ञान बताता है कि यदि किसी व्यक्ति को लगातार अपनी असहमति व्यक्त करने से हतोत्साहित किया जाए, तो वह धीरे-धीरे अपनी वास्तविक भावनाओं को दबाना सीख सकता है। हमारे समाज के अनेक परिवेशों में लड़कियों को आज भी विनम...

जब लेखक ब्रांड बनने लगे

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    आज की जनधारा में आवरण कथा के रूप में लेख     जब लेखक ब्रांड बनने लगे   साहित्य का इतिहास उठाकर देखा जाए तो लेखक कभी केंद्र में नहीं था, उसकी रचना थी। पाठक पुस्तक खोलता था तो वह लेखक के व्यक्तित्व से नहीं, उसके विचारों, उसके अनुभवों और उसकी संवेदनाओं से मिलना चाहता था। बहुत-से पाठकों ने प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, मुक्तिबोध या निर्मल वर्मा को पढ़ा, बिना यह जाने कि वे दिखते कैसे थे। उनकी पहचान उनके शब्द थे, उनका चेहरा नहीं। लेकिन इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक तक आते-आते साहित्य की दुनिया में एक मौन परिवर्तन घटित हुआ। लेखक धीरे-धीरे रचना से बाहर निकलकर स्वयं एक दृश्य उपस्थिति में बदलने लगा। अब केवल पुस्तक का प्रकाशित होना पर्याप्त नहीं रहा, लेखक का दिखाई देना भी आवश्यक हो गया। उसे मंचों पर उपस्थित होना था, सोशल मीडिया पर सक्रिय रहना था, अपने पाठकों से लगातार संवाद करना था और सबसे बढ़कर स्वयं को एक पहचान के रूप में स्थापित करना था। यहीं से लेखक के "ब्रांड" बनने की प्रक्रिया शुरू होती है। पहली दृष्टि में यह परिवर्तन स्वाभाविक लगता है। हर युग अपने ...

कठोरता बनाम कटुता: आलोचना की नैतिक सीमा

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डिजिटल युग में आलोचना के विवेक, भाषा और जिम्मेदारी पर एक पुनर्विचार डिजिटल युग में लेखन और आलोचना के संबंध को नए सिरे से समझने की आवश्यकता है। लेखक और आलोचक के बीच का पारंपरिक द्वैत अब पर्याप्त नहीं रह गया है। अब लेखक केवल प्रकाशन संस्थाओं पर निर्भर नहीं है, बल्कि सीधे पाठक तक पहुँच सकता है। इससे उसकी स्वायत्तता बढ़ी है और उसकी उपस्थिति अधिक स्वतंत्र हुई है। इस परिवर्तन के बावजूद आलोचना की आवश्यकता बनी रहती है, क्योंकि वह रचना को लेखक से अलग करके समझने का प्रयास करती है और उसके अर्थ की परतों को खोलती है। यहाँ आलोचक का दायित्व यह है कि वह व्यक्ति के बजाय कृति पर ध्यान दे और उसे तर्क तथा विवेक के आधार पर पढ़े। इसलिए मूल प्रश्न आलोचना की आवश्यकता का नहीं, बल्कि उसके स्वरूप का है कि वह किस प्रकार की हो। आलोचना का मूल स्वभाव प्रश्न उठाना है। वह सहमति की अपेक्षा नहीं करती, बल्कि असहमति को भी वैध स्थान देती है। किसी रचना को पढ़ते समय आलोचक अपने अनुभव, ज्ञान और कसौटियों के साथ उपस्थित होता है। यह आवश्यक भी है, क्योंकि बिना कसौटी के मूल्यांकन संभव नहीं। पर समस्या तब उत्पन्न होती है ...

मैं शरीर से अधिक हूँ?

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        11.06.2026      मैं शरीर से अधिक हूँ? इन दिनों मृत्यु का ख्याल कुछ ज्यादा आने लगा है। ऐसा नहीं कि मैं मरना चाहती हूँ या जीवन से ऊब गई हूँ। उल्टा, जब जीवन बहुत सुंदर लगता है, तब यह ख्याल और तीखा हो जाता है। ज्यादा बार दिमाग खटखटाता है। सुबह की चाय, पेड़ों पर नई पत्तियाँ, किसी बच्चे की हँसी, किसी अनजान व्यक्ति की सदाशयता, इन सबको देखकर अचानक लगता है कि एक दिन यह सब छूट जाएगा। और तब प्रश्न उठता है कि जो छूट जाएगा, वह क्या है? और जो छूटेगा नहीं, वह क्या है? मैं अपने शरीर को देखती हूँ। यह वही शरीर नहीं है जो बचपन में था। न वह जो युवावस्था में था। समय ने इसमें बहुत कुछ बदल दिया है। लेकिन एक अनुभूति ऐसी है जो आज भी वैसी ही लगती है जैसी वर्षों पहले थी। वही जो देखती है, सोचती है, दुखी होती है, प्रसन्न होती है और प्रश्न पूछती है। तब कभी-कभी मन में आता है कि शायद मैं केवल शरीर नहीं हूँ। यह कोई आध्यात्मिक दावा नहीं है। न ही किसी धर्मग्रंथ से निकला हुआ निष्कर्ष। यह तो बस एक प्रश्न है, जो मृत्यु के विचार के साथ बार-बार मेरी ओर लौट आता है। अरस्तु ...

परिधि के बाहर जीवन,मन और विचार

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           ( 11.06.2026) हमारे जीवन का एक बड़ा हिस्सा गहरे दोहराव से निर्मित होता है। हम बार-बार उन्हीं रास्तों पर चलते हैं, उन्हीं लोगों से मिलते हैं, उन्हीं बातों पर विचार करते हैं और धीरे-धीरे उन्हीं निष्कर्षों के भीतर बसने लगते हैं, जिन्हें कभी हमने सत्य मान लिया था। किसी माने हुए सत्य का खंडन करना अत्यंत कठिन कर्म है। क्योंकि केवल समाज ही परम्पराओं की परिधि में नहीं घूमता, मन भी अपनी परिधियाँ रच लेता है। कुछ शब्द, कुछ व्यक्ति, कुछ घटनाएँ और कुछ भाव ऐसे होते हैं जो निरंतर हमारे भीतर लौटते रहते हैं। प्रातः आँख खुलते ही बासी और जर्जर विचार मन की सतह पर उपस्थित हो जाते हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो मन अपने ही निर्मित, परिचित संसार में पुनः प्रवेश कर गया हो। वहाँ सब कुछ जाना-पहचाना है, वही स्मृतियाँ, वही आशंकाएँ, वही निष्कर्ष। मन अनजाने की अपेक्षा परिचित को अधिक सहज स्वीकार करता है; इसलिए वह बार-बार उन्हीं मानसिक पगडंडियों पर लौटता है, चाहे वे उसे सीमित ही क्यों न कर रही हों। इस प्रकार मनुष्य केवल बाहरी परम्पराओं का नहीं, अपनी आंतरिक आदतों और धार...

लेखन की तैयारी या सहजता की खोज

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किसी भी रचनाकार के लिए सबसे कठिन क्षण शायद वही होता होगा, जब वह तय कर लेता होगा कि आज उसे कुछ अद्भुत लिखना है। मेरे लिए भी ये क्षण कठिन से कठिनतम हो जाते हैं। क्योंकि जिस वक्त रचनात्मकता को धैर्य की ज़रूरत होती है, उसी क्षण अधीरता अपना खेल शुरू कर देती है। शब्द ठोस हो जाते हैं, विचार जुगनुओं की तरह जलते-बुझते हैं, और सामने रखे कागज़ मुझे देखते रह जाते हैं कि उन पर मन की इबारत उतरे। मैं खुद को ज़्यादा समय इसी स्थिति में पाती हूँ। इससे उबर भी जाएँ, लेकिन सुनी-सुनाई बातों पर मन अमल कर लेता है कि लेखन एक साधना है। इसलिए उसे साधने के लिए विधि-विधान होना ही चाहिए। जैसे योगी आसन बिछाकर ध्यान में बैठता है, एक लेखक को भी अपनी टेबल सजाकर, किताबें व्यवस्थित कर, पूरी तैयारी के साथ लिखने बैठना चाहिए। इस सोच के साथ मैं कई बार स्टडी टेबल की सफाई और सजावट में लग जाती हूँ—किताबें जमाना, पेन-पेंसिल ठीक करना, सामने की दीवार पर प्रेरक पंक्तियाँ चिपकाना। सब कुछ तैयार हो जाने पर लगता है कि अब तो लिखना सहज हो जाएगा। लेकिन ठीक उसी समय मन नए भाव में भटकने लगता है। कभी चाय का बहाना, कभी फोन, कभी को...

मां की स्मृति में

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माँ की आँखें मामूली नहीं थीं। उनकी चिंतनधारा ने मुझे विचारों की समृद्ध विधि सौंपी है। आपके होने के आगे मेरा होना हमेशा नतमस्तक रहेगा। मलाल बस इतना, मैं ही वह न दे पाई जो एक स्त्री को दूसरी स्त्री को देना चाहिए। यह स्वीकार आज भी भीतर कहीं ठहरा रहता है।  मां का जीवन साहित्यिक नहीं था। पर सोच साहित्यिक थी। अब सोचती हूँ तो लगता है कि आप एक किरदार की तरह थीं। उत्साह और जिजीविषा से भरीं। आप साधारण स्त्री तो बिल्कुल नहीं थीं। न सोच में। न व्यवहार में। न भाषा में। न जीवन में। आप असाधारण थीं। मां ने अपने कार्यान्वयन से वह सिखाया जो साधारण स्त्री सोच नहीं सकती। मां ने सिखाया सामने चाहे पुरुष हो या स्त्री बात दोनों से की जा सकती है। झेंपने की की जरूरत नहीं। मैंने आपसे ही अपनी देह यानी स्त्री-देह से विरक्त और आत्मा में स्थिर रहना सीखा। मैंने आपसे अपनी परिधि को बड़ा बनाना सीखा। मैंने आपसे अपने कर्तव्यों के प्रति सचेत रहना सीखा। साथ ये भी सीखा कि जो रिश्ते संवेदना रहित होकर उपयोग करने लगें, उन्हें त्यागना ही उचित है। आपके सिखाए हुए रास्ते पर चलते हुए कई कई बार मैं खुद को परेशानियों स...

करवाचौथ : स्त्री के भीतर की सजग प्रेम यात्रा

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करवाचौथ : स्त्री के भीतर की सजग प्रेम यात्रा — कल्पना मनोरमा आज तक करवाचौथ को सामान्यतः “पति की दीर्घायु” के लिए किए जाने वाले व्रत के रूप में ही देखती और मानती आ रही थी। पर आज जब व्हाट्स स्टेटस और इंस्टा रील्स में स्त्रियों की मेंहदी-रची हथेलियाँ देखीं, तो मन में एक प्रश्न कौंधा — क्या यह व्रत स्त्री केवल पति की दीर्घायु के लिए करती है? फिर जब इस पूरे वाकये को स्त्री-दृष्टि से देखा, तो एहसास हुआ कि यह व्रत दरअसल स्त्री के स्वयं के अस्तित्व, अपने प्रति प्रेम की परिभाषा और सौंदर्यबोध की पुनर्पुष्टि का भी उत्सव है। जब स्त्री सुबह से बिना कुछ खाए-पिए, संयमपूर्वक सोलह श्रृंगार और पूजा की तैयारी करती है, तो वह केवल पति के जीवन की रक्षा हेतु ही नहीं, बल्कि अपने भीतर के प्रेम, धैर्य और सौंदर्य की ऊर्जा को भी पुनः जागृत कर रही होती है। व्रत अनुष्ठान के प्रति किए गए संयम में कहीं न कहीं एक गहरी प्रतीकात्मकता छिपी है। व्रत स्त्री के भीतर के “अधैर्य” को शांत करने की साधना है। वह अपनी भूख और प्यास को थामकर जीवन के प्रति अपनी दृढ़ता को पुनः परिभाषित करती है। वह जानती है कि प्रेम केवल प...

विवेकहीन दान, मन की थकान

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विवेकहीन दान, मन की थकान – कल्पना मनोरमा उदार होना क्या सचमुच मनुष्य होने की पहचान है? या यह कहीं-कहीं हमारे निर्णयहीन होने का आवरण बन जाता है? हम अक्सर दूसरों की अपेक्षाओं और सामाजिक छवियों के दबाव में अपने ‘ना’ को बिना एहसास के निगल जाते हैं, और ‘हाँ’ कहते हुए थकते नहीं। यह थकान केवल शरीर की नहीं, आत्मा की होती है—जो भीतर के संतुलन को धीरे-धीरे खोखला कर देती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (2019) के अनुसार, लगातार भावनात्मक दबावों के बीच जीने से व्यक्ति की कार्यक्षमता ही नहीं, आंतरिक ऊर्जा भी खो देता है। इसी स्थिति को युवाओं की दुनिया में "थकावट या जड़ता" कहा जाता है। क्या कभी हमने अपने उस सूक्ष्म विवेक की खोज की है, जो यह तय कर सके कि कहाँ “अपना होना” देना, पुण्य होगा और कहाँ वह आत्महीनता में ढलकर व्यर्थ का कार्य? यह आत्मदर्शी दृष्टि ही हमें सिखा सकती है कि क्या हमारी उदारता सचमुच समझ से जुड़ी है या बस एक आदतन लाचारी है? माने कोई हमें चाह ही ले। कोई देखकर मुस्कुरा ही दे। कोई अपने समूह में शामिल कर ही ले। आखिर क्यों? क्या कोई इस ‘क्यों’ नामक ध्रुवांत पर रुककर खुद से प...

नवलता के परे स्त्री-जीवन

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नवरात्रि शक्ति की उपासना का पर्व है। नौ दिनों तक हम देवी के विविध रूपों की आराधना करते हैं। कभी उन्हें बालिका मानकर पूजते हैं तो कभी योद्धा, कभी करुणामयी माँ, तो कभी सिद्धिदात्री शक्ति। माता का हर रूप हमें यह सिखाता है कि स्त्री जीवन का प्रत्येक पड़ाव पूजनीय है। किंतु यह कैसी विडंबना है कि जिन देवी के प्रत्येक रूप को हम मान देते हैं, और स्त्रियों से अपेक्षा की जाती है कि वे सदैव नवल किशोरी रूप में बनी रहें। समाज का दबाव यह है कि स्त्री चाहे पचास की हो या सत्तर की, मगर दिखे वह बीस की नहीं, सोलह साला। उसकी त्वचा पर झुर्रियाँ न आएँ, उसकी चाल में थकान न दिखे, उसकी आवाज़ में परिपक्वता की गूँज न सुनाई दे। यह सब क्यों? ताकि भोग की दृष्टि आलोकित हो सके। क्योंकि सदियों से स्त्री को मनुष्य के रूप में नहीं, देह के रूप में देखने की आदत इतनी गहरी है कि स्त्रियों के लिए उम्र छिपाना एक सामाजिक सर्वमान्य संस्कृति बन गई। जबकि विकास के दरमियान अब इस विचार को भी विकसित होना चाहिए। इसलिए आवाह्न करती हूं कि सुनो स्त्रियो! जब कोई तुमसे उम्र पूछे तो तुम सही-सही बताया करो। उम्र का तकाज़ा बुद्धि से...

आख़िर सिक्कों की खनक में क्यों खोती जा रही हँसी

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                                                             "मैंने छुटपन में छिपकर पैसे बोये थे..." सुमित्रानंदन पंत की यह कल्पना जितनी मासूम उनके लिए थी, उतनी ही तब के माता-पिता के लिए भी होती थी। मगर आज का मनुष्य छुटपन से ही इस कल्पना को मन के मोद के लिए नहीं, जीवन-स्तर ऊँचा रखने के लिए साकार करने में कठोर से कठोर प्रयत्न में जुट जाता है। आज का समाज केवल और केवल पैसे 'उगाने' की बात सोचता, कहता और महसूस करता है। बचपन से ही व्यक्ति को होश नहीं रहता कि उसकी चाल कब बिगड़ी और कब वह मानवीय पावदान से खिसक कर जहन्नुम में जा गिरा है। विगत सदी में प्रसिद्ध कवि की इस कविता को कभी मौज मस्ती में पढ़कर हँस लिया करते थे, मगर अब वही कविता समय पर एक गहरा व्यंग्य उकेरती है। आज हर ओर दौड़ ही नहीं, अंधी दौड़ है। नौकरी, व्यवसाय, सोशल मीडिया, ब्रांडेड जीवन जीने की दौड़ में व्यक्ति सही गलत कुछ नहीं छोड़ता। यहाँ तक कि अपनी माटी की गरिमा को अप...

"एक दिन का सफर" कथा संग्रह पर आई टिप्पणियाँ

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टिप्पणीकार जयराम सिंह गौर  मानवीय जीवन की वेदना को उकेरती कहानियाँ ( समीक्षा प्रेरणा पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी है )        कल्पना मनोरमा अब न केवल कथाकार अपितु एक साहित्यकार के रूप में स्थापित हो चुकी हैं। उन्होंने अपनी साहित्यिक यात्रा कविता से प्रारंभ की और लगभग साहित्य की हर विधा में लेखन कर रही हैं। कल्पना मनोरमा लीक से हटकर सोचने और रचने वाली लेखिका हैं। अभी हाल ही में उन्होंने पुरुष विमर्श पर दो कहानी संग्रह ‘‘कांपती हुई लकीरें’’ और सहमी हुई धड़कने’’ का संपादन किया है। जो वर्तमान में समाज के उस हिस्से का दुःख बयान करता है, जिसे सदियों वे शक्तिशाली और क्रूर माना जाता रहा है। खैर! अब बात उनके सद्यः प्रकाशित कथा संग्रह ‘‘एक दिन का सफर” की, जिसे नई किताब प्रकाशन समूह के अनन्य प्रकाशन ने प्रकाशित किया है। इस संग्रह में बारह विविधवर्णी कहानियाँ हैं जो 152 पृष्ठों में समाहित हैं।   इस कथा संग्रह के फ्लैप पर वरिष्ठ कथाकार जयशंकर द्वारा लिखी टिप्पणी का एक अंश उद्धृत करना चाहूंगा,‘‘कहानियों में इधर की स्त्रियों के जीवन की प्रताड़नाओं को नए संदर...