हरसिंगार वाले दिन

हरसिंगार वाले दिन माने, मेरे बचपन का हरा उमंगित रंग , उत्सव की समृद्धशाली गमक , माँ का गीला स्नेह , सपनों का मोहक संसार , शाम ढले पखेरुओं की कतारें में पंछिओं को गिनने की खुद से होड़, प्रकृति के सानिध्य की परिकल्पना में निजता पुष्पित होने का प्रतिक है। आज भी जब हम कंक्रीट के जंगल में समय बिताने के लिए मजबूर हैं तब भी हर वर्ष अश्विन मास की आबोहवा में जो सौंधापन घुलकर मेरे पास तक चला आता है, वह हमारी जड़ों द्वारा सोखी हुई ताजगी है जो कभी सूखती नहीं । यह समय दुर्गा माँ की मर्यादाओं का घंटनाद वातावरण में व्याप्त कर स्त्री की भूमिका को चौमुख दीया जैसा दमका जाता है। बरसाती मन निर्मल पवन की तरह उल्लासित हो स्मृतियों की भूमि पर चुए हरसिंगार चुनने दौड़ पड़ता है । हरसिंगार के फूल रात की आँखों में फूले प्रकृति के सपने होते हैं, जो सूरज की पहली किरण पर पृथ्वी पर बरसकर अरुणोदय को अपना श्वेतवर्णी आह्लाद सौंप देता है और पवन के दुपट्टे पर इत्र की नरम फ़ुहार छिड़क कर अपना जीवन धन्य बना लेता है । इस मौसम में क्षितज का पसीजना शुरू होना और वनस्पतियों को ओस का मिलना ऋतु...