मैं शरीर से अधिक हूँ?

        11.06.2026

     मैं शरीर से अधिक हूँ?

इन दिनों मृत्यु का ख्याल कुछ ज्यादा आने लगा है। ऐसा नहीं कि मैं मरना चाहती हूँ या जीवन से ऊब गई हूँ। उल्टा, जब जीवन बहुत सुंदर लगता है, तब यह ख्याल और तीखा हो जाता है। ज्यादा बार दिमाग खटखटाता है।

सुबह की चाय, पेड़ों पर नई पत्तियाँ, किसी बच्चे की हँसी, किसी अनजान व्यक्ति की सदाशयता, इन सबको देखकर अचानक लगता है कि एक दिन यह सब छूट जाएगा। और तब प्रश्न उठता है कि जो छूट जाएगा, वह क्या है? और जो छूटेगा नहीं, वह क्या है?

मैं अपने शरीर को देखती हूँ। यह वही शरीर नहीं है जो बचपन में था। न वह जो युवावस्था में था। समय ने इसमें बहुत कुछ बदल दिया है। लेकिन एक अनुभूति ऐसी है जो आज भी वैसी ही लगती है जैसी वर्षों पहले थी। वही जो देखती है, सोचती है, दुखी होती है, प्रसन्न होती है और प्रश्न पूछती है।

तब कभी-कभी मन में आता है कि शायद मैं केवल शरीर नहीं हूँ।

यह कोई आध्यात्मिक दावा नहीं है। न ही किसी धर्मग्रंथ से निकला हुआ निष्कर्ष। यह तो बस एक प्रश्न है, जो मृत्यु के विचार के साथ बार-बार मेरी ओर लौट आता है।

अरस्तु चले गए, प्लेटो चले गए, चाणक्य, अशोक, सिकंदर और अकबर भी चले गए। संसार नहीं रुका। फिर भी वे पूरी तरह अनुपस्थित नहीं हैं। उनके विचार, उनके कर्म, उनकी स्मृतियाँ आज भी हमारे बीच हैं। शायद मनुष्य का अस्तित्व उसके शरीर की सीमा से थोड़ा आगे तक फैला होता है। वह अपने स्पर्श में रहता है, अपने शब्दों में रहता है, अपने प्रेम में रहता है और उन लोगों में भी, जिनके जीवन को उसने कभी छुआ था।

मुझे नहीं पता कि आत्मा अमर है या नहीं। मृत्यु के बाद क्या होता है, यह भी नहीं जानती। लेकिन इतना जरूर लगता है कि मनुष्य को केवल उसकी देह से समझ लेना शायद पर्याप्त नहीं है। इसीलिए कभी मृत्यु भय बनकर आती है और कभी एक गहरे रहस्य की तरह।

उत्तर आज भी नहीं मिला है। शायद कभी मिलेगा भी नहीं। लेकिन जब बहुत देर तक सोचने के बाद भी कोई उत्तर नहीं मिलता, तो मैं चाय का कप उठाती हूँ और दिन को फिर से रोज़ की परंपराओं में हाँक देती हूँ।

                       — कल्पना मनोरमा 

         

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