चालाकियाँ
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“ सारा दिन काम करने के बाद यदि मैट्रो में सीट मिल जाए तो समझो बड़े पुन्य किये होंगे पिछले जन्म में । ” दो महिलाएँ बोलते हुए सीट पर बैठ गईं। उनमें एक साँवली और एक गोरी थी। इधर-उधर देखते हुए दोनों ने चट्ट-पट्ट मोबाइल निकाल लिए। “ देख , मैंने आज ये वाली कथा लिखी है। ” साँवली ने कहा, तो गोरी ने भी अपनी एक कथा पढ़ने का उससे आग्रह किया। साहित्य की नैया पर दोनों सवार हो हिचकोलें खाने लगी थीं। बातों का सिलसिला विद्यालय के लेक्चर से होते हुए लिंचिग तक आ पहुँचा था । थोड़ी देर में उबासी भरते हुए दोनों ने मोबाइल बैग में रख लिए। “ तूने देखा , वीरचंद को! सबकी उलटी-सीधी कथाएँ भी उसे बड़ी अच्छी लगती है। जब देखो सबकी पोस्ट पर “ बहुत सुंदर ” “ अति उत्तम ” लिखे पड़ा रहता है। मुझे तो लगता है साला टिप्पणियों को भी कॉपी पेस्ट करता होगा , सुंदर सुंदर सुंदर…. हा हा हा। ” गोरी वाली महिला ने परिहास में कहा। “ अरे पूच्छो ही मत , बुरा हाल हुआ पड़ा है एफ.बी.पर। ” साँवली ने सहमति दिखाई । “ हे हे हे! वैसे मैं कोई बड़ी लेखिका तो नहीं। और बड़ा बनने...