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मन की आँखें

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                                                     मन की आँखें दशहरे की छुट्टियाँ पड़ रही थीं। सेंट मेरी स्कूल की पाँचवीं कक्षा के बच्चे शैक्षिक भ्रमण पर अजमेर जाने वाले थे। स्कूल में यात्रा के लिए नाम लिखे जा रहे थे। जब कक्षा अध्यापक ने हार्दिक और उसके छोटे भाई आभार से पूछा कि कौन जाना चाहता है, तो आभार ने तुरंत सिर हिला दिया। “सर, मुझे इतिहास बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। आप भैया को ही ले जाइए। उन्हें पुराने किले और राजाओं की कहानियाँ बहुत पसंद हैं।” बच्चे खिलखिलाकर हँस पड़े। हार्दिक भी मुस्करा दिया। दादी ने जब से पृथ्वीराज चौहान की कहानी सुनाई थी, तब से वह अजमेर जाने का सपना देख रहा था। आखिर वह दिन आ ही गया।    बस अरावली की पहाड़ियों के बीच से धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी। बस में बच्चों की हँसी-ठिठोली गूँज रही थी। खिड़की के पास बैठा हार्दिक बाहर के दृश्य निहार रहा था। तभी उसकी नज़र दूर एक पहाड़ी पर बने प्राचीन किले पर पड़ी। उसे...

हरा समंदर (बाल भारती के ताज़ा अंक में)

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                              हरा समंदर  परेल की शिरोडकर चॉल में धीरे-धीरे सुबह उतर रही थी। पंछी आसमान की सैर पर निकल पड़े थे। अँधेरे की चादर अभी पूरी तरह फटी भी नहीं थी कि किसी ने गली का नलका खोल दिया। पानी की धार बाल्टी में गिरी और चहल-पहल शुरू हो गई। उस दिन रविवार था। किसी को भी कहीं जाने की जल्दी नहीं थी। सिवाय गोपी की माँ के। गोपी सो रहा था। बाहर की आवाज़ें धीरे-धीरे उसकी नींद के किनारों को थपकने लगी थीं। गोपी के पापा अख़बार पढ़ रहे थे। पढ़ते-पढ़ते उनकी नज़र एक खबर पर ठहर गई। समुद्र के बारे में लिखा था। लिखा था, “आने वाले सालों में मुंबई के कुछ किनारे पानी में समा सकते हैं।” पापा कुछ देर स्तब्ध रह गए। खबर को बार-बार पढ़ते रहे फिर अख़बार मोड़कर रख दिया। उनके मन में एक ही बात बार-बार उठ रही थी... कि वे बहुत दिनों से गोपी को समुद्र दिखाने की बात टालते आ रहे थे। कहीं...! नहीं नहीं, आज ले जाऊँगा। उन्होंने पत्नी को आवाज़ लगाई, “मीना, आज गोपी को समुद्र दिखा लाएँ क्या?” रसोई से माँ की आवाज़ आई, “साथ...

गलती और चरित्र एक ही बात नहीं

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            गलती और चरित्र एक ही बात नहीं        बुनियादी चिंतन : बालिका से वामा | स्तंभ 34 जीवन में लिए गए कुछ निर्णय सही सिद्ध होते हैं। कुछ गलत साबित होते हैं। कुछ संबंध टिकते हैं। कुछ टूट जाते हैं। कुछ अवसरों पर हमें संतोष मिलता है। कुछ अवसरों पर लगता है कि शायद हम बेहतर कर सकते थे। जबकि मनुष्य होने का अर्थ ही अपूर्ण होना है। फिर भी स्त्रियाँ अपनी किसी गलती को केवल एक घटना की तरह नहीं देख पातीं। वे उसे अपने व्यक्तित्व से जोड़कर देखने लगती हैं। चूक होने पर वे यह नहीं सोचतीं कि निर्णय गलत था। उन्हें लगने लगता है कि स्वयं उनमें ही कोई कमी है। यहीं से एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठता है। स्त्री की पृष्ठभूमि क्या रही। उसे स्नेह और संस्कार देने वाले हाथ तथा मन कैसे थे? क्योंकि कोई भी भावनात्मक प्रवृत्ति अचानक विकसित नहीं होती। ऐसे में यह समझना आवश्यक है कि इसका कारण केवल सामाजिक प्रशिक्षण है या इसके पीछे मनुष्य की कुछ गहरी भावनात्मक संरचनाएँ भी कार्य करती हैं। मानी हुई बात है कि लड़कियों को बचपन से संबंधों की भाषा निज भाषा से पहले स...

मन के पिंजरे

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          मन के पिंजरे वर्तमान समय का एक लोकप्रिय विश्वास है कि मनुष्य को सबसे अधिक बाँधने का काम परंपराएँ करती हैं। जैसे ही रूढ़ियों और बंधनों की बात आती है उँगली सबसे पहले परंपरा की ओर उठती है। मानो मानवीय दुखों के पिंजरे बाहर खड़े हों और उनकी चाबियाँ किसी और के हाथ में हों। पर क्या सचमुच ऐसा है? जीवन के अनुभव धीरे-धीरे एक दूसरी बात सिखाते हैं। बहुत से पिंजरे ऐसे होते हैं जिन्हें मनुष्य स्वयं बनाता है। वे पिंजरे लोहे या लकड़ी के नहीं होते। वे हमारी धारणाओं भय पूर्वाग्रहों असुरक्षाओं और अहंकार से बने होते हैं। मनुष्य उन्हें इतना अपना मान लेता है कि उनकी सलाखें दिखनी बंद हो जाती हैं। परंपराएँ निश्चित रूप से प्रश्नों से परे नहीं हैं। उनमें बहुत कुछ ऐसा हो सकता है जिसे बदलने की आवश्यकता हो। समय के साथ हर समाज अपने अनुभवों की समीक्षा करता है। लेकिन यह मान लेना कि जो कुछ पुराना है वह अनिवार्य रूप से बंधन ही है एक सरल निष्कर्ष होगा। जीवन इतनी सरल रेखाओं में नहीं चलता। यदि परंपराएँ केवल पिंजरे होतीं तो मनुष्य पीढ़ियों तक उनसे जुड़ा क्यों रहता? हर परंपर...

बुराई का पूर्ण कद

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बुराई का पूर्ण कद बुरे लोगों के साथ बुरा होने में इतनी देर क्यों लगती है? यह प्रश्न लगभग हर मनुष्य के भीतर कभी न कभी उठता है। क्योंकि हम देखते हैं कि छल करने वाले आगे बढ़ रहे हैं, झूठ बोलने वाले सम्मान पा रहे हैं और दूसरों को पीड़ा देने वाले बिना किसी दंड के सुख से जी रहे हैं। ऐसे में न्याय और नैतिकता के बारे में हमारी सहज धारणाएँ डगमगाने लगती हैं। मन पूछता है, यदि बुराई का अंत निश्चित है, तो उसमें इतनी देर क्यों लगती है? शायद इसका उत्तर बुराई की प्रकृति में ही छिपा है। बहुत विचार करने के बाद कहना चाहती हूँ कि बुराई तब तक भस्म नहीं होती, जब तक वह अपने पूर्ण कद को प्राप्त नहीं कर लेती। वह अपने छोटे रूप में समाप्त नहीं होती। संसार की संरचना का यह एक विचित्र सत्य है। यहाँ जन्म और मृत्यु साथ-साथ चलते हैं। विस्तार की आकांक्षा भी एक स्वभाव है। जिस तरह अच्छाई जन्म लेती है, उसी तरह बुराई भी जन्म लेती है, फैलती है, अपने नए-नए रूप गढ़ती है और धीरे-धीरे उस स्थिति तक पहुँचती है जहाँ उसके लिए स्वयं को छिपाए रखना संभव नहीं रह जाता। वहीं से उसके अवसान की शुरुआत होती है। हमारे मिथकों में य...

हाँ और ना के बीच स्त्री का सच

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हाँ और ना के बीच स्त्री का सच मानव सभ्यता की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक संवाद है। संवाद ही रिश्तों, समाज और संस्कृति की नींव बनाता है। किंतु संवाद तभी सार्थक होता है जब उसमें सभी पक्षों को अपनी बात कहने और अपनी इच्छाअभ व्यक्त करने की स्वतंत्रता हो। स्त्री के संदर्भ में यह प्रश्न विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि इतिहास और समाज दोनों ने अनेक बार उसकी आवाज़ को सीमित करने का प्रयास किया है। ऐसे में “हाँ” और “ना” जैसे साधारण प्रतीत होने वाले शब्द स्त्री के जीवन में गहरे अर्थ ग्रहण कर लेते हैं। इन दोनों के बीच उपस्थित संकोच, मौन, दुविधा और दबाव को समझे बिना स्त्री की सहमति को समझना संभव नहीं है। सहमति (Consent) केवल किसी प्रश्न के उत्तर में दिया गया एक शब्द नहीं है। यह व्यक्ति की स्वतंत्र इच्छा, भावनात्मक स्वीकृति और मानसिक सहजता से जुड़ी हुई प्रक्रिया है। मनोविज्ञान बताता है कि यदि किसी व्यक्ति को लगातार अपनी असहमति व्यक्त करने से हतोत्साहित किया जाए, तो वह धीरे-धीरे अपनी वास्तविक भावनाओं को दबाना सीख सकता है। हमारे समाज के अनेक परिवेशों में लड़कियों को आज भी विनम...

जब लेखक ब्रांड बनने लगे

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    आज की जनधारा में आवरण कथा के रूप में लेख     जब लेखक ब्रांड बनने लगे   साहित्य का इतिहास उठाकर देखा जाए तो लेखक कभी केंद्र में नहीं था, उसकी रचना थी। पाठक पुस्तक खोलता था तो वह लेखक के व्यक्तित्व से नहीं, उसके विचारों, उसके अनुभवों और उसकी संवेदनाओं से मिलना चाहता था। बहुत-से पाठकों ने प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, मुक्तिबोध या निर्मल वर्मा को पढ़ा, बिना यह जाने कि वे दिखते कैसे थे। उनकी पहचान उनके शब्द थे, उनका चेहरा नहीं। लेकिन इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक तक आते-आते साहित्य की दुनिया में एक मौन परिवर्तन घटित हुआ। लेखक धीरे-धीरे रचना से बाहर निकलकर स्वयं एक दृश्य उपस्थिति में बदलने लगा। अब केवल पुस्तक का प्रकाशित होना पर्याप्त नहीं रहा, लेखक का दिखाई देना भी आवश्यक हो गया। उसे मंचों पर उपस्थित होना था, सोशल मीडिया पर सक्रिय रहना था, अपने पाठकों से लगातार संवाद करना था और सबसे बढ़कर स्वयं को एक पहचान के रूप में स्थापित करना था। यहीं से लेखक के "ब्रांड" बनने की प्रक्रिया शुरू होती है। पहली दृष्टि में यह परिवर्तन स्वाभाविक लगता है। हर युग अपने ...