माँ से शक्ति तक : स्त्री अपने भीतर लौटती हुई
माँ से शक्ति तक : स्त्री अपने भीतर लौटती हुई बुनियादी चिंतन : बालिका से वामा | स्तंभ 48 नवरात्रि में हम माँ दुर्गा की आराधना करते हैं। उन्हें शक्ति का स्वरूप मानते हैं। संकटों का सामना करने वाली, अन्याय के विरुद्ध खड़ी होने वाली और अपने सामर्थ्य से रास्ता बनाने वाली शक्ति। लेकिन देवी की आराधना करते हुए क्या सयानी स्त्री अपने घर की उस स्त्री को भी देखती है, जो वर्षों से पूरे परिवार की जरूरतों को सँभालते हुए अपनी शक्ति का बड़ा हिस्सा दूसरों के जीवन को बनाने में लगा देती है? स्त्री जब माँ बनती है, तो जैसे बच्चों को बड़ा करने वाली दाई बन जाती है। उनके खाने-पीने, स्वास्थ्य और भविष्य की चिंता में वह इस कदर डूबी रहती है कि कोई उससे मुखातिब होता है, तो उसके शिशु के बारे में पूछा जाता है। परिवार में किसी को कुछ भी चाहिए होता है, सबसे पहले अपने निकट की स्त्री की याद आती है। स्त्री को करुणा की शक्ति हासिल है और वह किसका काम बाकी है, किसे क्या याद दिलाना है, किसकी परेशानी कैसे दूर करनी है, इन सबके बीच उसका अपना दिन बीत जाने में बुराई नहीं मानती। अपने से जुड़े दायित्वों को प्रेम से निभा...