आत्मकथ्य
कल्पना बेहद भावुक और बहुत साधारण जीवन जीने वाली एक लड़की है... जिसकी पसंद में दुनिया की हर छोटी-बड़ी वस्तु ,व्यक्ति और प्रकृति का विशेष स्थान है...नापसंद जैसा कोई शब्द उसके शब्दकोश में दर्ज नहीं है...जब तक कि सामने वाला सिर पर सवार न हो जाए क्योंकि उसका ये भी मानना है, दुनिया में स्वअस्तित्व के अपमान से बड़ा अपमान और कोई नहीं हो सकता... जब बात अपने स्वाभिमान की रक्षा की हो तो व्यक्ति को स्व की रक्षा करना भी आना चाहिए! इस प्रकार के प्रकरण में प्रतिभाग करना कल्पना का पसंदीदा विषय है, और हमारे समाज में ये कहा भी जाता है कि जब बात स्व सम्मान की हो तो हमें हंस की भाँती ही सोचना चाहिए,"कै हंसा मोती चुगै,कै भूखो ही मर जाय!"
कल्पना मनोरमा के जीवन जीने की अपनी कुछ सीमा रेखाएं हैं! जो उसने कुछ स्वयं निर्मित की हैं और कुछ उसकी माँ की दी हुई भी हैं! जिसके साथ सामंजस्य बैठा लेना उसको सदैव ही रुचिकर लगता रहा है! हँसना-हँसाना उसके जीवन का परम ध्येय और लक्ष्य रहा है! कल्पना का विश्वास इस बात पर पक्का है कि दुनिया में हर वस्तु,भाव, प्राणी या जीव निर्दुष्ट जन्मता है और दोषपूर्ण बनाना संसार का काम है! संसार के इसी द्वंद्व में व्यक्ति दूसरे को पीसता और खुद को पिसवाता रहता है...एक सजग रचनाकार निर्दुष्टता और दुष्टता के बीच की विशाल खाई को अपने जीवन के तमाम अनुभवों, शब्दों और भावों से भरने की कोशिश करता रहता है... जिस बात से समाज अनभिग्य होता है, रचनाकार उसको अपने अनुभव के द्वारा लिखकर उसके सामने प्रस्तुत करता चलता है!
कल्पना के लेखन का आधार लोक जीवन है... जब कल्पना ने दूसरों की पीड़ा में द्रवित होना सीख लिया तो उसकी भावनाओं ने भी अपने साथ शब्दों को एकीकृत करना सीख लिया और इस प्रकार कल्पना मनोरमा कविता-कहानी के माध्यम से अपने मन में समाहित आहत भावनाओं को शब्द देकर व्यक्त कर हल्की होने लगी!
रचनाकार का मन यदि टटोलना हो तो उसकी रचनाओं की छानबीन सिरे से की जानी चाहिए...उसकी रचनाओं में बहुत नहीं तो कुछ न कुछ वह स्वयं ज्यों का त्यों मिल जाएगा.खैर...! कल्पना ने अपने प्रफुल्लित और उमंगित मन के अनुरूप ही अपनी रचनाओं में सबसे पहले प्रकृति को ही उपमानों और प्रतीकों के रूप में चुना! आज भी भोर की पहली किरन उसके मन को भीतर तक नारंगी कर जाती है और शाम को क्षितिज पर उड़ते पखेरू उसको अपने साथ थोड़ा-सा उड़ा ले जाते हैं!
कल्पना मनोरमा की शाब्दिक सड़क पर लोक चेतना की रचनाओं के सुर-ताल तब बनने आरम्भ हुए जब उसने संसार को चालाकी और साफगोई से अपनी बात कहते कुछ और करते कुछ और सुना और देखा...अपनी बात से मुकरना कल्पना को मरने के बराबर लगता है तो भला संसार के द्वारा की गई मौक़ा परस्ती वह कैसे सहन कर पाती इसलिए मौखिक न सही लिखकर वह अपना विरोध दर्ज करवाने लगी !कल्पना जब से लेखन के क्षेत्र में आई है, स्वयं को किसी प्रकार की लेखिकीय दौड़ का हिस्सा न मानकर निरंतर चलने का संकल्प लेकर चलते रहने के लिए प्रतिबद्ध है! वह तो अपनी मंथर गति से साहित्यिक सफऱ तय करने में सहूलियत महसूस करती है ! उसका मानना है कि हड़बड़िया लेखन न ज्यादा दूर का सफर तय कर सकता है और न ही लिखने वाले का मन हल्का कर सकता है और जब लिखने वाला ही हल्का न हुआ तो पढ़ने वाले को सहूलियत ,आनन्द और प्रोत्साहन कैसे मिलेगा!
कल्पना मनोरमा के हिसाब से लेखन एक बेहद जिम्मेदारी का विषय है, इसको हल्के में नहीं लेना चाहिए क्योंकि रचना यदि समाज से उत्तपन्न होती है तो समाज के प्रति उसकी जवाबदेही भी बनती है जबकि कल्पना का ये भी मानना है कि कविता किसी समाज सुधारक या डिक्टेटर की तरह समाज में कार्य नहीं करती लेकिन उसे ये भी पता है कि कविता शांत भी नहीं बैठती। कविता पाठक के हृदय की भीतरी सतह को तरंगित कर धीरे-धीरे उस को अपने तथा समाज के प्रति जवाबदेह बनाती है...निडरता से जीना सिखाती है !
कल्पना के जीवन की बुनावट में सबसे बड़ा हाथ अगर किसी का है तो वो है उसकी माँ मनोरमा का...उन्होंने कल्पना के जीवन को संवारने में अपने अर्जित किये पुन्यप्रेम के साथ तमाम संवेदनात्मक अनुभवों, आत्मविश्वास, साहस, धैर्य, लगन, कर्मठता और आत्मसम्मान जैसे गुणों का इस्तेमाल निश्चित ही किया होगा! ऐसा रोजमर्रा की जिन्दगी में उसके आसपास रहने वाले लोग उसे बताते रहते हैं! कल्पना को अपनी माँ की एक बात बहुत ही प्रिय है. वे कहती थीं कि पहले तो बहुत सजगता से कार्य करो. यदि फिर भी गलती हो जाए तो सहज ही व्यक्ति को उसकी स्वीकारोक्ति होनी चाहिए! उसके लिए झूठे साक्ष्य जुटाना, समय को बर्वाद करना और स्थिति को उलझाकर विवाद उत्पन्न करना है! हाँ, ये कोशिश व्यक्ति को ज़रूर करनी चाहिए कि उस गलती को वह दोबारा न दोहराए...! कल्पना स्वयं को अपनी माँ की परिकल्पना ही मानती है! उनके बिना उसका रेत के कण जितना भी अस्तित्व नहीं!
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कल्पना मनोरमा का जन्म 04 जून, 1972 को इटावा, उत्तर प्रदेश में हुआ. कानपुर विश्वविद्यालय से एम. ए, (संस्कृत-हिंदी) बी.एड.(हिंदी) से किया. माध्यमिक विद्यालय में बीस वर्षों तक हिंदी-संस्कृत विषयों की अध्यापक रहीं। कुछ वर्षों तक अकादमिक पब्लिकेशन हाउस नोएडा में बतौर सीनियर एडिटर व हिंदी काउंसलर का पद-भार सम्हाला. अब पत्रकारिता व स्वतंत्र लेखन में संलग्न हैं.
उनकी प्रकाशित रचनाएँ हैं- “कब तक सूरजमुखी बनें हम”, “बाँस भर टोकरी”, “नदी सपने में थी”, “अब लौटने दो” कविता संग्रह प्रकाशित हैं. एक कहानी संग्रह ”एक दिन का सफ़र” एक बाल कथा संग्रह, दो कविता संग्रह “माँ से माँ तक”, “गईं सदी की स्त्रियाँ” के साथ दर्शन से जुड़ी कविताओं का संग्रह “एकांत में” प्रकाशन की राह पर है. कल्पना मनोरमा ने पुरुष पीड़ा जैसे- विशेष सन्दर्भों पर आधारित विषय पर दो कथा संग्रहों का “काँपती हुईं लकीरें”,”सहमी हुईं धडकनें” संकलन और संपादन भी किया है. कल्पना मनोरमा की कहानियों का पंजाबी,उर्दू, उड़िया में अनुवाद प्रकाशित हुए हैं.
विशेष– संत गाडगेबाबा अमरावती विश्वविद्यालय के बीकॉम प्रथम वर्ष में NEP के तहत नयी शिक्षा नीति में उनका निबंध ”सूचनाओं के दौर में हंस विवेक की दरकार” और कहानी “पहियों पर परिवार” शामिल है. कहानी “हँसो,जल्दी हँसो” को ‘स्वस्थ जीवन साहित्य’ प्रोजेक्ट में सम्मिलित किया गया है.
उन्हें ‘सूर्यकांत निराला सम्मान’,’लघुकथा लहरी सम्मान’, ‘आचार्य सम्मान’, ‘काव्य प्रतिभा सम्मान’ के साथ साहित्य समर्था टिक्कू पुरस्कार से कहानी ‘पिता की गंध’ तथा कथा समवेत के द्वारा धनपति देवी पुरस्कार से कहानी ‘कोचिंग रूम’ पुरस्कृत हो चुकी हैं.
ई-मेल : kalpanamanorama@gmail.com
Nic
ReplyDeleteबेहतरीन अभिव्यक्ति का का आधार अनुवांशिक है। बहुत बधाई सादर स्नेह सहित
ReplyDeleteशुभकामनाएं लेखन के लिये।
ReplyDeleteआप सभी सुधी जनों को हार्दिक अभिवादन और आभार !
ReplyDeleteरचनाकार का मन यदि टटोलना हो तो उसकी रचनाओं की छानबीन सिरे से की जानी चाहिए...उसकी रचनाओं में बहुत नहीं तो कुछ न कुछ वह स्वयं ज्यों का त्यों मिल जाएगा.
ReplyDeleteबिलकुल सही कहा आपने।
जीवन के विभिन्न मोड़ो से कैसे जिंदगी पहाड़ी नदी के समान ऊबड़-खाबड़ और टेड़े-मेढ़े राहों से आगे बढ़ती चली जाती हैं, यह बहुत समय बीत जाने के बाद समझ आता है।