परम्परा और आधुनिकता के द्वन्द्व से उत्पन्न गीत

वरिष्ठ नवगीतकार ,आलोचक और समीक्षक आदरणीय नचिकेता जी द्वारा लिखित संग्रह की भूमिका | आज का गीत अपनी वैयक्तिक सुख-दुख की अभिव्यक्ति की जगह सामाजिक सुख-दुख की अभिव्यक्ति को अपना अभीष्ट मानता है और सामाजिक समस्याओं से सीधा साक्षात्कार करता है। यह अलग बात है कि आदिम वर्ग विहीन समाज में सामूहिक श्रम प्रक्रिया के दौरान , श्रम परिहार के लिए सामूहिक संवेग को अभिव्यक्त करने हेतु समूह गीतों के रूप में उत्पन्न गीत को सदियों तक नितान्त निजी आत्माभिव्यक्ति का माध्यम माना जाता रहा है और एक सीमा तक दकियानूस और कूपमंडूक लोगों द्वारा आज भी माना जाता है। मौजूदा दौर की हिन्दी आलोचना की घनघोर उपेक्षा और अवमानना का तीखा दंश सहते हुए भी हमारे गीतकार अपने रचनाकर्म से पलायन न करके लगातार गीत का सृजन ही नहीं कर रहे हैं , अपितु वर्तमान सामाजिक चेतना के उन्नयन में सकारात्मक भूमिका भी अदा कर रहे हैं। समकालीन गीत-धारा को गतिशील रखने में नई पीढ़ी के गीतकारों का योगदान सर्वोपरि होगा , क्योंकि उन्हीं के कन्धों पर अब समकालीन गीत का भविष्य निर्भर रहेगा। कल्पना मनोरमा समकालीन गीत का एक नितान्त नया हस्ताक...