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किसान जीवन का करुण और वैचारिक दस्तावेज : ‘खरगांव का चौक

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                    लेखिका: आशा पाण्डेय            उपन्यास: खरगाँव का चौक  खरगांव का चौक समकालीन हिंदी उपन्यासों में एक ऐसा रचना-कृति है, जो किसी एक कथा-घटना या किसी एक पात्र की नियति तक सीमित न रहकर एक पूरे सामाजिक–आर्थिक यथार्थ को अपने भीतर समेट लेती है। यह उपन्यास महाराष्ट्र की खेती-किसानी, किसान आत्महत्याओं, ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विघटन और उससे उपजते मानवीय संबंधों के टूटने-जुड़ने की कथा कहता है। लेखिका आशा पांडेय ने इस यथार्थ को करुणा, संवेदना और गहरी सामाजिक जिम्मेदारी के साथ रूपायित किया है। ‘खरगांव का चौक’ का केंद्रीय विषय महाराष्ट्र में लंबे समय से चली आ रही किसान आत्महत्याओं की त्रासदी है। यह उपन्यास इस समस्या को किसी आँकड़े, सरकारी रिपोर्ट या प्रत्यक्ष राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप की तरह नहीं, बल्कि घर-परिवार, खेत-खलिहान और रिश्तों की बारीक परतों के माध्यम से प्रस्तुत करता है। संतोष का आत्महत्या करना केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं है, बल्कि एक पूरे परिवार और समुदाय के भवि...