सहज मन से निकलीं गहन कविताएँ

"बाँस भर टोकरी" कृति की समीक्षक : वंदना बाजपेयी "धरती ने जगह दी पेड़ को पेड़ ने चिड़िया को चिड़िया ने आकाश को मैं भी तलाश रही हूँ जगह अपने लिए मिलेगी कभी तो करूंगी प्रयास पेड़ बनने का " वह कितना कोमल हृदय होगा जो पाने की जगह पेड़ बन जाने की अभिलाषा रखता होगा l एक ऐसा ही पेड़ साहित्य के आँगन में रोप दिया है अपने कविता संग्रह “ बाँस भर टोकरी ” के माध्यम से कल्पना मनोरमा जी ने। जैसा की कविता के लिए आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी का कथन है कि , “ जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है , उसी प्रकार हृदय की यह मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है। हृदय की इसी मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आई है , उसे कविता कहते हैं। “ कल्पना मनोरमा जी के कविता संग्रह “ बाँस भर टोकरी ” से गुजरते हुए मुझे आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के कथन के अनुसार हृदय की उसी मुक्तवस्था के दर्शन होते रहे हैं जो रसदशा में पाठक के हृदय को अपने में निमग्न करने की क्षमता रखती है। कल्पना मनोरमा की मुक्तछंद शैली में लिखी गई कविताएँ अपने तमाम बिंबात्मक प्रयोगों , कथ्य की ग...