माँ बच्चों का बसंत

माघ में ब्याह कर पिता के घर आई माँ फागुन में पतझड़ की चपेट में आ गयी तब से कई बसंत गुजर चुके हैं उसकी देह से एक कली न फूट सकी जब माँ में ख़ुशी का एक भी कल्ला नहीं फूटा तो इस भौतिक संसार में बंसत की चाल सिखाने से वंचित रह गई एक स्त्री दूसरी स्त्री को माँ बच्चों का बसंत होती है अगर माँ नहीं खिले तो बच्चे भी पूर्ण नहीं खिलते और इस तरह रह जाते हैं कुनबे बेरंग भरे बंसत में ... ! ***