स्त्री और समाज : घर से बाहर नागरिक होने का अर्थ
स्त्री और समाज : घर से बाहर नागरिक होने का अर्थ बुनियादी चिंतन : बालिका से वामा | स्तंभ 46 स्त्री की पहचान अक्सर उसके रिश्तों से की जाती है। वह किसी की बेटी है, पत्नी है, माँ है, बहन है। इन सभी संबंधों का अपना महत्व है। लेकिन इन पहचानों के बीच स्त्री की एक पहचान कई बार पीछे छूट जाती है। वह स्वयं एक नागरिक है। यहाँ यह समझना होगा कि नागरिक होना केवल मतदान करने तक सीमित नहीं है। इसका अर्थ है अपने आसपास की दुनिया को देखना और यह समझना कि उसमें जो कुछ हो रहा है, उसका संबंध उसके अपने जीवन से भी है। बच्चे और रसोई की जिम्मेदारियों के साथ सड़क की स्थिति, विद्यालय की व्यवस्था, पानी, अस्पताल, सार्वजनिक परिवहन, महिलाओं की सुरक्षा, पर्यावरण, रोजगार और स्थानीय प्रशासन जैसे विषय भी स्त्री के जीवन से जुड़े हैं। ये केवल पुरुषों या किसी विशेष व्यक्ति को समझने के मुद्दे ही नहीं हैं, बल्कि समाज के साझा मुद्दे हैं। भारतीय संविधान ने नागरिकों को समानता, स्वतंत्रता और गरिमा के अधिकार दिए हैं। संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की बात करता है और अनुच्छेद 15 लिंग सहित कुछ आधारों पर भेदभाव ...