पत्थर भी जब प्रेम समझने लगता है
जब शब्द अपने अर्थ स्वयं खोने लगें , दीपक रोशनी छिपाने लगे , प्रेम कुंठित होने लगे , अपनी कौम ही गद्दारी करने लगे , नदी जल चुराने लगे और जब जीवन मृतप्राय बनने लगे तब " अन्या से अनन्या " कृति का सृजन नहीं होता तो क्या होता ? कैसे कोई अपना होते हुए “अन्य” की श्रेणी में आ जाता है? इस कृति का शब्द-शब्द पीड़ा में लोढ़ा-लथरा हुआ है। प्रभा खेतान का जीवन किसी की कृपा या अनुकम्पा पर नहीं बल्कि उनके जीने की गहरी इच्छा-जिजीविषा पर पनपा है। वे अपने जीवन को घाटी से शिखर तक अकेले लेकर गईं। उनकी जगह कमज़ोर मन वाली स्त्री यदि होती तो ये पुस्तक हमारे हाथों तक पहुँच ही नहीं पाती। कोई रस्सी , नदी या कुआँ उसे अपनाकर उसका खेल खत्म कर देता। इन दिनों प्रभा खेतान जी की आत्मकथा पढ़ कर खत्म कर रही हूँ। इस कृति ने अपने आप में दर्द की एक नहीं तमाम नदियाँ समाहित की हुई हैं। दूर-दूर तक रेत के समंदर पसरे पड़े हैं। कहीं-कहीं कुछ हरियाली अगर दिखती भी है तो वह सर्वोपांग कंटकों से अच्छादित है। इस आत्ममंथन कथा को पढ़ते हुए पाठक को एक ऐसी सुरंग मिलती है जिसमें अंधेरा ही अंधेरा है। चारों ओर अराजकता की सड़ांध...