दो किनारों के बीच
दो किनारों के बीच 20 जुलाई 2026 आज सुबह फेसबुक खोला। कल गोल चक्कर ऑनलाइन पत्रिका पर संपादक देवेश पथ सारिया ने मेरी कुछ डायरियाँ प्रकाशित की थीं। सहज ही मन उस पोस्ट की ओर लौट गया। यह देखने की एक स्वाभाविक उत्सुकता थी कि कितने लोगों ने उन्हें पढ़ा और किसने क्या कहा होगा। लेकिन वहाँ कुछ भी विशेष नहीं जुड़ा था। उसी क्षण भीतर एक प्रश्न ने सिर उठाया। क्या कला सचमुच दूसरों की स्वीकृति पर आश्रित होती है? क्या रचनाकार की तृप्ति पाठकों की प्रतिक्रिया से निर्मित होती है? थोड़ी देर बाद लगा, नहीं। कला अपने स्वभाव में स्वतंत्र है। वह स्वयं में पूर्ण है। वह किसी प्रशंसा की अपेक्षा नहीं करती। वह ब्रह्म की भाँति स्वयंसिद्ध है। रचनाकार केवल उसका माध्यम है। फिर भी प्रत्येक रचना के बाद उसके भीतर यह जानने की एक सहज आकांक्षा होती है कि जो अनुभूति उसके भीतर उदित हुई थी, क्या वह शब्दों में उसी ताप और उसी सत्य के साथ उतर सकी? पाठकों की प्रतिक्रियाओं में वह अपनी प्रतिष्ठा नहीं, अपनी अभिव्यक्ति की प्रामाणिकता खोजता रहता है। इन्हीं विचारों के बीच फेसबुक की न्यूज़ फ़ीड में एक चित्र ...