मनुष्य होने की विधि
मनुष्य होने की विधि
कल्पना मनोरमा
कुछ समय से एक प्रश्न मन में बार-बार उठ रहा है। हम किसी व्यक्ति की सफलता, प्रसिद्धि, प्रतिभा और उपलब्धियों को देखकर मान लेते हैं कि उसके भीतर गहरा आत्मविश्वास भी होगा। लेकिन क्या आत्मविश्वास का संबंध केवल उपलब्धियों से है?
आधुनिक समाज ने आत्मविश्वास को प्रायः व्यक्तिगत सफलता से जोड़ दिया है। जो व्यक्ति अपने मन का जीवन जी रहा है, आर्थिक रूप से स्वतंत्र है, सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त है और अपने निर्णय स्वयं ले सकता है, उसे आत्मविश्वासी माना जाता है। यह धारणा पूरी तरह गलत नहीं है, लेकिन अधूरी अवश्य है।
आत्मविश्वास का एक दूसरा स्रोत भी है, जिस पर कम चर्चा होती है। वह है उत्तरदायित्व।
मनुष्य केवल इच्छाओं वाला प्राणी नहीं है। वह संबंधों वाला प्राणी भी है। उसका जीवन अकेले नहीं बनता। जन्म से लेकर मृत्यु तक वह परिवार, समाज, मित्रता, प्रेम, सहयोग और परंपरा जैसी अनेक संरचनाओं के भीतर जीता है। इसलिए मनुष्य होने का अर्थ केवल स्वतंत्र होना नहीं, बल्कि उत्तरदायी होना भी है।
यहीं से "मनुष्य होने की विधि" का प्रश्न सामने आता है।
मनुष्य होने की विधि क्या है?
क्या इसका अर्थ केवल यह है कि व्यक्ति अपनी क्षमताओं का अधिकतम विकास करे? क्या इसका अर्थ केवल यह है कि वह अपनी इच्छाओं के अनुसार जीवन जिए? या फिर इसमें यह भी शामिल है कि वह उन लोगों और संबंधों के प्रति उत्तरदायी रहे, जिनसे उसका जीवन निर्मित हुआ है?
आज व्यक्ति की स्वतंत्रता पर जितना बल दिया जाता है, उतना बल उसके दायित्वों पर नहीं दिया जाता। परिणाम यह है कि हम सफलता को तो माप लेते हैं, लेकिन परिपक्वता को नहीं माप पाते। न ही इसपर बात करते हैं।
एक व्यक्ति बहुत सफल हो सकता है, लेकिन यह आवश्यक नहीं कि वह अपने संबंधों में भी उतना ही विश्वसनीय हो। इसी प्रकार एक व्यक्ति सार्वजनिक जीवन में अत्यंत प्रभावशाली हो सकता है, लेकिन निजी जीवन में लगातार अस्थिर हो। सफलता और परिपक्वता हमेशा एक ही चीज़ नहीं होतीं।
मुझे लगता है कि मनुष्य के भीतर सबसे गहरा आत्मविश्वास तब पैदा होता है जब वह अपने जीवन की वास्तविकताओं से भागता नहीं है। वह अपने निर्णयों के परिणाम स्वीकार करता है और स्वयं को जीवन की कसौटी पर परखने का साहस रखता है। वह यह भी समझता है कि स्वतंत्रता और दायित्व एक-दूसरे से अलग नहीं हैं।
यही कारण है कि कई बार साधारण दिखाई देने वाले लोग भीतर से असाधारण रूप से स्थिर लगते हैं। उनकी दृढ़ता किसी उपलब्धि, पद या प्रसिद्धि से नहीं आती। उसका स्रोत वह जीवन है जिसे उन्होंने ईमानदारी से जिया है। उन्होंने अपने संबंधों को उपभोग की वस्तु नहीं बनाया, न जिम्मेदारियों को बोझ मानकर उनसे बचने की कोशिश की।
आत्मविश्वास का निर्माण बाहर की स्वीकृतियों से नहीं, अपने जीवन के प्रति उत्तरदायी होने से होता है। जो व्यक्ति अपने कर्मों, संबंधों और चुनावों के साथ खड़ा रह सकता है, उसे स्वयं को साबित करने की उतनी आवश्यकता नहीं रह जाती। उसका विश्वास किसी सफलता पर नहीं, अपने जीवन के प्रति उसकी सजग उपस्थिति पर टिका होता है।
यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि निष्ठा का अर्थ जड़ता नहीं है। मनुष्य को बदलने, नए निर्णय लेने और अपनी गलतियों को सुधारने का अधिकार है। जीवन में ऐसे अवसर आते हैं जब पुरानी राह छोड़ना ही उचित होता है।
किंतु कोई भी निर्णय केवल इसलिए उचित नहीं हो जाता कि वह हमारी इच्छा के अनुकूल है। मनुष्य समाज में रहता है और उसके चुनाव दूसरों के जीवन को भी प्रभावित करते हैं। इसलिए हर निर्णय के साथ उसके परिणामों की जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है।
शायद मनुष्य होने की विधि यही है कि वह अपने सुख को ही अंतिम सत्य न मान ले। वह यह भी देखे कि उसके निर्णयों का प्रभाव उन लोगों पर क्या पड़ेगा जो उसके जीवन से जुड़े हैं। और जो जुड़े हैं, वे भी यह समझें कि संबंध किसी पर अधिकार का नाम नहीं, बल्कि परस्पर सम्मान और संवेदनशीलता का क्षेत्र हैं।
आधुनिक समय ने हमें अधिकारों की भाषा दी है। यह डिजिटल युग की बड़ी देन है। लेकिन अधिकारों के साथ दायित्वों की भाषा भी उतनी ही आवश्यक है, इस बात का ख्याल रखना होगा। यदि अधिकार ही केंद्र में रह जाएँ और दायित्व हाशिए पर चले जाएँ, तो व्यक्ति स्वतंत्र तो हो सकता है, पर भीतर से आश्वस्त नहीं।
इसलिए मुझे लगता है कि आत्मविश्वास का सबसे विश्वसनीय आधार उपलब्धि नहीं, उत्तरदायित्व है। उपलब्धियाँ व्यक्ति को पहचान देती हैं, लेकिन उत्तरदायित्व उसे आंतरिक स्थिरता देते हैं।
संभव है कि मनुष्य होने की विधि का एक महत्वपूर्ण अर्थ यही हो कि हम जीवन को केवल अपने लिए न जिएँ। हम यह भी समझें कि हमारा अस्तित्व अनेक लोगों, अनेक संबंधों और अनेक दायित्वों से बना है। जो व्यक्ति इस सत्य को स्वीकार कर लेता है, उसके भीतर एक अलग प्रकार की दृढ़ता जन्म लेती है।
वह दृढ़ता सफलता से बड़ी होती है, क्योंकि वह जीवन की वास्तविकता पर आधारित होती है।
लेखिका : कल्पना मनोरमा
आत्मविश्वास की सच्ची परिभाषा दी है आपने इस आलेख में, वाक़ई मानव को अपने आसपास के परिवेश के प्रति उत्तरदायित्वों से कभी मुख नहीं मोड़ना चाहिए, तभी वह दिल से मज़बूत बनेगा
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