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दो किनारों के बीच

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दो किनारों के बीच 20 जुलाई 2026 आज सुबह फेसबुक खोला। कल गोल चक्कर ऑनलाइन पत्रिका पर संपादक देवेश पथ सारिया ने मेरी कुछ डायरियाँ प्रकाशित की थीं। सहज ही मन उस पोस्ट की ओर लौट गया। यह देखने की एक स्वाभाविक उत्सुकता थी कि कितने लोगों ने उन्हें पढ़ा और किसने क्या कहा होगा। लेकिन वहाँ कुछ भी विशेष नहीं जुड़ा था। उसी क्षण भीतर एक प्रश्न ने सिर उठाया। क्या कला सचमुच दूसरों की स्वीकृति पर आश्रित होती है? क्या रचनाकार की तृप्ति पाठकों की प्रतिक्रिया से निर्मित होती है? थोड़ी देर बाद लगा, नहीं। कला अपने स्वभाव में स्वतंत्र है। वह स्वयं में पूर्ण है। वह किसी प्रशंसा की अपेक्षा नहीं करती। वह ब्रह्म की भाँति स्वयंसिद्ध है। रचनाकार केवल उसका माध्यम है। फिर भी प्रत्येक रचना के बाद उसके भीतर यह जानने की एक सहज आकांक्षा होती है कि जो अनुभूति उसके भीतर उदित हुई थी, क्या वह शब्दों में उसी ताप और उसी सत्य के साथ उतर सकी? पाठकों की प्रतिक्रियाओं में वह अपनी प्रतिष्ठा नहीं, अपनी अभिव्यक्ति की प्रामाणिकता खोजता रहता है। इन्हीं विचारों के बीच फेसबुक की न्यूज़ फ़ीड में एक चित्र ...

मिलेनियल स्त्रियाँ : अपनी पहचान की तलाश (1981–1996)

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मिलेनियल स्त्रियाँ : अपनी पहचान की तलाश (1981–1996) बुनियादी चिंतन : बालिका से वामा ।। स्तंभ 38 समय कभी अकेला नहीं बदलता। उसके साथ मनुष्य की दृष्टि, जीवन के मूल्य और समाज की संरचना भी बदलती है। एक पीढ़ी के अनुभव अगली पीढ़ी की विरासत बनते हैं और उसी विरासत पर भविष्य अपनी नई संभावनाएँ निर्मित करता है। भारतीय समाजशास्त्री योगेन्द्र सिंह का मानना है कि भारतीय समाज में परंपरा और आधुनिकता परस्पर विरोधी नहीं हैं। बदलते समय में परंपराएँ नए रूप ग्रहण करती हैं और आधुनिकता उन्हें नए अर्थ प्रदान करती है। बूमर और जेनरेशन एक्स की स्त्रियों ने जिन संघर्षों से परिवर्तन की राह बनाई, उसी विरासत पर मिलेनियल स्त्रियों ने अपने जीवन की नींव रखी। वे उस पीढ़ी की प्रतिनिधि हैं जिसने बदलते भारत को केवल देखा नहीं, बल्कि उसे अपने जीवन में जिया भी। उनका बचपन आज की पीढ़ी से अलग था। गर्मियों की छुट्टियाँ ननिहाल में बीतती थीं। मोहल्ले में सब एक दूसरे को जानते थे। बच्चों की डाँट और कभी-कभार की पिटाई को भी पालन-पोषण का सामान्य हिस्सा माना जाता था। अनुशासन को अधिकार से अधिक स्नेह और जिम्मेदारी का विस्तार समझ...

जेनरेशन एक्स की स्त्रियाँ : बदलाव की दहलीज़

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जेनरेशन एक्स की स्त्रियाँ : बदलाव की दहलीज़ बुनियादी चिंतन : बालिका से वामा | स्तंभ 37   हर पीढ़ी अपने समय की संतान होती है। वह अपने युग से केवल जीवन नहीं पाती, बल्कि सोचने के औज़ार भी जुटाती है। समय बदलता है तो जीवन चलाने के ही नहीं, उसके विचारों के औज़ार भी बदलते हैं। यही कारण है कि हर पीढ़ी दुनिया को एक अलग दृष्टि से देखती है। अपने जीवन स्रोतों को समझने का प्रयास करती है।     स्त्रियों की जीवन यात्रा में यह परिवर्तन और भी गहरा दिखाई देता है। भारतीय समाज में एक स्त्री की पहली पाठशाला कोई विद्यालय नहीं, दूसरी स्त्री होती है। वह जन्म लेते ही अपनी माँ, दादी, नानी, बुआ, मौसी और अपने आसपास की स्त्रियों को देखना, सुनना और पढ़ना शुरू कर देती है। बोलना सीखने से बहुत पहले वह जीना सीख रही होती है। वह देख रही होती है कि एक स्त्री कैसे हँसती है, कैसे चुप रहती है, कैसे निर्णय लेती है, कैसे अपने हिस्से का दुःख सहती है और अपने हिस्से का सम्मान बचाती है। इस अर्थ में हर स्त्री,चाहे या न चाहे, अगली पीढ़ी की स्त्री का अपने नजरिए का निर्माण कर रही होती है। इसीलिए किसी भी समाज म...

बालमन, प्रकृति और संस्कारों का जीवंत संसार : ‘देखा एक सपना’

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बालमन, प्रकृति और संस्कारों का जीवंत संसार : ‘देखा एक सपना’ समकालीन हिंदी बालसाहित्य में ऐसे रचनाकार अपेक्षाकृत कम हैं, जो मनोरंजन और शिक्षण के बीच संतुलन स्थापित करते हुए बच्चों की जिज्ञासाओं, भावनाओं और सामाजिक सरोकारों को रचनात्मक रूप से अभिव्यक्त कर सकें। कल्पना मनोरमा इसी श्रेणी की सशक्त बालसाहित्यकार हैं। उनकी रचनाओं में बालमन की सहजता, प्रकृति के प्रति अनुराग, मानवीय संवेदनाएँ तथा जीवन-मूल्यों के प्रति गहरी आस्था दिखाई देती है। उनका बाल कहानी-संग्रह ‘देखा एक सपना’ इस दृष्टि से उल्लेखनीय है कि इसमें संगृहीत ग्यारह कहानियाँ केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं बनतीं, बल्कि बच्चों के भीतर संस्कार, संवेदना और सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने का कार्य भी करती हैं। बालसाहित्य की सार्थकता इसी में है कि वह बच्चे को उपदेश देकर नहीं, बल्कि अनुभव और आनंद के माध्यम से जीवन की उपयोगी सीख प्रदान करे। ‘देखा एक सपना’ इस कसौटी पर सफल सिद्ध होता है। संग्रह की कहानियाँ विविध विषयों को समेटे हुए हैं- प्रकृति, परिवार, अनुशासन, पर्यावरण, आत्मनिर्भरता, श्रम-सम्मान, आत्मविश्वास और सामाजिक उत्तरदायित्...

बूमर पीढ़ी की स्त्रियाँ : मौन की विरासत

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बूमर पीढ़ी की स्त्रियाँ : मौन की विरासत बुनियादी चिंतन : बालिका से वामा स्तंभ 36 आजकल सोशल मीडिया और रोज़मर्रा की बातचीत में 'बूमर' शब्द अक्सर सुनाई देता है। कभी इसका प्रयोग मज़ाक में होता है तो कभी किसी को पुराने विचारों वाला बताने के लिए। लेकिन क्या हम जानते हैं कि यह शब्द केवल एक आयु वर्ग का परिचायक नहीं है। यह एक पूरे सामाजिक दौर, उसकी जीवन शैली, सोच, संघर्ष और मूल्यों का प्रतिनिधित्व करता है। किसी भी पीढ़ी को केवल उसके जन्म वर्ष से नहीं समझा जा सकता। उसके समय, परिस्थितियों और अनुभवों को समझना भी उतना ही आवश्यक है। बेबी बूमर पीढ़ी में सामान्यतः 1946 से 1964 के बीच जन्मे लोगों को रखा जाता है। भारत में यह वह समय था जब देश स्वतंत्र तो हो चुका था, लेकिन समाज अब भी परंपराओं की मजबूत पकड़ में था। संसाधन सीमित थे, परिवार बड़े थे और स्त्री की भूमिका लगभग पहले से तय मानी जाती थी। लड़कियों को बचपन से ही त्याग, सहनशीलता, मर्यादा और परिवार की प्रतिष्ठा का पाठ पढ़ाया जाता था, जबकि बेटों को अपेक्षाकृत अधिक अवसर और स्वतंत्रता मिलती थी। यही वह पीढ़ी थी जिसने सामाजिक असमानताओं, ...

तीन सहेलियाँ

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                    तीन सहेलियाँ बरगद के बड़े-से पेड़ की जड़ों में चींटियों का एक बड़ा-सा नगर बसा था। सूरज की पहली किरण पड़ते ही वहाँ चहल-पहल शुरू हो जाती। कोई भोजन की खोज में निकल पड़ता, कोई बच्चों की देखभाल में लग जाता, तो कोई नए रास्ते खोजने में जुट जाता। उसी नगर में तीन सहेलियाँ रहती थीं। लाली, काली और गोरी। लाली बहुत फुर्तीली थी। उसे दूर-दूर तक जाकर दाने खोजने में मज़ा आता था। काली समझदार थी, मगर धीरे-धीरे चलती थी। चलते समय वह गंध की एक पतली-सी लकीर छोड़ती जाती, ताकि पीछे आने वाली चींटियाँ, चाहे कितनी भी थकी हों, रास्ता न भूलें। गोरी धैर्यवान थी। वह भारी-से-भारी सामान को भी सावधानी से घर तक पहुँचाने में माहिर थी। एक सुबह तीनों भोजन की तलाश में निकलीं। बाग में पेड़-पौधे हवा में डोल रहे थे। ओस से भीगी घास धूप में चमक रही थी। तभी लाली की नज़र गेहूँ के एक बड़े दाने पर पड़ी। उसने खुशी से आवाज़ लगाई, "देखो, देखो! मुझे क्या मिला!" गोरी दौड़ती हुई वहाँ पहुँची और दाने को देखकर दंग रह गई। "इतना बड़ा दाना! इसे कौन ले जा सकता ह...

एक दिन का सफ़र ( समीक्षा: आशा पाण्डेय)

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मनुष्य के अंतर्मन की यात्राओं का कथा-संसार : एक दिन का सफर कल्पना मनोरमा का प्रथम कहानी-संग्रह एक दिन का सफर समकालीन हिंदी कथा-साहित्य में अपनी विशिष्ट संवेदनात्मक दृष्टि और मानवीय सरोकारों के कारण ध्यान आकर्षित करता है। संग्रह में कुल बारह कहानियाँ संकलित हैं, जिनमें स्त्री जीवन, पारिवारिक संबंध, सामाजिक विसंगतियाँ, पीढ़ियों के बदलते मूल्य, आर्थिक संघर्ष, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और मानवीय आत्मबल जैसे विविध विषयों को कथा का आधार बनाया गया है। इन कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें बाहरी घटनाओं की अपेक्षा पात्रों के भीतर घटित होने वाली मानसिक और भावनात्मक प्रक्रियाएँ अधिक महत्वपूर्ण हैं। इस दृष्टि से यह संग्रह केवल घटनाओं का नहीं, बल्कि मनुष्य के अंतर्मन की यात्राओं का दस्तावेज़ बन जाता है। संग्रह की पहली कहानी ‘कितनी कैदें’ सामाजिक पूर्वाग्रहों और स्त्री जीवन पर लगाए गए अनावश्यक प्रतिबंधों की मार्मिक कथा है। कहानी यह रेखांकित करती है कि संदेह, बदनामी का भय और पितृसत्तात्मक सोच किस प्रकार एक लड़की के व्यक्तित्व और उसके भविष्य को प्रभावित कर सकते हैं। कहानी की ब...