रंगों का आस्वादी मन
मेरा अर्धशतक पूरा होने वाला है । संसार में आने के नाते लगभग-लगभग सभी प्रकार के त्योहारों और होली-दीवाली के साथ-साथ रिश्तों से प्राप्त खट्टे-मीठे हर तरह के आस्वाद से परिचित मेरा मन ढलान की ओर है। ढलान मतलब मैं किसी पहाड़ से नहीं लुढ़क रही हूँ बल्कि जगत रंग खुद में तिरोहित करने की दिशा में तत्पर है। वह जमाना चला गया जब वानप्रस्थी होकर कर्मण्डल धारण कर घर त्याग दिया जाता था। सच पूछो तो मुझे कबीर वाला त्याग अधिक भाता है। संसार के बीचोंबीच रहते, सूत कातते , गाढ़ा बुनते-बुनते माया की छलना से दो-दो हाथ करते हुए उसे त्यागने की हिम्मत जुटा लेना। कबीर के अनुसार सोचकर देखती हूँ तो यही लगता कि दुश्मन से छिपकर उसे जीतने में जश्न कैसा ? मैं उत्सव की बात कह रही थी। उत्सव माने कुछ क्षणों के लिए ही सही अपना फटा-पुराना झीना और उदास भूलने का एक सघन उपाय । लेकिन रंगों का आस्वादी मन मानवीय उत्सव की निर्वात नीरवता को पूरी तरह जान चुका है इसलिए कोई भी रंग मुझ पर उतना ही प्रभाव छोड़ पाता है जितना मैं उसे ग्रहण करना चाहती हूँ। लेकिन मेरे भीतर उल्लासित उर वाली एक माँ ...