Posts

Showing posts with the label वैचारिक लेख

पेंच कटने के बाद

Image
         पेंच कटने के बाद यूँ तो झाड़ियों में अटकना बिल्कुल ठीक नहीं, लेकिन जब कोई तुम्हें अचानक छोड़ ही दे, पेंच काट ही दे, तो तुम पतंग बन जाना। आसमान न सही, किसी झाड़ी पर टिक जाना। कोई न कोई तुम्हें उतार लेगा, जीत की खुशी के साथ। पतंग का झाड़ी या पेड़ की शाख पर अटक जाना सामान्यतः एक दुर्घटना माना जाता है। वह अब आकाश में नहीं है। उसकी डोर टूट चुकी है। उसकी दिशा और गति दोनों छिन चुकी हैं। लेकिन यदि ध्यान से देखा जाए तो वह पूरी तरह नष्ट भी नहीं हुई है। वह अब भी मौजूद है, किसी शाख पर, किसी उलझन के बीच, किसी अनिश्चित प्रतीक्षा में। शायद जीवन के कुछ अनुभव भी ऐसे ही होते हैं। वे हमें यह समझाते हैं कि हर टूटन का अर्थ अंत नहीं होता। जीवन में ऐसे दिन भी आते हैं जब लगता है कि अब कुछ नहीं बचा। जो अपना था, वह छूट गया। जिस रास्ते पर चल रहे थे, वह बंद हो गया। जिन लोगों पर भरोसा था, वे साथ नहीं रहे। ऐसे समय में मनुष्य को किसी बड़ी जीत की नहीं, अपितु इतना भर जान लेने की आवश्यकता होती है कि इतना सब घट जाने के बाद भी उसका जीवन बचा हुआ है। हम ऐसे समाज में रहते हैं जहा...

मनुष्य होने की विधि

Image
मनुष्य होने की विधि कल्पना मनोरमा कुछ समय से एक प्रश्न मन में बार-बार उठ रहा है। हम किसी व्यक्ति की सफलता, प्रसिद्धि, प्रतिभा और उपलब्धियों को देखकर मान लेते हैं कि उसके भीतर गहरा आत्मविश्वास भी होगा। लेकिन क्या आत्मविश्वास का संबंध केवल उपलब्धियों से है? आधुनिक समाज ने आत्मविश्वास को प्रायः व्यक्तिगत सफलता से जोड़ दिया है। जो व्यक्ति अपने मन का जीवन जी रहा है, आर्थिक रूप से स्वतंत्र है, सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त है और अपने निर्णय स्वयं ले सकता है, उसे आत्मविश्वासी माना जाता है। यह धारणा पूरी तरह गलत नहीं है, लेकिन अधूरी अवश्य है। आत्मविश्वास का एक दूसरा स्रोत भी है, जिस पर कम चर्चा होती है। वह है उत्तरदायित्व। मनुष्य केवल इच्छाओं वाला प्राणी नहीं है। वह संबंधों वाला प्राणी भी है। उसका जीवन अकेले नहीं बनता। जन्म से लेकर मृत्यु तक वह परिवार, समाज, मित्रता, प्रेम, सहयोग और परंपरा जैसी अनेक संरचनाओं के भीतर जीता है। इसलिए मनुष्य होने का अर्थ केवल स्वतंत्र होना नहीं, बल्कि उत्तरदायी होना भी है। यहीं से "मनुष्य होने की विधि" का प्रश्न सामने आता है। मनुष्य होने की विधि ...

बुराई का पूर्ण कद

Image
बुराई का पूर्ण कद बुरे लोगों के साथ बुरा होने में इतनी देर क्यों लगती है? यह प्रश्न लगभग हर मनुष्य के भीतर कभी न कभी उठता है। क्योंकि हम देखते हैं कि छल करने वाले आगे बढ़ रहे हैं, झूठ बोलने वाले सम्मान पा रहे हैं और दूसरों को पीड़ा देने वाले बिना किसी दंड के सुख से जी रहे हैं। ऐसे में न्याय और नैतिकता के बारे में हमारी सहज धारणाएँ डगमगाने लगती हैं। मन पूछता है, यदि बुराई का अंत निश्चित है, तो उसमें इतनी देर क्यों लगती है? शायद इसका उत्तर बुराई की प्रकृति में ही छिपा है। बहुत विचार करने के बाद कहना चाहती हूँ कि बुराई तब तक भस्म नहीं होती, जब तक वह अपने पूर्ण कद को प्राप्त नहीं कर लेती। वह अपने छोटे रूप में समाप्त नहीं होती। संसार की संरचना का यह एक विचित्र सत्य है। यहाँ जन्म और मृत्यु साथ-साथ चलते हैं। विस्तार की आकांक्षा भी एक स्वभाव है। जिस तरह अच्छाई जन्म लेती है, उसी तरह बुराई भी जन्म लेती है, फैलती है, अपने नए-नए रूप गढ़ती है और धीरे-धीरे उस स्थिति तक पहुँचती है जहाँ उसके लिए स्वयं को छिपाए रखना संभव नहीं रह जाता। वहीं से उसके अवसान की शुरुआत होती है। हमारे मिथकों में य...