बूमर पीढ़ी की स्त्रियाँ : मौन की विरासत
बूमर पीढ़ी की स्त्रियाँ : मौन की विरासत बुनियादी चिंतन : बालिका से वामा स्तंभ 36 आजकल सोशल मीडिया और रोज़मर्रा की बातचीत में 'बूमर' शब्द अक्सर सुनाई देता है। कभी इसका प्रयोग मज़ाक में होता है तो कभी किसी को पुराने विचारों वाला बताने के लिए। लेकिन क्या हम जानते हैं कि यह शब्द केवल एक आयु वर्ग का परिचायक नहीं है। यह एक पूरे सामाजिक दौर, उसकी जीवन शैली, सोच, संघर्ष और मूल्यों का प्रतिनिधित्व करता है। किसी भी पीढ़ी को केवल उसके जन्म वर्ष से नहीं समझा जा सकता। उसके समय, परिस्थितियों और अनुभवों को समझना भी उतना ही आवश्यक है। बेबी बूमर पीढ़ी में सामान्यतः 1946 से 1964 के बीच जन्मे लोगों को रखा जाता है। भारत में यह वह समय था जब देश स्वतंत्र तो हो चुका था, लेकिन समाज अब भी परंपराओं की मजबूत पकड़ में था। संसाधन सीमित थे, परिवार बड़े थे और स्त्री की भूमिका लगभग पहले से तय मानी जाती थी। लड़कियों को बचपन से ही त्याग, सहनशीलता, मर्यादा और परिवार की प्रतिष्ठा का पाठ पढ़ाया जाता था, जबकि बेटों को अपेक्षाकृत अधिक अवसर और स्वतंत्रता मिलती थी। यही वह पीढ़ी थी जिसने सामाजिक असमानताओं, ...