आत्मकथ्य


कल्पना मनोरमा का जन्म जून 1972 को उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में नाना श्री रामकिशोर त्रिपाठी के घर हुआ. लालन-पालन, बाबा श्री विजय नारायण मिश्र के घर  हुआ. स्कूली शिक्षा मामा श्री रामविनोद त्रिपाठी जी के सानिद्ध्य में सम्पन्न हुई. (हिंदी-संस्कृत) विषय में स्नातक, परास्नातक और बी. एड. की शिक्षा ग्रहण करने के साथ-साथ कई  अन्य शिक्षात्मक कोर्स करने के लिये कल्पना के पिता पी.एन. मिश्र ने और कुछ पति राजीव बाजपेयी ने उसे कानपुर विश्वविद्यालय से लेकर जम्मू विश्विद्यालय से लेकर भारत के अन्य शहरों में रहकर पढ़ने-पढ़ाने के अवसर प्रदान करवाए हैं. कल्पना का मानना है कि  कुछ सीखते रहना मन को  स्वस्थ्य बनाये  रखना हैजैसे शरीर को स्वस्थ्य रहने के लिए सुबह की सैर  करते हैं. यादें ताज़ा रखने के लिए उनको अपने मन से कभी अलग नहीं होने देते हैं. ठीक उसी प्रकार मन को जवान रखने के लिए कुछ सीखना ज़रूरी है..खैर...!  
इस सबके बावजूद भी कल्पना ने काफ़ी  दिनों बाद अध्यापन कार्य आरम्भ किया...उसको हमेशा ये लगता रहा है कि एक स्त्री  के लिए उसके सारे दायित्यों के ऊपर माँ होने का दायित्व होता है, उसका निर्वहन भी स्त्री को अपना आपा  देकर ही पूरा करना चाहिए...वही उसके लिए श्रेयकर होगा....स्त्री चाहे जिस भूमिका में असफ़ल हो जाए,चलेगा लेकिन माँ की भूमिका में उसे सफ़ल होने के लिए  कठिन से कठिन प्रयास करना ही होगा!

ये देखा भी जाता है कि इस दुनिया से जब-जब एक स्त्री ने विदा ली है तब-तब उसके स्थान को भरने के लिए या तो स्वत: दूसरी  स्त्री पैदा हो गई है या लाकर रोप दी जाती है लेकिन जब उसी स्त्री ने माँ के रूप में इस संसार को छोड़ा, तो कोई भी उस स्थान को भर नहीं पाया... एक ये बात कल्पना को बेहद महत्वपूर्ण लगती है और  दूसरी बात ये कि जब एक स्त्री परलोक जाती है तो वह अपने समस्त अस्तिव को समेटे  साथ लिए चली जाती है लेकिन ऐसा करने में एक माँ असमर्थ हो जाती है... वह चाहकर भी सम्पूर्ण अस्तित्व अपने साथ नहीं  ले जा पाती ...कल्पना का तो ये मानना है कि माँ थोड़ी बहुत नहीं अपितु पूरी की पूरी बच्चों में छूट जाती है...स्त्री को इसलिए भी माँ की भूमिका निभाते समय बेहद सजग रहना चाहिए क्योंकि माँ बच्चे के लिए एक व्यक्ति विशेष भर नहीं होती अपितु समस्त ब्रह्मांड होती है...बच्चा नौ रस और समस्त मानवीय वृत्तियों का आकलन माँ को देख-सुनकर और उसकी गोदी का उयोग कर सीखता और सोखता है!

कल्पना बेहद भावुक और बहुत साधारण जीवन जीने वाली एक लड़की है... जिसकी पसंद में दुनिया की हर छोटी-बड़ी वस्तु ,व्यक्ति और प्रकृति का विशेष स्थान है...नापसंद जैसा कोई शब्द उसके  शब्दकोश में दर्ज नहीं है...जब तक कि सामने वाला सिर पर सवार न हो जाए क्योंकि उसका ये भी मानना है, दुनिया में स्वअस्तित्व के अपमान से बड़ा अपमान और कोई नहीं हो सकता... जब बात अपने स्वाभिमान की रक्षा की हो तो व्यक्ति को स्व की रक्षा करना भी आना चाहिए! इस प्रकार के प्रकरण में प्रतिभाग करना कल्पना का पसंदीदा विषय है, और हमारे समाज में ये कहा भी जाता है कि जब बात स्व सम्मान की हो तो हमें हंस की भाँती ही सोचना चाहिए,"कै हंसा मोती चुगै,कै भूखो ही मर जाय!"

कल्पना मनोरमा  के जीवन जीने की अपनी कुछ सीमा रेखाएं हैं!  जो उसने कुछ स्वयं निर्मित की हैं और कुछ उसकी माँ की दी हुई भी हैं! जिसके साथ सामंजस्य बैठा लेना उसको सदैव ही रुचिकर लगता रहा हैहँसना-हँसाना उसके जीवन का परम ध्येय और लक्ष्य रहा है! कल्पना का विश्वास इस बात पर पक्का है कि दुनिया में हर वस्तु,भावप्राणी या जीव निर्दुष्ट जन्मता है और दोषपूर्ण बनाना संसार का काम है! संसार के इसी द्वंद्व में व्यक्ति  दूसरे को पीसता और खुद को पिसवाता रहता है...एक सजग रचनाकार निर्दुष्टता और दुष्टता के बीच की विशाल खाई को अपने जीवन के तमाम अनुभवोंशब्दों और भावों से भरने की कोशिश करता रहता है... जिस बात से समाज अनभिग्य होता है, रचनाकार उसको अपने अनुभव के द्वारा लिखकर उसके सामने प्रस्तुत करता चलता है!

कल्पना को सपने देखना और उन्हें पूरा करना विरासत में मिला है! कठिन परिश्रम कर कुछ भी अर्जित कर लेना उसके माता-पिता के मन का काम रहा है...उनके संस्कार के रूप में ये गुण उसको स्वत: ही प्राप्त है...कल्पना को अपने जीवन से छोटी-छोटी-सी चाहनायें थीं कि कोई भी किसी से लड़े-झगड़े नहींसभी प्रेम से रहते हुए एक दूसरे का सम्मान करें! अपना जीवन मृदुलता से जियें और जीने दें किन्तु इस मायावी दुनिया में उसका ये सपना, सपना भर ही बनकर रह गया! जीवन  के कठोर धरातल पर जब उसने सीधे होकर चलना सीखा तो जूतियाँ पहनने के बावजूद भी कंकड़ उसके पाँव में चुभने लगेछोटे-छोटे मर्मान्तक द्वंद्व दूर से महीन जरूर लगते लेकिन वही उसके पाँवों को इस कदर घायल करने लगे कि जिसकी चुभन ने कल्पना के शरीर को ही सिर्फ घायल नहीं किया अपितु उसकी आत्मा तक को जख्मी कर दिया! बस इसी टीस ने उसके हाथ में कलम पकड़ा दी लिकिन जब तक उसको अपने होने का होश आया; तब तक तीन दशक का जीवन कुछ हँसकर,कुछ मौन होकर, कुछ रो-धोकर और कुछ व्यथित होकर गुजारा जा चुका था...लेकिन अब  कलम कल्पना के हाथ में थी और यहीं से उसका शब्द सफ़र आरम्भ  हुआ माना जा सकता है!  जिस जीवन को उसने भावनात्मक रूप से  जिया था अब वही उसको बहुत कुछ दिखाने और समझाने लगा था..उसने उस समाज को सिरे से देखना शुरू किया था जिसका एक भाग मूक होकर बस पीड़ा सहे जा रहा था और दूसरा अपने को सही शाबित करने में सामने वाले को धता बताये जा रहा था!

 कल्पना के लेखन का आधार लोक जीवन है... जब कल्पना ने दूसरों की पीड़ा में द्रवित होना सीख लिया तो उसकी भावनाओं ने भी अपने साथ शब्दों को एकीकृत करना सीख लिया और इस प्रकार कल्पना मनोरमा कविता-कहानी के माध्यम से अपने मन में समाहित आहत भावनाओं को शब्द देकर व्यक्त कर हल्की होने लगी!  

रचनाकार का मन यदि टटोलना हो तो उसकी रचनाओं की छानबीन सिरे से की जानी चाहिए...उसकी रचनाओं में  बहुत नहीं तो कुछ न कुछ वह स्वयं ज्यों का त्यों मिल जाएगा.खैर...! कल्पना ने अपने प्रफुल्लित और उमंगित मन के अनुरूप ही अपनी रचनाओं में सबसे पहले प्रकृति को ही उपमानों और प्रतीकों  के रूप में चुनाआज भी भोर की पहली किरन उसके मन को भीतर तक  नारंगी कर जाती है और शाम को क्षितिज पर उड़ते पखेरू उसको अपने साथ थोड़ा-सा उड़ा ले जाते हैं!

कल्पना मनोरमा की शाब्दिक सड़क पर लोक चेतना की रचनाओं के सुर-ताल तब बनने आरम्भ हुए जब उसने संसार को चालाकी और साफगोई से अपनी बात कहते कुछ और करते कुछ और सुना और देखा...अपनी बात से मुकरना कल्पना को  मरने के बराबर लगता है तो भला संसार के द्वारा की गई मौक़ा परस्ती वह कैसे सहन कर पाती  इसलिए मौखिक न सही लिखकर वह अपना विरोध दर्ज करवाने लगी !कल्पना जब से लेखन के क्षेत्र में आई हैस्वयं को किसी प्रकार की लेखिकीय दौड़ का हिस्सा न मानकर निरंतर चलने का संकल्प लेकर चलते रहने के लिए प्रतिबद्ध है! वह तो अपनी मंथर गति से साहित्यिक सफऱ तय करने में सहूलियत महसूस करती  है ! उसका मानना है कि हड़बड़िया लेखन न ज्यादा दूर का सफर तय कर सकता है और न ही लिखने वाले का मन हल्का कर सकता है और जब लिखने वाला ही हल्का न हुआ तो पढ़ने  वाले को सहूलियत ,आनन्द और प्रोत्साहन कैसे मिलेगा! 

कल्पना मनोरमा के हिसाब से लेखन एक बेहद जिम्मेदारी का विषय हैइसको हल्के में नहीं लेना चाहिए क्योंकि रचना यदि समाज से उत्तपन्न होती है तो समाज के प्रति उसकी जवाबदेही भी बनती है जबकि कल्पना का ये भी मानना है कि कविता किसी समाज सुधारक या डिक्टेटर की तरह समाज में कार्य नहीं करती लेकिन उसे ये भी पता है कि कविता  शांत भी नहीं बैठती। कविता पाठक के हृदय की भीतरी सतह को तरंगित कर धीरे-धीरे उस को अपने तथा समाज के प्रति जवाबदेह बनाती है...निडरता से जीना सिखाती है !

कल्पना के जीवन की बुनावट में सबसे बड़ा हाथ अगर किसी का है तो वो है उसकी माँ मनोरमा का...उन्होंने कल्पना के जीवन को संवारने में अपने अर्जित किये पुन्यप्रेम के साथ तमाम संवेदनात्मक अनुभवोंआत्मविश्वाससाहसधैर्यलगन, कर्मठता और आत्मसम्मान जैसे गुणों का इस्तेमाल निश्चित ही किया होगा! ऐसा रोजमर्रा की जिन्दगी में उसके आसपास रहने वाले लोग उसे बताते रहते हैं! कल्पना को अपनी माँ की एक बात बहुत ही प्रिय है. वे कहती थीं कि पहले तो बहुत सजगता से कार्य करो. यदि फिर भी गलती हो जाए तो सहज ही व्यक्ति को उसकी स्वीकारोक्ति होनी चाहिए! उसके लिए झूठे साक्ष्य जुटाना, समय को बर्वाद करना और स्थिति को उलझाकर विवाद उत्पन्न करना है! हाँ, ये कोशिश व्यक्ति को ज़रूर करनी चाहिए कि उस गलती को वह दोबारा न दोहराए...! कल्पना स्वयं को अपनी माँ की परिकल्पना ही मानती है! उनके बिना उसका रेत के कण जितना भी अस्तित्व नहीं! 

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कल्पना मनोरमा का जन्म 04 जून, 1972 को इटावा, उत्तर प्रदेश में हुआ. कानपुर विश्वविद्यालय से एम. ए, (संस्कृत-हिंदी) बी.एड.(हिंदी) से किया. माध्यमिक विद्यालय में बीस वर्षों तक हिंदी-संस्कृत विषयों की अध्यापक रहीं। कुछ वर्षों तक अकादमिक पब्लिकेशन हाउस नोएडा में बतौर सीनियर एडिटर व हिंदी काउंसलर का पद-भार सम्हाला. अब पत्रकारिता व स्वतंत्र लेखन में संलग्न हैं. 

उनकी प्रकाशित रचनाएँ हैं- “कब तक सूरजमुखी बनें हम”, “बाँस भर टोकरी”, “नदी सपने में थी”, “अब लौटने दो” कविता संग्रह प्रकाशित हैं. एक कहानी संग्रह ”एक दिन का सफ़र” एक बाल कथा संग्रह, दो कविता संग्रह “माँ से माँ तक”, “गईं सदी की स्त्रियाँ” के साथ दर्शन से जुड़ी कविताओं का संग्रह “एकांत में” प्रकाशन की राह पर है. कल्पना मनोरमा ने पुरुष पीड़ा जैसे- विशेष सन्दर्भों पर आधारित विषय पर दो कथा संग्रहों का “काँपती हुईं लकीरें”,”सहमी हुईं धडकनें” संकलन और संपादन भी किया है. कल्पना मनोरमा की कहानियों का पंजाबी,उर्दू, उड़िया में अनुवाद प्रकाशित हुए हैं.

 विशेष– संत गाडगेबाबा अमरावती विश्वविद्यालय के बीकॉम प्रथम वर्ष में  NEP के तहत नयी शिक्षा नीति में उनका निबंध ”सूचनाओं के दौर में हंस विवेक की दरकार” और कहानी “पहियों पर परिवार” शामिल है. कहानी “हँसो,जल्दी हँसो” को ‘स्वस्थ जीवन साहित्य’ प्रोजेक्ट में सम्मिलित किया गया है. 

उन्हें ‘सूर्यकांत निराला सम्मान’,’लघुकथा लहरी सम्मान’, ‘आचार्य सम्मान’, ‘काव्य प्रतिभा सम्मान’ के साथ साहित्य समर्था टिक्कू पुरस्कार से कहानी ‘पिता की गंध’ तथा कथा समवेत के द्वारा धनपति देवी पुरस्कार से कहानी ‘कोचिंग रूम’ पुरस्कृत हो चुकी हैं.


ई-मेल : kalpanamanorama@gmail.com





 

 

 

 

Comments

  1. बेहतरीन अभिव्यक्ति का का आधार अनुवांशिक है। बहुत बधाई सादर स्नेह सहित

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  2. शुभकामनाएं लेखन के लिये।

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  3. आप सभी सुधी जनों को हार्दिक अभिवादन और आभार !

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  4. रचनाकार का मन यदि टटोलना हो तो उसकी रचनाओं की छानबीन सिरे से की जानी चाहिए...उसकी रचनाओं में बहुत नहीं तो कुछ न कुछ वह स्वयं ज्यों का त्यों मिल जाएगा.
    बिलकुल सही कहा आपने।
    जीवन के विभिन्न मोड़ो से कैसे जिंदगी पहाड़ी नदी के समान ऊबड़-खाबड़ और टेड़े-मेढ़े राहों से आगे बढ़ती चली जाती हैं, यह बहुत समय बीत जाने के बाद समझ आता है।

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