हाँ और ना के बीच स्त्री का सच


हाँ और ना के बीच स्त्री का सच

मानव सभ्यता की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक संवाद है। संवाद ही रिश्तों, समाज और संस्कृति की नींव बनाता है। किंतु संवाद तभी सार्थक होता है जब उसमें सभी पक्षों को अपनी बात कहने और अपनी इच्छाअभ व्यक्त करने की स्वतंत्रता हो। स्त्री के संदर्भ में यह प्रश्न विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि इतिहास और समाज दोनों ने अनेक बार उसकी आवाज़ को सीमित करने का प्रयास किया है। ऐसे में “हाँ” और “ना” जैसे साधारण प्रतीत होने वाले शब्द स्त्री के जीवन में गहरे अर्थ ग्रहण कर लेते हैं। इन दोनों के बीच उपस्थित संकोच, मौन, दुविधा और दबाव को समझे बिना स्त्री की सहमति को समझना संभव नहीं है।

सहमति (Consent) केवल किसी प्रश्न के उत्तर में दिया गया एक शब्द नहीं है। यह व्यक्ति की स्वतंत्र इच्छा, भावनात्मक स्वीकृति और मानसिक सहजता से जुड़ी हुई प्रक्रिया है। मनोविज्ञान बताता है कि यदि किसी व्यक्ति को लगातार अपनी असहमति व्यक्त करने से हतोत्साहित किया जाए, तो वह धीरे-धीरे अपनी वास्तविक भावनाओं को दबाना सीख सकता है।

हमारे समाज के अनेक परिवेशों में लड़कियों को आज भी विनम्रता, समायोजन और सहनशीलता के संस्कार अधिक दिए जाते हैं, जबकि अपनी असहमति व्यक्त करने के अवसर अपेक्षाकृत कम मिलते हैं। परिणामस्वरूप कई स्त्रियाँ जीवन के महत्वपूर्ण निर्णयों में अपनी इच्छा और सामाजिक अपेक्षाओं के बीच उलझी रहती हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्त की गई “हाँ” हमेशा स्वतंत्र इच्छा का संकेत नहीं होती।

सहमति का प्रश्न मूलतः इच्छा की स्वतंत्रता का प्रश्न है। भारतीय चिंतन में इच्छा को जीवन के महत्वपूर्ण पुरुषार्थों में स्थान दिया गया है। वहीं आधुनिक स्त्रीवादी चिंतन यह प्रश्न उठाता है कि क्या स्त्री को अपनी इच्छा व्यक्त करने का वही अधिकार प्राप्त है जो पुरुष को प्राप्त है।

फ्रांसीसी दार्शनिक सिमोन द बोउवार ने लिखा था कि स्त्री को अक्सर एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि किसी की बेटी, पत्नी या माँ के रूप में देखा गया है। यदि किसी व्यक्ति की इच्छा को स्वतंत्र महत्व ही न मिले, तो उसकी सहमति भी संदिग्ध हो जाती है। इसलिए सहमति का वास्तविक अर्थ केवल स्वीकृति नहीं, बल्कि स्वतंत्र इच्छा से की गई स्वीकृति है।

स्त्री-विमर्श का एक केंद्रीय प्रश्न यह है कि स्त्री की इच्छा और निर्णय को कितना सम्मान प्राप्त है। सामाजिक जीवन में आज भी अनेक ऐसी स्थितियाँ दिखाई देती हैं जहाँ स्त्री की भूमिका को उसके अधिकारों से अधिक उसके कर्तव्यों के आधार पर परिभाषित किया जाता है।

विवाह, प्रेम, शिक्षा, रोजगार और व्यक्तिगत जीवन के अनेक निर्णयों में स्त्री की इच्छा कई बार परिवार, परंपरा, प्रतिष्ठा या सामाजिक अपेक्षाओं के दबाव से प्रभावित होती है। समस्या केवल किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उन सामाजिक संरचनाओं की भी है जो स्त्री के निर्णयों को नियंत्रित करने का प्रयास करती हैं।

स्त्री का अनुभव हमेशा केवल “हाँ” या “ना” में विभाजित नहीं होता। इन दोनों के बीच एक ऐसा क्षेत्र भी होता है जहाँ दुविधा, संकोच, भय और संबंधों को बचाए रखने की चिंता मौजूद रहती है।

कई बार स्त्री असहमति व्यक्त करना चाहती है, लेकिन उसे आशंका होती है कि उसकी बात को गलत समझा जाएगा। कभी उसे स्वार्थी कहा जाएगा, कभी विद्रोही, कभी परिवार-विरोधी। परिणामस्वरूप वह अपनी इच्छा को दबाकर सामाजिक स्वीकृति का मार्ग चुन लेती है।

यही स्थिति मानसिक तनाव, आत्मग्लानि और भावनात्मक संघर्ष को जन्म दे सकती है। इसलिए किसी भी सहमति को समझने से पहले उसके सामाजिक और मनोवैज्ञानिक संदर्भों को समझना आवश्यक है।

साहित्य लंबे समय से उन अनुभवों को स्वर देता रहा है जिन्हें समाज अक्सर अनदेखा कर देता है। अनेक हिंदी लेखिकाओं ने अपनी रचनाओं में स्त्री के मौन, उसके अंतर्द्वंद्व और उसकी अनकही इच्छाओं को अभिव्यक्ति दी है।

साहित्य हमें यह समझने में सहायता करता है कि हर चुप्पी सहमति नहीं होती। कई बार मौन के भीतर प्रतिरोध भी होता है, पीड़ा भी, और अपनी पहचान की खोज भी। यही कारण है कि स्त्री की चुप्पी को समझना उसके शब्दों को सुनने जितना ही महत्वपूर्ण है।

समकालीन समाज में सहमति का प्रश्न केवल पारिवारिक या दाम्पत्य संबंधों तक सीमित नहीं है। डिजिटल युग ने इस विषय को नए आयाम दिए हैं। ऑनलाइन उत्पीड़न, ट्रोलिंग, निजी तस्वीरों का दुरुपयोग और आभासी हिंसा जैसी घटनाएँ यह संकेत करती हैं कि स्त्री की गरिमा और उसकी इच्छा का सम्मान अभी भी एक महत्वपूर्ण सामाजिक चुनौती बना हुआ है।

#MeToo जैसे आंदोलनों ने इस चर्चा को व्यापक बनाया और यह स्पष्ट किया कि सहमति केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक स्तर पर भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

इस स्थिति में परिवर्तन केवल कानूनों से संभव नहीं होगा। इसके लिए सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर भी बदलाव आवश्यक है। बेटियों को अपनी असहमति व्यक्त करने का आत्मविश्वास दिया जाना चाहिए। बेटों को असहमति का सम्मान करना सिखाया जाना चाहिए। परिवारों में संवाद की संस्कृति विकसित की जानी चाहिए। मनोवैज्ञानिक सहायता और परामर्श सेवाओं को अधिक सुलभ बनाया जाना चाहिए। साहित्य, कला और मीडिया को स्त्री के अनुभवों को संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करना चाहिए।

“हाँ” और “ना” केवल दो शब्द नहीं हैं। इनके बीच मनुष्य की स्वतंत्रता, गरिमा और आत्मनिर्णय का प्रश्न निहित है। स्त्री के संदर्भ में यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि उसकी आवाज़ को लंबे समय तक सामाजिक अपेक्षाओं और परंपरागत भूमिकाओं के भीतर सीमित रखा गया है।

किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से नहीं होती कि वहाँ स्त्रियाँ कितनी बार “हाँ” कहती हैं, बल्कि इस बात से होती है कि वे बिना भय, दबाव और अपराधबोध के “ना” कह सकती हैं या नहीं। जब तक स्त्री की इच्छा को उसके व्यक्तित्व के केंद्रीय तत्व के रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा, तब तक सहमति का अर्थ अधूरा रहेगा।

स्त्री का सच शायद यही है कि उसकी चुप्पी को उसकी सहमति मान लेना सबसे बड़ा अन्याय है। 


                  लेखिका: कल्पना मनोरमा 

Comments

  1. समझा जाएगा या नहीं यह तो बाद की बात है, पहले स्त्री को अपने भीतर हाँ और ना का अंतर समझना होगा और अपने लिए एक का चुनाव करना होगा

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