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Showing posts from June 22, 2026

"एक दिन का सफ़र" कथा संग्रह पर प्रतिक्रियाएं

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स्कूल, कोचिंग और भय का उद्योग

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ज्ञानार्जन अब केवल एक साधारण प्रक्रिया नहीं रही। बल्कि ज्ञान प्राप्त करना एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था में बदल चुका है, जिसमें अभिभावकों की आर्थिक और मानसिक क्षमता लगातार क्षीण हो रही है। पिछले दो दशकों में निजी स्कूलों, कोचिंग संस्थानों और प्रतियोगी परीक्षाओं की बढ़ती संस्कृति ने शिक्षा को ऐसे ढाँचे में ढाल दिया है, जहाँ सामान्य आय वाला परिवार भी असाधारण खर्च करने के लिए विवश हो रहा है। और जब-जब ऐसा होता है तो सामान्य आय वाले माता-पिता अपनी संतान को शिक्षा दिलाने के लिए त्याग नहीं, अपनी जिंदगी भी दांव पर लगा देते हैं। हमारे यहाँ शिक्षा व्यवस्था शायद दुनिया की अकेली ऐसी व्यवस्था है, जहाँ बच्चे को स्कूल भेजना ही काफी नहीं। माता-पिता को लगता है कि उनके बच्चे भी स्कूल से लौटकर कोचिंग जाएँ। मानो दिन का पहला हिस्सा केवल उपस्थिति दर्ज कराने में निकल गया और दूसरा, जो कोचिंग के नाम खर्च होता है, उसमें बच्चा तकनीक से लेकर भाषा, गणित सबकी शिक्षा ग्रहण कर ले। सुबह सात बजे बस स्टॉप पर खड़े बच्चों को देखिए। पीठ पर इतने बड़े बैग कि लगता है वे किताबें नहीं, पूरा भविष्य ढो रहे हैं। कुछ घंटों के...

पेंच कटने के बाद

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         पेंच कटने के बाद यूँ तो झाड़ियों में अटकना बिल्कुल ठीक नहीं, लेकिन जब कोई तुम्हें अचानक छोड़ ही दे, पेंच काट ही दे, तो तुम पतंग बन जाना। आसमान न सही, किसी झाड़ी पर टिक जाना। कोई न कोई तुम्हें उतार लेगा, जीत की खुशी के साथ। पतंग का झाड़ी या पेड़ की शाख पर अटक जाना सामान्यतः एक दुर्घटना माना जाता है। वह अब आकाश में नहीं है। उसकी डोर टूट चुकी है। उसकी दिशा और गति दोनों छिन चुकी हैं। लेकिन यदि ध्यान से देखा जाए तो वह पूरी तरह नष्ट भी नहीं हुई है। वह अब भी मौजूद है, किसी शाख पर, किसी उलझन के बीच, किसी अनिश्चित प्रतीक्षा में। शायद जीवन के कुछ अनुभव भी ऐसे ही होते हैं। वे हमें यह समझाते हैं कि हर टूटन का अर्थ अंत नहीं होता। जीवन में ऐसे दिन भी आते हैं जब लगता है कि अब कुछ नहीं बचा। जो अपना था, वह छूट गया। जिस रास्ते पर चल रहे थे, वह बंद हो गया। जिन लोगों पर भरोसा था, वे साथ नहीं रहे। ऐसे समय में मनुष्य को किसी बड़ी जीत की नहीं, अपितु इतना भर जान लेने की आवश्यकता होती है कि इतना सब घट जाने के बाद भी उसका जीवन बचा हुआ है। हम ऐसे समाज में रहते हैं जहा...