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बंदिशों के बीच शिक्षा का उजास

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                   बंदिशों के बीच शिक्षा का उजास स्त्री शिक्षा केवल किसी एक व्यक्ति, परिवार या समुदाय का प्रश्न नहीं है, बल्कि सभ्यता के विकास, सामाजिक न्याय और मानवीय प्रगति का आधार है। किसी भी समाज की प्रगति का आकलन इस बात से किया जा सकता है कि वहाँ महिलाओं को शिक्षा, अभिव्यक्ति और आत्मनिर्णय के कितने अवसर उपलब्ध हैं। शिक्षा स्त्री को केवल अक्षरज्ञान नहीं देती, बल्कि अपने अस्तित्व को समझने, प्रश्न करने, निर्णय लेने और समाज में सक्रिय भागीदारी निभाने की क्षमता भी प्रदान करती है। यही कारण है कि इतिहास के प्रत्येक परिवर्तनकारी दौर में स्त्री शिक्षा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। फिर भी यह विडम्बना रही है कि लंबे समय तक दुनिया के अधिकांश समाजों में महिलाओं की शिक्षा को सीमित करने का प्रयास किया गया। परंपराएँ, सामाजिक रूढ़ियाँ, आर्थिक परिस्थितियाँ और लैंगिक पूर्वाग्रह उनके मार्ग में बाधा बनते रहे। इसके बावजूद अनगिनत स्त्रियों ने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी ज्ञान की लौ को जीवित रखा और आने वाली पीढ़ियों के लिए नए रास्ते बनाए। शिक...

कविताएं

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                  कवयित्री: कल्पना मनोरमा  

"एक दिन का सफ़र" कथा संग्रह पर प्रतिक्रियाएं

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स्कूल, कोचिंग और भय का उद्योग

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ज्ञानार्जन अब केवल एक साधारण प्रक्रिया नहीं रही। बल्कि ज्ञान प्राप्त करना एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था में बदल चुका है, जिसमें अभिभावकों की आर्थिक और मानसिक क्षमता लगातार क्षीण हो रही है। पिछले दो दशकों में निजी स्कूलों, कोचिंग संस्थानों और प्रतियोगी परीक्षाओं की बढ़ती संस्कृति ने शिक्षा को ऐसे ढाँचे में ढाल दिया है, जहाँ सामान्य आय वाला परिवार भी असाधारण खर्च करने के लिए विवश हो रहा है। और जब-जब ऐसा होता है तो सामान्य आय वाले माता-पिता अपनी संतान को शिक्षा दिलाने के लिए त्याग नहीं, अपनी जिंदगी भी दांव पर लगा देते हैं। हमारे यहाँ शिक्षा व्यवस्था शायद दुनिया की अकेली ऐसी व्यवस्था है, जहाँ बच्चे को स्कूल भेजना ही काफी नहीं। माता-पिता को लगता है कि उनके बच्चे भी स्कूल से लौटकर कोचिंग जाएँ। मानो दिन का पहला हिस्सा केवल उपस्थिति दर्ज कराने में निकल गया और दूसरा, जो कोचिंग के नाम खर्च होता है, उसमें बच्चा तकनीक से लेकर भाषा, गणित सबकी शिक्षा ग्रहण कर ले। सुबह सात बजे बस स्टॉप पर खड़े बच्चों को देखिए। पीठ पर इतने बड़े बैग कि लगता है वे किताबें नहीं, पूरा भविष्य ढो रहे हैं। कुछ घंटों के...

पेंच कटने के बाद

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         पेंच कटने के बाद यूँ तो झाड़ियों में अटकना बिल्कुल ठीक नहीं, लेकिन जब कोई तुम्हें अचानक छोड़ ही दे, पेंच काट ही दे, तो तुम पतंग बन जाना। आसमान न सही, किसी झाड़ी पर टिक जाना। कोई न कोई तुम्हें उतार लेगा, जीत की खुशी के साथ। पतंग का झाड़ी या पेड़ की शाख पर अटक जाना सामान्यतः एक दुर्घटना माना जाता है। वह अब आकाश में नहीं है। उसकी डोर टूट चुकी है। उसकी दिशा और गति दोनों छिन चुकी हैं। लेकिन यदि ध्यान से देखा जाए तो वह पूरी तरह नष्ट भी नहीं हुई है। वह अब भी मौजूद है, किसी शाख पर, किसी उलझन के बीच, किसी अनिश्चित प्रतीक्षा में। शायद जीवन के कुछ अनुभव भी ऐसे ही होते हैं। वे हमें यह समझाते हैं कि हर टूटन का अर्थ अंत नहीं होता। जीवन में ऐसे दिन भी आते हैं जब लगता है कि अब कुछ नहीं बचा। जो अपना था, वह छूट गया। जिस रास्ते पर चल रहे थे, वह बंद हो गया। जिन लोगों पर भरोसा था, वे साथ नहीं रहे। ऐसे समय में मनुष्य को किसी बड़ी जीत की नहीं, अपितु इतना भर जान लेने की आवश्यकता होती है कि इतना सब घट जाने के बाद भी उसका जीवन बचा हुआ है। हम ऐसे समाज में रहते हैं जहा...

भाषा में इज़्ज़त देना : पुरातन मूल्य

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भाषा में इज़्ज़त देना : पुरातन मूल्य बुनियादी चिंतन : बालिका से वामा (स्तंभ–35)    "भाषा में इज़्ज़त देना" आज कुछ लोगों को पुराना विचार लग सकता है। कई बार सम्मानजनक भाषा की बात होते ही यह आशंका भी व्यक्त की जाती है कि कहीं यह लड़कियों को फिर से विनम्रता, सहनशीलता और चुप्पी के पुराने खाँचों में लौटाने का प्रयास तो नहीं है। यह आशंका निराधार नहीं क्योंकि हमारे समाज में लंबे समय तक स्त्रियों को "संस्कार" और "मर्यादा" के नाम पर अपनी बात दबाने के लिए भी कहा जाता रहा है। इसलिए जब हम भाषा में सम्मान की बात करते हैं, तो सबसे पहले यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि सम्मानजनक भाषा का अर्थ चुप रहना नहीं है और न ही अन्याय को सह लेना है। दरअसल सम्मान और मौन एक ही बात नहीं हैं। सम्मान और अधीनता भी एक नहीं हैं। कोई लड़की यदि किसी गलत बात का विरोध करती है, किसी भेदभाव पर प्रश्न उठाती है या अपने अधिकारों के लिए आवाज़ बुलंद करती है, तो वह असम्मान नहीं कर रही होती है। बल्कि वह अपने मानवीय अधिकार का प्रयोग कर रही होती है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब हम सम्मान को केवल ...

बालमन, प्रकृति और संवेदना का सुंदर संसार : ‘देखा एक सपना’

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बालमन, प्रकृति और संवेदना का सुंदर संसार : ‘देखा एक सपना’ डॉ कल्पना दीक्षित  सुप्रसिद्ध लेखिका कल्पना मनोरमा जी के सद्यः प्रकाशित बाल-कहानी संग्रह "देखा एक सपना" में दस से अधिक कहानियाँ संकलित हैं। बच्चों में जिज्ञासा जगाना, प्रश्न पूछने की क्षमता विकसित करना, अनुशासन, समस्याओं के समाधान की ओर बढ़ने की ललक, सीखने के लिए मस्तिष्क को उत्प्रेरित करना, विधि और निषेध में अंतर समझने की योग्यता बढ़ाना तथा आपसी सम्मान बनाए रखना—इन कहानियों के माध्यम से संभव होता है। प्रकृति की प्रत्येक इकाई मिलकर समष्टि का निर्माण करती है और समष्टि में ही सुख निहित है, जबकि एकांत में अध्ययन योग्यता-वर्धक सिद्ध होता है। "देखा एक सपना" कहानी दो मानवेतर इकाइयों का संवाद है। बुलबुल और पेड़ के संवाद में समझ और संवेदना विन्यस्त है। लेखिका ने पर्यायवाची शब्दों का प्रयोग बड़ी चातुरी से किया है। यहीं बच्चों के मस्तिष्क में व्यापकता का संधान होता है। पेड़ के कई नाम हैं—पादप, तरु, वृक्ष आदि। यहाँ मेधा के बहुआयामी होने का बीज-वपन है। घोंसला बनाने की सामग्री और श्रमसाध्य प्रक्रिया को कहानी म...