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सीमाओं के बीच शिक्षा का उजास (शैक्षिक दख़ल के ताज़ा अंक में)

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                सीमाओं के बीच शिक्षा का उजास               मनुष्य का जीवन अपने प्रारंभिक अबोध अनुभवों से ही आकार लेना आरम्भ कर देता है। जिस परिवेश में मनुष्य जन्म लेता है, जिन लोगों की आँखों के सहारे से दुनिया को पहली बार देखता है, और जिस संस्कृति में बोलना, देखना, महसूस करना और अभिव्यक्त करना सीखता है, वही सब मिलकर उसकी प्रौढ़ दृष्टि और समझ का आधार बनती हैं। मेरे अनुभव का संसार का आधार, वह परिवेश रहा जो एक गाँव का आँगन था, उत्तर प्रदेश के औरैया तहसील, जिला इटावा का एक छोटा सा गाँव अटा। जितना बाहर से यह गाँव अन्य गाँवों जैसा ही सरल, स्वच्छ और सुसंस्कृत दिखता रहा, उतना ही भीतर से विरोधाभासों, सीमाओं, भावुकता, विरोध और अवरोधों से भरा हुआ था। इस में प्राथमिक पाठशाला तो थी, पर अस्पताल, पंचायत भवन या पुस्तकालय जैसी सुविधाएँ नहीं थीं। फिर भी यह गाँव समृद्ध किसानों और व्यवसायियों का गांव बना रहा। अन्य जरूरतों के लिए तीन से चार किलो मीटर की दूरी तय कर अपने सुख सुविधाओं का जुटान करता गाँव अपने आसपास किसानों की...