सफल उड़ानों में सपनों के रंग

अभी भोर होना बाकी है। कालिमा इधर-उधर छितराई है। धरती सो रही है सुख की नींद लेकिन उसके आँगन में खड़े स्ट्रीट लैम्प अपलक किसी टॉर्च मैन की तरह अपनी निष्ठापूर्ण नौकरी में मग्न हैं । कितना जरूरी होता है अपने कर्तव्यों में निमग्न होना फिर चाहे कोई हमें देखे या न भी देखे। लैम्पों से झरती रौशनी के कारण दूब घास पूरी तरह से ओस से नहा नहीं सकी है | इसे देखते हुए लगा कि रौशनी के इन दीयों ने शहर को उजाला तो सौंपा है किंचित रूखा-सूखा भी बना दिया है इसे | ये बात इस लिए कह रही हूँ कि इस भागते-दौड़ते महानगर में अभी भी कुछ स्थान रात के सन्नाटे और अँधेरे की रजाई में पूरी तरह दुबक कर सोते हैं | जब कभी उन जगहों पर जाने को मिला तो उनका लालित्य देखते ही बना| उसको देखकर लगा मानो सुबह की थाली में प्रफुल्लित मन लुच-लुच गेंदे के फूल रखे हों | खैर आज की बात करूँ तो लगता है कि हवा छुट्टी पर गयी है; तभी तो वृक्षों की डालियाँ , अभी चार बजने को हैं और वे सो रही हैं | पत्तियाँ हिलना-डुलना भी चाहें तो सिवकाई में खलल पड़ेगी इसलि...