भोर की पगडंडिया
मनुष्य सृष्टि का अद्भुत और विलक्षण प्राणी है। चेतना का अतिरिक्त हिस्सा , उसके मस्तिष्क के विकास के चलते उसके हिस्से आया है , उसने उसे सब प्राणियों में श्रेष्ठ बनाया। अर्थात चेतना प्राणी मात्र में विशेष भूमिका अदा करती है। जैसा कहीं मुक्तिबोध ने कहा है कि मनुष्य सामाजिक तौर पर और व्यक्तिगत तौर पर भी संस्कृत होता रहता है। ऐसा उसकी चेतना शक्ति के कारण ही होता है। रचना कर्म में रत मनुष्य अतिरिक्त संवेदनशीलता के कारण रागात्मक चेतना से अतिरिक्त रूप से समृद्ध होता है। वह अपनी रागात्मक चेतना के साथ संस्कृत होता हुआ अपने रचना पथ पर अग्रसर रहता है। कल्पना मनोरमा भी रचनाकार के तौर पर संस्कृत हुई हैं। किंतु संस्कृत होना क्योंकि एक प्रक्रिया है , सतत प्रक्रिया , अतः सातत्य उसका स्वाभाविक गुण है। इस प्रक्रिया में कुछ छूटता है , कुछ नया जुड़ता है तो कुछ मृत्युपर्यन्त यथावत् बना भी रहता है , या बना भी रह सकता है। प्रारंभिक संस्कार (बचपन के) इतने ताकतवर होते हैं और सहज रूप से व्यक्तित्व में प्रतिष्ठित होते हैं कि क्रांतिकारी परिवर्तन द्वारा ही उनसे मुक्त हुआ जा सकता है। कल्पना मनोरमा की लेखनी ऐसी कि...