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एक दिन का सफ़र ( समीक्षा: आशा पाण्डेय)

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मनुष्य के अंतर्मन की यात्राओं का कथा-संसार : एक दिन का सफर कल्पना मनोरमा का प्रथम कहानी-संग्रह एक दिन का सफर समकालीन हिंदी कथा-साहित्य में अपनी विशिष्ट संवेदनात्मक दृष्टि और मानवीय सरोकारों के कारण ध्यान आकर्षित करता है। संग्रह में कुल बारह कहानियाँ संकलित हैं, जिनमें स्त्री जीवन, पारिवारिक संबंध, सामाजिक विसंगतियाँ, पीढ़ियों के बदलते मूल्य, आर्थिक संघर्ष, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और मानवीय आत्मबल जैसे विविध विषयों को कथा का आधार बनाया गया है। इन कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें बाहरी घटनाओं की अपेक्षा पात्रों के भीतर घटित होने वाली मानसिक और भावनात्मक प्रक्रियाएँ अधिक महत्वपूर्ण हैं। इस दृष्टि से यह संग्रह केवल घटनाओं का नहीं, बल्कि मनुष्य के अंतर्मन की यात्राओं का दस्तावेज़ बन जाता है। संग्रह की पहली कहानी ‘कितनी कैदें’ सामाजिक पूर्वाग्रहों और स्त्री जीवन पर लगाए गए अनावश्यक प्रतिबंधों की मार्मिक कथा है। कहानी यह रेखांकित करती है कि संदेह, बदनामी का भय और पितृसत्तात्मक सोच किस प्रकार एक लड़की के व्यक्तित्व और उसके भविष्य को प्रभावित कर सकते हैं। कहानी की ब...

देखा एक सपना (समीक्षा : शिखर जैन)

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कल्पना मनोरमा भाषा की अध्यापक रही हैं। वे संस्कृत और हिंदी की विद्वान हैं। जाहिर है, इन दोनों भाषाओं में उनका ज्ञान अत्यंत समृद्ध होगा। लेकिन जब वे बच्चों के लिए कथाएं लिखती हैं तो उन्हें पता होता है कि बाल साहित्य लेखक की विद्वता का भौंडा प्रदर्शन नहीं, बल्कि परिपक्वता का दर्पण होना चाहिए। एक अच्छे बालसाहित्यकार को यह पता होना चाहिए कि वह जिन पाठकों के लिए लिख रहा है, उन्हें क्या सीखना, समझना, जानना और पढ़ना चाहिए। "निक्कू फेमस हो गया" कहानी के शीर्षक में लेखिका ने अंग्रेज़ी के "फेमस" शब्द का प्रयोग किया है। इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि वे इसके हिंदी शब्द से परिचित नहीं हैं। बल्कि वे जानती हैं कि साहित्य की ग्राह्यता के लिए उसका पाठकों से जुड़ाव भी ज़रूरी है। समय की नज़ाकत को देखते हुए इस कहानी में आप एक्टिविटी, पेटीएम और 50 आउट ऑफ 50 इन एवरी सब्जेक्ट जैसे अंग्रेजी शब्दों और वाक्यों को पढ़ सकते हैं।   उन्होंने दूब-सी नरम और लचीली, मगर मजबूत जड़ों वाली 11 बाल जीवनोपयोगी, रोचक कहानियाँ लिखकर बच्चों का साहित्य थोड़ा और समृद्ध कर दिया है। इतना ही नहीं, पुस्तक...

स्त्री और बुनियादी संवेदनशीलता का प्रश्न

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स्त्री और बुनियादी संवेदनशीलता का प्रश्न बुनियादी चिंतन : बालिका से वामा। स्तंभ – 35 किसी भी सभ्यता का वास्तविक स्वरूप उसके वैभव, तकनीकी प्रगति या आर्थिक शक्ति से नहीं, बल्कि उसकी मानवीय संवेदनशीलता से पहचाना जाता है। जब किसी समाज में क्रूरता सामान्य अनुभव बनने लगे और हिंसा केवल आचरण में नहीं, बल्कि विचार, भाषा और संबंधों में भी दिखाई देने लगे, तब संकट केवल कानून और व्यवस्था का नहीं रहता। वह मनुष्यता के क्षरण का संकेत बन जाता है। उस स्थिति में यह प्रश्न गौण हो जाता है कि हिंसा करने वाला स्त्री है या पुरुष। मूल प्रश्न यह होता है कि मनुष्य के भीतर कितना मनुष्य शेष है। किसी भी व्यक्ति को संबंध स्वीकार करने या अस्वीकार करने की स्वतंत्रता प्राप्त होना उसका मौलिक अधिकार है। किसी विवाह, संबंध या निर्णय के लिए "ना" कहना भी उसी स्वतंत्रता का स्वाभाविक विस्तार है। किन्तु जब असहमति, अपमान या असफल संबंध का उत्तर प्रतिशोध या बर्बरता बन जाए, तब प्रश्न केवल अपराध का नहीं रह जाता। वह नैतिक चेतना के विघटन का प्रश्न बन जाता है। प्रत्येक अधिकार अपने साथ उत्तरदायित्व भी लेकर आता है, ...

बंदिशों के बीच शिक्षा का उजास

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                   बंदिशों के बीच शिक्षा का उजास स्त्री शिक्षा केवल किसी एक व्यक्ति, परिवार या समुदाय का प्रश्न नहीं है, बल्कि सभ्यता के विकास, सामाजिक न्याय और मानवीय प्रगति का आधार है। किसी भी समाज की प्रगति का आकलन इस बात से किया जा सकता है कि वहाँ महिलाओं को शिक्षा, अभिव्यक्ति और आत्मनिर्णय के कितने अवसर उपलब्ध हैं। शिक्षा स्त्री को केवल अक्षरज्ञान नहीं देती, बल्कि अपने अस्तित्व को समझने, प्रश्न करने, निर्णय लेने और समाज में सक्रिय भागीदारी निभाने की क्षमता भी प्रदान करती है। यही कारण है कि इतिहास के प्रत्येक परिवर्तनकारी दौर में स्त्री शिक्षा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। फिर भी यह विडम्बना रही है कि लंबे समय तक दुनिया के अधिकांश समाजों में महिलाओं की शिक्षा को सीमित करने का प्रयास किया गया। परंपराएँ, सामाजिक रूढ़ियाँ, आर्थिक परिस्थितियाँ और लैंगिक पूर्वाग्रह उनके मार्ग में बाधा बनते रहे। इसके बावजूद अनगिनत स्त्रियों ने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी ज्ञान की लौ को जीवित रखा और आने वाली पीढ़ियों के लिए नए रास्ते बनाए। शिक...

कविताएं

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                  कवयित्री: कल्पना मनोरमा  

"एक दिन का सफ़र" कथा संग्रह पर प्रतिक्रियाएं

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स्कूल, कोचिंग और भय का उद्योग

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ज्ञानार्जन अब केवल एक साधारण प्रक्रिया नहीं रही। बल्कि ज्ञान प्राप्त करना एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था में बदल चुका है, जिसमें अभिभावकों की आर्थिक और मानसिक क्षमता लगातार क्षीण हो रही है। पिछले दो दशकों में निजी स्कूलों, कोचिंग संस्थानों और प्रतियोगी परीक्षाओं की बढ़ती संस्कृति ने शिक्षा को ऐसे ढाँचे में ढाल दिया है, जहाँ सामान्य आय वाला परिवार भी असाधारण खर्च करने के लिए विवश हो रहा है। और जब-जब ऐसा होता है तो सामान्य आय वाले माता-पिता अपनी संतान को शिक्षा दिलाने के लिए त्याग नहीं, अपनी जिंदगी भी दांव पर लगा देते हैं। हमारे यहाँ शिक्षा व्यवस्था शायद दुनिया की अकेली ऐसी व्यवस्था है, जहाँ बच्चे को स्कूल भेजना ही काफी नहीं। माता-पिता को लगता है कि उनके बच्चे भी स्कूल से लौटकर कोचिंग जाएँ। मानो दिन का पहला हिस्सा केवल उपस्थिति दर्ज कराने में निकल गया और दूसरा, जो कोचिंग के नाम खर्च होता है, उसमें बच्चा तकनीक से लेकर भाषा, गणित सबकी शिक्षा ग्रहण कर ले। सुबह सात बजे बस स्टॉप पर खड़े बच्चों को देखिए। पीठ पर इतने बड़े बैग कि लगता है वे किताबें नहीं, पूरा भविष्य ढो रहे हैं। कुछ घंटों के...