पीली चिड़िया

खिड़की से आती संघ्या की अंतिम किरण प्रभा को उदास कर रही थी। उसने फिर से किताब उठाकर अपनी पसंदीदा कविता ‘ आज की स्त्री ’ पढ़नी चाही। " स्त्री कूटती आई है/ ख़ुशी के धान/ अँधेरे की ओखली में…! " पंक्ति के अर्थ में प्रभा को अपना और अपनी माँ का भूला-सा जीवन याद आने लगा। उसकी उदासी मिटने के बजाय बढ़कर सातवें आसमान तक जा पहुँची। “ जिन बातों की पर्देदारी में मैंने अपना जीवन हवन कर दिया। लेखिका ने खुलेआम लिख दिया ? जबकि स्त्री और पीड़ा का चोली-दामन का साथ है। वह जा भी कहाँ सकती है ?” अवसाद में जकड़ी रहने वाली प्रभा अब निश्चेष्ट हो नकारात्मकता की नदी में बह चली थी। " निरी बेवकूफ हो गई हैं आज की कवयित्रियाँ। " अचानक तुनक कर प्रभा बुदबुदाई और उसका क्रोध इतना बढ़ता चला गया कि उसके दिमाग़ की नसें तड़कने लगीं। अपने इर्द-गिर्द घिरे रहने वाले सन्नाटों में वह खो जाती मगर उसकी कलाई पर तेज़ चुभन का उसे एहसास हुआ। “ क्या मेरे जीवन की चुभन इतनी बढ़ चुकी है कि वह कहीं भी और कभी भी महसूस होने लगे ?” उसके अचेतन में एक प्रश्न कौंधा और ध्यान उस हाथ की ओर चला गया...