मिलेनियल स्त्रियाँ : अपनी पहचान की तलाश (1981–1996)
मिलेनियल स्त्रियाँ : अपनी पहचान की तलाश (1981–1996) बुनियादी चिंतन : बालिका से वामा ।। स्तंभ 38 समय कभी अकेला नहीं बदलता। उसके साथ मनुष्य की दृष्टि, जीवन के मूल्य और समाज की संरचना भी बदलती है। एक पीढ़ी के अनुभव अगली पीढ़ी की विरासत बनते हैं और उसी विरासत पर भविष्य अपनी नई संभावनाएँ निर्मित करता है। भारतीय समाजशास्त्री योगेन्द्र सिंह का मानना है कि भारतीय समाज में परंपरा और आधुनिकता परस्पर विरोधी नहीं हैं। बदलते समय में परंपराएँ नए रूप ग्रहण करती हैं और आधुनिकता उन्हें नए अर्थ प्रदान करती है। बूमर और जेनरेशन एक्स की स्त्रियों ने जिन संघर्षों से परिवर्तन की राह बनाई, उसी विरासत पर मिलेनियल स्त्रियों ने अपने जीवन की नींव रखी। वे उस पीढ़ी की प्रतिनिधि हैं जिसने बदलते भारत को केवल देखा नहीं, बल्कि उसे अपने जीवन में जिया भी। उनका बचपन आज की पीढ़ी से अलग था। गर्मियों की छुट्टियाँ ननिहाल में बीतती थीं। मोहल्ले में सब एक दूसरे को जानते थे। बच्चों की डाँट और कभी-कभार की पिटाई को भी पालन-पोषण का सामान्य हिस्सा माना जाता था। अनुशासन को अधिकार से अधिक स्नेह और जिम्मेदारी का विस्तार समझ...