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देखा एक सपना : बालमन की खिड़की से जीवन-दर्शन

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      समीक्षक : वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. सुरेंद्र विक्रम देखा एक सपना : बालमन की खिड़की से जीवन-दर्शन कविताओं के बाद कहानियाँ बच्चों की दूसरी पसंद होती हैं। विशेष रूप से बच्चे उन कहानियों को अधिक पढ़ना चाहते हैं, जिनमें उनका अपना संसार समाया होता है। उनके आसपास का वातावरण, उनकी अपनी दुनिया, उनका मनोविज्ञान, उनकी सूझ-बूझ और उन्हें भीतर तक स्पर्श करती भाषा-शैली—इन सबके मेल से जो वातावरण निर्मित होता है, वही महत्त्वपूर्ण बालसाहित्य की आधारभूमि बनता है। कल्पना मनोरमा अपने बालकथा-संग्रह ‘देखा एक सपना’ में जिस विनम्रता और सहजता के साथ अपने भावों को पिरोते हुए अलग-अलग प्रतीकों के माध्यम से अपनी बात कहती हैं, वह पाठकों के मानस-पटल पर लंबे समय तक अंकित रहती है। संग्रह के आरंभ में प्रकृति के विभिन्न उपादानों के माध्यम से किशोर पीढ़ी के लिए की गई यह कामना अत्यंत अर्थपूर्ण है— «आँचल फैलाकर माँगती हूँ अपनी किशोर पीढ़ी के लिए आसमान से विचारों की ऊँचाई और खुलापन धरती से गहराई और धैर्य वायु से ताजगी और सहज बहाव दूब से नम जिजीविषा फलदार वृक्षों से विनम्रता और सौहार्...

पंडिता रमाबाई

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पंडिता रमाबाई  भारतीय स्त्री मेधा : सीमाओं में रहकर असीमित होना चुना। स्तंभ 2 पंडिता रमाबाई का जन्म 23 अप्रैल 1858 को हुआ। उनके पिता अनंत शास्त्री डोंगरे संस्कृत के विद्वान थे और वे स्त्रियों की शिक्षा के समर्थक थे। उन्होंने अपनी पत्नी लक्ष्मीबाई को संस्कृत सिखाई और लक्ष्मीबाई आगे रमाबाई की पढ़ाई में प्रेरणा बनीं। रमाबाई की शुरुआती शिक्षा घर में ही हुई। माँ उन्हें संस्कृत के श्लोक और धार्मिक ग्रंथ पढ़ाती थीं। उस समय लड़कियों के लिए संस्कृत और शास्त्रों का अध्ययन सामान्य नहीं माना जाता था। घर में मिली इस शिक्षा ने रमाबाई को केवल बहुत कुछ याद करना नहीं सिखाया, बल्कि स्वयं सीखने का भरोसा भी दिया। आगे चलकर यही शिक्षा उनकी विद्वत्ता की पहली नींव बनी। रमाबाई का बचपन एक जगह ठहरकर नहीं बीता। उनके पिता धार्मिक ग्रंथों का पाठ करते थे और इसी क्रम में परिवार को अलग-अलग स्थानों की यात्रा करनी पड़ती थी। इन यात्राओं में रमाबाई ने भारत के अनेक क्षेत्रों और वहाँ के जीवन को करीब से देखा। परिवार की आर्थिक स्थिति कठिन थी, फिर भी पढ़ने और शास्त्रों को समझने का क्रम बना रहा। कम उम्र में ही उ...

स्त्री से स्त्री तक: विरासत का खेल*

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*स्त्री से स्त्री तक: विरासत का खेल* बुनियादी चिंतन: बालिका से वामा।।स्तंभ 44 विरासत का अर्थ केवल भूमि, संपत्ति या आभूषण नहीं होता। हर पीढ़ी अगली पीढ़ी को विचार, जीवन-मूल्य, अनुभव, स्मृतियाँ और जीवन जीने का ढंग भी सौंपती है। स्त्रियों के संदर्भ में यह प्रक्रिया और गहरी हो जाती है। परिवार और समाज में एक स्त्री जिस तरह रहती है, काम करती है, संबंध बनाती है और परिस्थितियों का सामना करती है, उसका कोई न कोई अंश अगली पीढ़ी तक पहुँचता रहता है। यह विरासत हमेशा शब्दों में नहीं होती। वह व्यवहार, चुप्पी, निर्णय और संघर्ष से निपटने के तरीकों में भी दिखाई देती है। इस अर्थ में एक स्त्री दूसरी स्त्री को केवल परंपरा नहीं देती, बल्कि अपने जीवन से बनी एक दृष्टि भी सौंपती है। यही दृष्टि आगे चलकर उसके अपने जीवन और सामाजिक समझ का हिस्सा बन सकती है। इस विरासत का पहला स्वरूप भाषा है। बच्ची दुनिया को पहचानना अपने आसपास की स्त्रियों की भाषा से शुरू करती है। वह केवल शब्द और संबोधन नहीं सीखती, बल्कि यह भी समझती है कि किससे कैसे बोलना चाहिए, कहाँ अपनी बात रखनी है और कहाँ चुप रह जाना है। वह जानने लगती ह...

भारतीय स्त्री मेधा : सीमाओं में रहकर असीमित होना चुना।

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                        सावित्रीबाई फुले भारतीय स्त्री मेधा : सीमाओं में रहकर असीमित होना चुना। स्तंभ 1 कल्पना मनोरमा  भारत की धरती ने ऐसी अनेक महिलाओं को जन्म दिया है, जिन्होंने अपने समय की सीमाओं को तोड़ा और समाज को नई दिशा दी। उन्होंने साबित किया कि स्त्री केवल घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं है। उसकी बुद्धि, संवेदना, कल्पना और साहस समाज को बदल सकते हैं।  ऐसी ही महान स्त्री थीं सावित्रीबाई फुले। सावित्रीबाई का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र में हुआ था। उनका बचपन ऐसे समय में बीता, जब लड़कियों की पढ़ाई को जरूरी नहीं माना जाता था। समाज में यह धारणा गहरी थी कि शिक्षा पुरुषों का अधिकार है, और लड़कियों का काम केवल घर संभालना है। उनका विवाह कम उम्र में ज्योतिराव फुले से हुआ। ज्योतिराव शिक्षा और सामाजिक समानता के समर्थक थे। उन्होंने सावित्रीबाई को पढ़ना-लिखना सिखाया। सावित्रीबाई ने भी पूरे मन से शिक्षा ग्रहण की। यही शिक्षा आगे चलकर उनके जीवन का सबसे बड़ा हथियार बनी। उन्होंने समझ लिया था कि शिक्षा केवल अक्षर पहचा...

प्रेम में स्त्री : इच्छा, चुनाव और आत्मसम्मान

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प्रेम में स्त्री : इच्छा, चुनाव और आत्मसम्मान  बुनियादी चिंतन : बालिका से वामा | स्तंभ 43 प्रेम शाश्वत है। उसे सीखा नहीं जाता, फिर भी जीव-जगत परस्पर जीवन जीने के लिए उसके व्यवहार और उसकी भाषा सीखता है। शायद प्रेम को नहीं, प्रेम के लेन-देन को सीखना पड़ता है। स्त्री ने भी प्रेम के बारे में बहुत कुछ सीखा है। लेकिन सदियों से उसे प्रेम करने से अधिक प्रेम की प्रतीक्षा करना, दूसरों पर अपना बहुमूल्य लुटाना सिखाया गया। किसी को दुःख न हो, इसलिए स्वयं सह लेना। संबंध बना रहे, इसलिए अपनी सुविधाएँ छोड़ देना। और दूसरे की जरूरतों को अपनी जरूरतों से पहले रखना। इन सबको स्त्री के प्रेम के प्रमाण के रूप में देखा गया। लेकिन इस पूरे अभ्यास में एक प्रश्न अक्सर अनकहा रह गया। स्त्री की अपनी इच्छा कहाँ है?    यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि स्त्री को लंबे समय तक प्रेम की वस्तु की तरह देखा गया, प्रेम करने वाले मनुष्य की तरह कम। उसके लिए यह तय किया जाता रहा कि किससे विवाह करना उचित है, किससे संबंध रखना उचित है, किस उम्र में प्रेम करना चाहिए और किस तरह का साथी उसके लिए स्वीकार्य होग...

लिव-इन संबंध : साथ रहने की स्वतंत्रता और जिम्मेदारी

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लिव-इन संबंध : साथ रहने की स्वतंत्रता और जिम्मेदारी बुनियादी चिंतन : बालिका से वामा | स्तंभ 42   प्रत्येक वयस्क स्त्री को अपने जीवन के बारे में अपनी पसंद से सोचने और फैसला लेने का हक होना चाहिए। किसी के साथ रहना है या नहीं, किसके साथ जीवन बिताना है, इन बातों का फैसला आखिर उसी व्यक्ति को करना चाहिए, जिसके जीवन का सवाल है। परिवार और समाज अपनी राय दे सकते हैं, लेकिन उसे थोपना ठीक नहीं। हाँ, अपनी मर्जी से लिया गया फैसला अपने साथ कुछ जिम्मेदारियाँ भी लेकर आता है। आजादी का मतलब यह नहीं कि उसके बाद आने वाले फैसलों और उनके असर की चिंता ही न की जाए। लिव-इन संबंध विवाह से अलग व्यवस्था हैं और दोनों को एक ही नजर से देखना ठीक नहीं होगा। लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं कि ऐसे रिश्ते में रहने वाली महिला हर तरह के कानूनी या सामाजिक सहारे से बाहर हो जाती है। कुछ परिस्थितियों में कानून उसे सुरक्षा और अधिकार देता है। इसलिए लिव-इन को न तो विवाह मान लेना ठीक है, न ऐसी व्यवस्था समझना, जिसमें महिला के अधिकारों की कोई जगह ही नहीं है। फिर भी किसी रिश्ते की पूरी कहानी कानून के सहारे नहीं समझी जा सकती...

लीक से हटकर बाल कहानी संग्रह: देखा एक सपना

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लीक से हटकर बाल कहानी संग्रह: देखा एक सपना  -रश्मि अस्थाना  यह सच है कि हर मुलाकात एक बहाना होती है। कुछ यूं ही मेरी मुलाकात कल्पना जी से हुई। उनसे मेरी मुलाकात फेसबुक की मार्फत हुई। मैं अक्सर उनकी रचनाएं फेसबुक पर पढ़ती थी। एक दिन उनके बाल कहानी संग्रह 'देखा एक सपना' की पोस्ट देखी। उसकी रूपरेखा, उसके चित्र देखकर कुछ ऐसा अंदाज़ा सा हुआ कि यह कुछ अलग है। हालांकि, मीडिया पर बहुत सी पुस्तकों की चर्चाएं होती रहती हैं। लेकिन ऐसा होता है कि पोस्ट से नज़र हटी और बात आई-गई हो गई। लेकिन उस पुस्तक को देखकर कुछ ऐसा लगा कि नहीं, इसमें कुछ तो बात है। इसे देखना चाहिए, पढ़ना चाहिए। पुस्तक प्राप्त हुई और मैंने उसको पढ़ा तो लगा कि मेरा अंदाज़ा ठीक था। वास्तव में उनका बाल कहानी संग्रह लीक से हटकर है। ऐसी कहानियां जो आपको सपनों की दुनिया में ले जाती हैं, एक ऐसे संसार में, जहां बचपन हंसता-मुस्कुराता है, जहां केवल कोमल भाव हैं, जहां पर कोई चतुराई नहीं है, सिर्फ नादानियां हैं, अपनापन है, चुलबुलाहट है और साथ ही बहुत कुछ जानने की इच्छा भी है और अंत में एक शिक्षा भी। पुस्तक की हर कहानी ...