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हाँ और ना के बीच स्त्री का सच

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हाँ और ना के बीच स्त्री का सच मानव सभ्यता की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक संवाद है। संवाद ही रिश्तों, समाज और संस्कृति की नींव बनाता है। किंतु संवाद तभी सार्थक होता है जब उसमें सभी पक्षों को अपनी बात कहने और अपनी इच्छाअभ व्यक्त करने की स्वतंत्रता हो। स्त्री के संदर्भ में यह प्रश्न विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि इतिहास और समाज दोनों ने अनेक बार उसकी आवाज़ को सीमित करने का प्रयास किया है। ऐसे में “हाँ” और “ना” जैसे साधारण प्रतीत होने वाले शब्द स्त्री के जीवन में गहरे अर्थ ग्रहण कर लेते हैं। इन दोनों के बीच उपस्थित संकोच, मौन, दुविधा और दबाव को समझे बिना स्त्री की सहमति को समझना संभव नहीं है। सहमति (Consent) केवल किसी प्रश्न के उत्तर में दिया गया एक शब्द नहीं है। यह व्यक्ति की स्वतंत्र इच्छा, भावनात्मक स्वीकृति और मानसिक सहजता से जुड़ी हुई प्रक्रिया है। मनोविज्ञान बताता है कि यदि किसी व्यक्ति को लगातार अपनी असहमति व्यक्त करने से हतोत्साहित किया जाए, तो वह धीरे-धीरे अपनी वास्तविक भावनाओं को दबाना सीख सकता है। हमारे समाज के अनेक परिवेशों में लड़कियों को आज भी विनम...

जब लेखक ब्रांड बनने लगे

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    आज की जनधारा में आवरण कथा के रूप में लेख     जब लेखक ब्रांड बनने लगे   साहित्य का इतिहास उठाकर देखा जाए तो लेखक कभी केंद्र में नहीं था, उसकी रचना थी। पाठक पुस्तक खोलता था तो वह लेखक के व्यक्तित्व से नहीं, उसके विचारों, उसके अनुभवों और उसकी संवेदनाओं से मिलना चाहता था। बहुत-से पाठकों ने प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, मुक्तिबोध या निर्मल वर्मा को पढ़ा, बिना यह जाने कि वे दिखते कैसे थे। उनकी पहचान उनके शब्द थे, उनका चेहरा नहीं। लेकिन इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक तक आते-आते साहित्य की दुनिया में एक मौन परिवर्तन घटित हुआ। लेखक धीरे-धीरे रचना से बाहर निकलकर स्वयं एक दृश्य उपस्थिति में बदलने लगा। अब केवल पुस्तक का प्रकाशित होना पर्याप्त नहीं रहा, लेखक का दिखाई देना भी आवश्यक हो गया। उसे मंचों पर उपस्थित होना था, सोशल मीडिया पर सक्रिय रहना था, अपने पाठकों से लगातार संवाद करना था और सबसे बढ़कर स्वयं को एक पहचान के रूप में स्थापित करना था। यहीं से लेखक के "ब्रांड" बनने की प्रक्रिया शुरू होती है। पहली दृष्टि में यह परिवर्तन स्वाभाविक लगता है। हर युग अपने ...

कठोरता बनाम कटुता: आलोचना की नैतिक सीमा

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डिजिटल युग में आलोचना के विवेक, भाषा और जिम्मेदारी पर एक पुनर्विचार डिजिटल युग में लेखन और आलोचना के संबंध को नए सिरे से समझने की आवश्यकता है। लेखक और आलोचक के बीच का पारंपरिक द्वैत अब पर्याप्त नहीं रह गया है। अब लेखक केवल प्रकाशन संस्थाओं पर निर्भर नहीं है, बल्कि सीधे पाठक तक पहुँच सकता है। इससे उसकी स्वायत्तता बढ़ी है और उसकी उपस्थिति अधिक स्वतंत्र हुई है। इस परिवर्तन के बावजूद आलोचना की आवश्यकता बनी रहती है, क्योंकि वह रचना को लेखक से अलग करके समझने का प्रयास करती है और उसके अर्थ की परतों को खोलती है। यहाँ आलोचक का दायित्व यह है कि वह व्यक्ति के बजाय कृति पर ध्यान दे और उसे तर्क तथा विवेक के आधार पर पढ़े। इसलिए मूल प्रश्न आलोचना की आवश्यकता का नहीं, बल्कि उसके स्वरूप का है कि वह किस प्रकार की हो। आलोचना का मूल स्वभाव प्रश्न उठाना है। वह सहमति की अपेक्षा नहीं करती, बल्कि असहमति को भी वैध स्थान देती है। किसी रचना को पढ़ते समय आलोचक अपने अनुभव, ज्ञान और कसौटियों के साथ उपस्थित होता है। यह आवश्यक भी है, क्योंकि बिना कसौटी के मूल्यांकन संभव नहीं। पर समस्या तब उत्पन्न होती है ...

मैं शरीर से अधिक हूँ?

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        11.06.2026      मैं शरीर से अधिक हूँ? इन दिनों मृत्यु का ख्याल कुछ ज्यादा आने लगा है। ऐसा नहीं कि मैं मरना चाहती हूँ या जीवन से ऊब गई हूँ। उल्टा, जब जीवन बहुत सुंदर लगता है, तब यह ख्याल और तीखा हो जाता है। ज्यादा बार दिमाग खटखटाता है। सुबह की चाय, पेड़ों पर नई पत्तियाँ, किसी बच्चे की हँसी, किसी अनजान व्यक्ति की सदाशयता, इन सबको देखकर अचानक लगता है कि एक दिन यह सब छूट जाएगा। और तब प्रश्न उठता है कि जो छूट जाएगा, वह क्या है? और जो छूटेगा नहीं, वह क्या है? मैं अपने शरीर को देखती हूँ। यह वही शरीर नहीं है जो बचपन में था। न वह जो युवावस्था में था। समय ने इसमें बहुत कुछ बदल दिया है। लेकिन एक अनुभूति ऐसी है जो आज भी वैसी ही लगती है जैसी वर्षों पहले थी। वही जो देखती है, सोचती है, दुखी होती है, प्रसन्न होती है और प्रश्न पूछती है। तब कभी-कभी मन में आता है कि शायद मैं केवल शरीर नहीं हूँ। यह कोई आध्यात्मिक दावा नहीं है। न ही किसी धर्मग्रंथ से निकला हुआ निष्कर्ष। यह तो बस एक प्रश्न है, जो मृत्यु के विचार के साथ बार-बार मेरी ओर लौट आता है। अरस्तु ...

परिधि के बाहर जीवन,मन और विचार

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           ( 11.06.2026) हमारे जीवन का एक बड़ा हिस्सा गहरे दोहराव से निर्मित होता है। हम बार-बार उन्हीं रास्तों पर चलते हैं, उन्हीं लोगों से मिलते हैं, उन्हीं बातों पर विचार करते हैं और धीरे-धीरे उन्हीं निष्कर्षों के भीतर बसने लगते हैं, जिन्हें कभी हमने सत्य मान लिया था। किसी माने हुए सत्य का खंडन करना अत्यंत कठिन कर्म है। क्योंकि केवल समाज ही परम्पराओं की परिधि में नहीं घूमता, मन भी अपनी परिधियाँ रच लेता है। कुछ शब्द, कुछ व्यक्ति, कुछ घटनाएँ और कुछ भाव ऐसे होते हैं जो निरंतर हमारे भीतर लौटते रहते हैं। प्रातः आँख खुलते ही बासी और जर्जर विचार मन की सतह पर उपस्थित हो जाते हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो मन अपने ही निर्मित, परिचित संसार में पुनः प्रवेश कर गया हो। वहाँ सब कुछ जाना-पहचाना है, वही स्मृतियाँ, वही आशंकाएँ, वही निष्कर्ष। मन अनजाने की अपेक्षा परिचित को अधिक सहज स्वीकार करता है; इसलिए वह बार-बार उन्हीं मानसिक पगडंडियों पर लौटता है, चाहे वे उसे सीमित ही क्यों न कर रही हों। इस प्रकार मनुष्य केवल बाहरी परम्पराओं का नहीं, अपनी आंतरिक आदतों और धार...

किसान जीवन का करुण और वैचारिक दस्तावेज : ‘खरगांव का चौक

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                    लेखिका: आशा पाण्डेय            उपन्यास: खरगाँव का चौक  खरगांव का चौक समकालीन हिंदी उपन्यासों में एक ऐसा रचना-कृति है, जो किसी एक कथा-घटना या किसी एक पात्र की नियति तक सीमित न रहकर एक पूरे सामाजिक–आर्थिक यथार्थ को अपने भीतर समेट लेती है। यह उपन्यास महाराष्ट्र की खेती-किसानी, किसान आत्महत्याओं, ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विघटन और उससे उपजते मानवीय संबंधों के टूटने-जुड़ने की कथा कहता है। लेखिका आशा पांडेय ने इस यथार्थ को करुणा, संवेदना और गहरी सामाजिक जिम्मेदारी के साथ रूपायित किया है। ‘खरगांव का चौक’ का केंद्रीय विषय महाराष्ट्र में लंबे समय से चली आ रही किसान आत्महत्याओं की त्रासदी है। यह उपन्यास इस समस्या को किसी आँकड़े, सरकारी रिपोर्ट या प्रत्यक्ष राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप की तरह नहीं, बल्कि घर-परिवार, खेत-खलिहान और रिश्तों की बारीक परतों के माध्यम से प्रस्तुत करता है। संतोष का आत्महत्या करना केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं है, बल्कि एक पूरे परिवार और समुदाय के भवि...

लेखन की तैयारी या सहजता की खोज

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किसी भी रचनाकार के लिए सबसे कठिन क्षण शायद वही होता होगा, जब वह तय कर लेता होगा कि आज उसे कुछ अद्भुत लिखना है। मेरे लिए भी ये क्षण कठिन से कठिनतम हो जाते हैं। क्योंकि जिस वक्त रचनात्मकता को धैर्य की ज़रूरत होती है, उसी क्षण अधीरता अपना खेल शुरू कर देती है। शब्द ठोस हो जाते हैं, विचार जुगनुओं की तरह जलते-बुझते हैं, और सामने रखे कागज़ मुझे देखते रह जाते हैं कि उन पर मन की इबारत उतरे। मैं खुद को ज़्यादा समय इसी स्थिति में पाती हूँ। इससे उबर भी जाएँ, लेकिन सुनी-सुनाई बातों पर मन अमल कर लेता है कि लेखन एक साधना है। इसलिए उसे साधने के लिए विधि-विधान होना ही चाहिए। जैसे योगी आसन बिछाकर ध्यान में बैठता है, एक लेखक को भी अपनी टेबल सजाकर, किताबें व्यवस्थित कर, पूरी तैयारी के साथ लिखने बैठना चाहिए। इस सोच के साथ मैं कई बार स्टडी टेबल की सफाई और सजावट में लग जाती हूँ—किताबें जमाना, पेन-पेंसिल ठीक करना, सामने की दीवार पर प्रेरक पंक्तियाँ चिपकाना। सब कुछ तैयार हो जाने पर लगता है कि अब तो लिखना सहज हो जाएगा। लेकिन ठीक उसी समय मन नए भाव में भटकने लगता है। कभी चाय का बहाना, कभी फोन, कभी को...