लेखक की गढ़ी हुई छवि





दूसरों के द्वारा गढ़ी हुई छवि 

                          22 जुलाई 2026

अब जाकर एहसास होता है कि लेखक का जीवन केवल उसके अच्छे लेखन से नहीं चलता। एक रचनाकार के साथ उसकी रचनात्मक छवि ही नहीं चलती, उसके समानांतर एक गढ़ी हुई अदृश्य छवि भी चलती है। आश्चर्य यह है कि उस छवि को गढ़ने में स्वयं लेखक का कोई योगदान नहीं होता। लोग उसे अपने अनुभवों, अपनी धारणाओं, अपने अहं और अपने पूर्वाग्रहों के अनुसार आकार देते रहते हैं। धीरे-धीरे वह छवि इतनी दूर तक पहुँच जाती है कि स्वयं लेखक उससे अपरिचित रह जाता है।

पिछले कुछ महीनों की एक घटना बार-बार इसी बात की याद दिलाती रही। एक पत्रिका के संपादक ने स्वयं कहानी माँगी। कहानी भेजते समय अच्छा लगा। लगा कि मेरे लेखन पर उनका विश्वास बना है और कहानी पाठकों तक पहुँचेगी। कहानी का प्रकाशित होना या न होना मेरे लिए सबसे बड़ा प्रश्न नहीं है। हर संपादक को अपना निर्णय लेने का अधिकार है। मुझे अधिक देर तक उस मौन ने रोके रखा जो उसके बाद लगातार बना रहा। मन में बार-बार यही प्रश्न उठता रहा कि आखिर ऐसा क्या बदल गया। जो कहानी प्रकाशित नहीं हुई।

धीरे-धीरे यह विचार भी आया कि क्या रचनाएँ सचमुच अकेली यात्रा करती हैं? या उनसे पहले लेखक के बारे में बनी हुई धारणाएँ पहुँच जाती हैं या पहुंचा दी जाती हैं। शायद साहित्य का एक अदृश्य संसार यहीं से आरंभ होता है। और मेरे जैसे आहत कई लेखक भी होंगे। यहाँ किसी भी लेखक के शब्दों से अधिक उसकी वे छवियाँ काम करती हैं, जो दूसरों के द्वारा बनाई जाती हैं। दुख इस बात का नहीं कि कोई किसी के बारे में राय बना लेता है। दुख तब होता है जब बिना जाने, बिना परखे, वही राय दूसरे लोगों के निर्णयों का आधार बनने लगती है।

वर्षों पहले एक साहित्यिक प्रसंग में एक वरिष्ठ लेखक से बातचीत हुई थी। उनके कहे अनुसार कार्य किया गया। फिर न जाने क्या हुआ कि एक दिन उन्होंने मुझसे कहा, "मैंने तो ऐसा कहा ही नहीं, तुम झूठ बोल रही हो।"

मैं उस समय हतप्रभ रह गई। आरोप से अधिक झूठ शब्द ने भीतर तक चोट पहुँचाई।

  मेरे बचपन में घर का वातावरण ऐसा रहा, जहाँ असहमति व्यक्त की जाती रही थी, डाँट भी पड़ती थी, लेकिन किसी को झूठा नहीं कहा जाता था। मेरी माँ ने तो भूलकर भी मुझसे कभी यह नहीं कहा कि तुम झूठ बोल रही हो। जबकि वे कहती थीं, सोचकर बोला, क्या ये बात सही है। तुम सच बता रही हो? इसलिए उस दिन मैंने उन महान लेखक को कोई सफाई नहीं दी। बातचीत वहीं समाप्त कर दी। उसी समय यह भी तय कर लिया कि हर संबंध को बचाए रखना आवश्यक नहीं होता।

समय बीत गया। उस घटना का उल्लेख मैंने फिर कभी कहीं नहीं किया। लेकिन बाद में कई बार लगा, उनके द्वारा मेरा कुप्रचार किया जा रहा है। 

  अब इस पूरे अनुभव को लेखक के जीवन का एक ऐसा पक्ष मानती हूँ जो उसके अधिकार में नहीं। साहित्य में अच्छा लिखना जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक है उन बातों से अप्रभावित रहना जो आपकी अनुपस्थिति में कही जाती हैं। उनका उत्तर हर बार नहीं दिया जा सकता।

अंततः लेखक के पास उसका लिखा हुआ ही बचता है। भले उसे पत्रिकाएं प्रकाशित करें या न करें। लेखन ही उसकी विश्वसनीय पहचान है। समय यह नहीं देखता कि किसने किसके बारे में क्या कहा था। समय अंततः यही दर्ज करता है कि किसने कितनी देर तक लिखना जारी रखा। 






Comments

  1. डायरी के यह पन्ने अनेकों लेखकों को अपने से लगेंगे। यह बहुत बड़ा सच है जो आपने लिखा है। छवियां गढ़ी जाती हैं यहाँ।

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