मैं शरीर से अधिक हूँ?
11.06.2026 मैं शरीर से अधिक हूँ? इन दिनों मृत्यु का ख्याल कुछ ज्यादा आने लगा है। ऐसा नहीं कि मैं मरना चाहती हूँ या जीवन से ऊब गई हूँ। उल्टा, जब जीवन बहुत सुंदर लगता है, तब यह ख्याल और तीखा हो जाता है। ज्यादा बार दिमाग खटखटाता है। सुबह की चाय, पेड़ों पर नई पत्तियाँ, किसी बच्चे की हँसी, किसी अनजान व्यक्ति की सदाशयता, इन सबको देखकर अचानक लगता है कि एक दिन यह सब छूट जाएगा। और तब प्रश्न उठता है कि जो छूट जाएगा, वह क्या है? और जो छूटेगा नहीं, वह क्या है? मैं अपने शरीर को देखती हूँ। यह वही शरीर नहीं है जो बचपन में था। न वह जो युवावस्था में था। समय ने इसमें बहुत कुछ बदल दिया है। लेकिन एक अनुभूति ऐसी है जो आज भी वैसी ही लगती है जैसी वर्षों पहले थी। वही जो देखती है, सोचती है, दुखी होती है, प्रसन्न होती है और प्रश्न पूछती है। तब कभी-कभी मन में आता है कि शायद मैं केवल शरीर नहीं हूँ। यह कोई आध्यात्मिक दावा नहीं है। न ही किसी धर्मग्रंथ से निकला हुआ निष्कर्ष। यह तो बस एक प्रश्न है, जो मृत्यु के विचार के साथ बार-बार मेरी ओर लौट आता है। अरस्तु ...