प्रेम में स्त्री : इच्छा, चुनाव और आत्मसम्मान
प्रेम में स्त्री : इच्छा, चुनाव और आत्मसम्मान बुनियादी चिंतन : बालिका से वामा | स्तंभ 43 प्रेम शाश्वत है। उसे सीखा नहीं जाता, फिर भी जीव-जगत परस्पर जीवन जीने के लिए उसके व्यवहार और उसकी भाषा सीखता है। शायद प्रेम को नहीं, प्रेम के लेन-देन को सीखना पड़ता है। स्त्री ने भी प्रेम के बारे में बहुत कुछ सीखा है। लेकिन सदियों से उसे प्रेम करने से अधिक प्रेम की प्रतीक्षा करना, दूसरों पर अपना बहुमूल्य लुटाना सिखाया गया। किसी को दुःख न हो, इसलिए स्वयं सह लेना। संबंध बना रहे, इसलिए अपनी सुविधाएँ छोड़ देना। और दूसरे की जरूरतों को अपनी जरूरतों से पहले रखना। इन सबको स्त्री के प्रेम के प्रमाण के रूप में देखा गया। लेकिन इस पूरे अभ्यास में एक प्रश्न अक्सर अनकहा रह गया। स्त्री की अपनी इच्छा कहाँ है? यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि स्त्री को लंबे समय तक प्रेम की वस्तु की तरह देखा गया, प्रेम करने वाले मनुष्य की तरह कम। उसके लिए यह तय किया जाता रहा कि किससे विवाह करना उचित है, किससे संबंध रखना उचित है, किस उम्र में प्रेम करना चाहिए और किस तरह का साथी उसके लिए स्वीकार्य होग...