Posts

रमाबाई रानाडे (भारतीय स्त्री मेधा)

Image
भारतीय स्त्री मेधा : सीमाओं में रहकर असीमित होना चुना रमाबाई रानाडे।। स्तंभ 4 उन्नीसवीं शताब्दी का भारतीय समाज स्त्री के लिए बहुत सीमित था। लड़कियों की शिक्षा को लेकर संकोच था और उनका जीवन प्रायः घर, परिवार और पति तक ही रखा जाता था। महाराष्ट्र भी इस सामाजिक स्थिति से अलग नहीं था। इसी समय सामाजिक सुधार की कई धाराएँ चल रही थीं। लड़कियों की शिक्षा, विधवा जीवन, बाल विवाह और स्त्रियों की सामाजिक स्थिति जैसे प्रश्नों पर सार्वजनिक चर्चा शुरू हुई थी। इसी बदलते वातावरण में रमाबाई रानाडे का जीवन आगे बढ़ा। रमाबाई का जन्म 25 जनवरी 1862 को महाराष्ट्र के सांगली जिले के देवराष्ट्रे में हुआ था। उनके बचपन के समय लड़कियों की शिक्षा सामान्य बात नहीं थी। उनका विवाह बहुत कम उम्र में हुआ। 1873 में, लगभग ग्यारह वर्ष की आयु में, उनका विवाह न्यायमूर्ति महादेव गोविंद रानाडे से हुआ। महादेव गोविंद रानाडे उनसे उम्र में काफी बड़े थे और स्वयं न्यायविद, शिक्षक तथा समाज सुधारक थे। विवाह के समय रमाबाई पढ़ी-लिखी नहीं थीं। विवाह के बाद उनके जीवन में पढ़ाई की शुरुआत हुई। उन्होंने मराठी से पढ़ना लिखना सीखा और आ...

स्त्री और समाज : घर से बाहर नागरिक होने का अर्थ

Image
स्त्री और समाज : घर से बाहर नागरिक होने का अर्थ बुनियादी चिंतन : बालिका से वामा | स्तंभ 46 स्त्री की पहचान अक्सर उसके रिश्तों से की जाती है। वह किसी की बेटी है, पत्नी है, माँ है, बहन है। इन सभी संबंधों का अपना महत्व है। लेकिन इन पहचानों के बीच स्त्री की एक पहचान कई बार पीछे छूट जाती है। वह स्वयं एक नागरिक है। यहाँ यह समझना होगा कि नागरिक होना केवल मतदान करने तक सीमित नहीं है। इसका अर्थ है अपने आसपास की दुनिया को देखना और यह समझना कि उसमें जो कुछ हो रहा है, उसका संबंध उसके अपने जीवन से भी है। बच्चे और रसोई की जिम्मेदारियों के साथ सड़क की स्थिति, विद्यालय की व्यवस्था, पानी, अस्पताल, सार्वजनिक परिवहन, महिलाओं की सुरक्षा, पर्यावरण, रोजगार और स्थानीय प्रशासन जैसे विषय भी स्त्री के जीवन से जुड़े हैं। ये केवल पुरुषों या किसी विशेष व्यक्ति को समझने के मुद्दे ही नहीं हैं, बल्कि समाज के साझा मुद्दे हैं। भारतीय संविधान ने नागरिकों को समानता, स्वतंत्रता और गरिमा के अधिकार दिए हैं। संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की बात करता है और अनुच्छेद 15 लिंग सहित कुछ आधारों पर भेदभाव ...

फातिमा शेख

Image
भारतीय स्त्री मेधा: सीमित रहकर असीमित होना चुना स्तंभ 3 : फातिमा शेख उन्नीसवीं सदी का भारत सामाजिक विषमताओं, जातिगत ऊँच-नीच और स्त्रियों की शिक्षा पर लगे अनेक पहरों का भारत था। लड़कियों का विद्यालय जाना सामान्य बात नहीं थी और वंचित समुदायों के बच्चों को शिक्षा दिलाना सामाजिक व्यवस्था को चुनौती देने जैसा माना जाता था। ऐसे समय में महाराष्ट्र के पुणे में कुछ लोगों ने शिक्षा को केवल अक्षर ज्ञान नहीं, बल्कि मनुष्य की गरिमा और बराबरी का रास्ता माना। ज्योतिराव फुले और सावित्रीबाई फुले इस प्रयास के सबसे परिचित नाम हैं। उनके साथ एक और नाम धुँधला ही सही, सामने आता है, फातिमा शेख का। फातिमा शेख को याद करना उस स्त्री को याद करना है, जिसने अपने समय की सामाजिक सीमाओं के बीच शिक्षा को अपना कर्म बनाया। जिस दौर में स्त्रियों का सार्वजनिक जीवन सीमित था और लड़कियों की शिक्षा को लेकर समाज में अनेक बंदिशें थीं, उस दौर में फातिमा शेख ने सावित्रीबाई फुले के साथ शिक्षा के उस अभियान में अपनी भूमिका निभाई, जो आगे चलकर सामाजिक बराबरी की एक बड़ी पहल बना। फातिमा शेख का नाम ज्योतिराव और सावित्रीबाई फुले...

देखा एक सपना : बालमन की खिड़की से जीवन-दर्शन

Image
      समीक्षक : वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. सुरेंद्र विक्रम देखा एक सपना : बालमन की खिड़की से जीवन-दर्शन कविताओं के बाद कहानियाँ बच्चों की दूसरी पसंद होती हैं। विशेष रूप से बच्चे उन कहानियों को अधिक पढ़ना चाहते हैं, जिनमें उनका अपना संसार समाया होता है। उनके आसपास का वातावरण, उनकी अपनी दुनिया, उनका मनोविज्ञान, उनकी सूझ-बूझ और उन्हें भीतर तक स्पर्श करती भाषा-शैली—इन सबके मेल से जो वातावरण निर्मित होता है, वही महत्त्वपूर्ण बालसाहित्य की आधारभूमि बनता है। कल्पना मनोरमा अपने बालकथा-संग्रह ‘देखा एक सपना’ में जिस विनम्रता और सहजता के साथ अपने भावों को पिरोते हुए अलग-अलग प्रतीकों के माध्यम से अपनी बात कहती हैं, वह पाठकों के मानस-पटल पर लंबे समय तक अंकित रहती है। संग्रह के आरंभ में प्रकृति के विभिन्न उपादानों के माध्यम से किशोर पीढ़ी के लिए की गई यह कामना अत्यंत अर्थपूर्ण है— «आँचल फैलाकर माँगती हूँ अपनी किशोर पीढ़ी के लिए आसमान से विचारों की ऊँचाई और खुलापन धरती से गहराई और धैर्य वायु से ताजगी और सहज बहाव दूब से नम जिजीविषा फलदार वृक्षों से विनम्रता और सौहार्...

पंडिता रमाबाई

Image
पंडिता रमाबाई  भारतीय स्त्री मेधा : सीमाओं में रहकर असीमित होना चुना। स्तंभ 2 पंडिता रमाबाई का जन्म 23 अप्रैल 1858 को हुआ। उनके पिता अनंत शास्त्री डोंगरे संस्कृत के विद्वान थे और वे स्त्रियों की शिक्षा के समर्थक थे। उन्होंने अपनी पत्नी लक्ष्मीबाई को संस्कृत सिखाई और लक्ष्मीबाई आगे रमाबाई की पढ़ाई में प्रेरणा बनीं। रमाबाई की शुरुआती शिक्षा घर में ही हुई। माँ उन्हें संस्कृत के श्लोक और धार्मिक ग्रंथ पढ़ाती थीं। उस समय लड़कियों के लिए संस्कृत और शास्त्रों का अध्ययन सामान्य नहीं माना जाता था। घर में मिली इस शिक्षा ने रमाबाई को केवल बहुत कुछ याद करना नहीं सिखाया, बल्कि स्वयं सीखने का भरोसा भी दिया। आगे चलकर यही शिक्षा उनकी विद्वत्ता की पहली नींव बनी। रमाबाई का बचपन एक जगह ठहरकर नहीं बीता। उनके पिता धार्मिक ग्रंथों का पाठ करते थे और इसी क्रम में परिवार को अलग-अलग स्थानों की यात्रा करनी पड़ती थी। इन यात्राओं में रमाबाई ने भारत के अनेक क्षेत्रों और वहाँ के जीवन को करीब से देखा। परिवार की आर्थिक स्थिति कठिन थी, फिर भी पढ़ने और शास्त्रों को समझने का क्रम बना रहा। कम उम्र में ही उ...

स्त्री से स्त्री तक: विरासत का खेल*

Image
*स्त्री से स्त्री तक: विरासत का खेल* बुनियादी चिंतन: बालिका से वामा।।स्तंभ 44 विरासत का अर्थ केवल भूमि, संपत्ति या आभूषण नहीं होता। हर पीढ़ी अगली पीढ़ी को विचार, जीवन-मूल्य, अनुभव, स्मृतियाँ और जीवन जीने का ढंग भी सौंपती है। स्त्रियों के संदर्भ में यह प्रक्रिया और गहरी हो जाती है। परिवार और समाज में एक स्त्री जिस तरह रहती है, काम करती है, संबंध बनाती है और परिस्थितियों का सामना करती है, उसका कोई न कोई अंश अगली पीढ़ी तक पहुँचता रहता है। यह विरासत हमेशा शब्दों में नहीं होती। वह व्यवहार, चुप्पी, निर्णय और संघर्ष से निपटने के तरीकों में भी दिखाई देती है। इस अर्थ में एक स्त्री दूसरी स्त्री को केवल परंपरा नहीं देती, बल्कि अपने जीवन से बनी एक दृष्टि भी सौंपती है। यही दृष्टि आगे चलकर उसके अपने जीवन और सामाजिक समझ का हिस्सा बन सकती है। इस विरासत का पहला स्वरूप भाषा है। बच्ची दुनिया को पहचानना अपने आसपास की स्त्रियों की भाषा से शुरू करती है। वह केवल शब्द और संबोधन नहीं सीखती, बल्कि यह भी समझती है कि किससे कैसे बोलना चाहिए, कहाँ अपनी बात रखनी है और कहाँ चुप रह जाना है। वह जानने लगती ह...

भारतीय स्त्री मेधा : सीमाओं में रहकर असीमित होना चुना।

Image
                        सावित्रीबाई फुले भारतीय स्त्री मेधा : सीमाओं में रहकर असीमित होना चुना। स्तंभ 1 कल्पना मनोरमा  भारत की धरती ने ऐसी अनेक महिलाओं को जन्म दिया है, जिन्होंने अपने समय की सीमाओं को तोड़ा और समाज को नई दिशा दी। उन्होंने साबित किया कि स्त्री केवल घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं है। उसकी बुद्धि, संवेदना, कल्पना और साहस समाज को बदल सकते हैं।  ऐसी ही महान स्त्री थीं सावित्रीबाई फुले। सावित्रीबाई का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र में हुआ था। उनका बचपन ऐसे समय में बीता, जब लड़कियों की पढ़ाई को जरूरी नहीं माना जाता था। समाज में यह धारणा गहरी थी कि शिक्षा पुरुषों का अधिकार है, और लड़कियों का काम केवल घर संभालना है। उनका विवाह कम उम्र में ज्योतिराव फुले से हुआ। ज्योतिराव शिक्षा और सामाजिक समानता के समर्थक थे। उन्होंने सावित्रीबाई को पढ़ना-लिखना सिखाया। सावित्रीबाई ने भी पूरे मन से शिक्षा ग्रहण की। यही शिक्षा आगे चलकर उनके जीवन का सबसे बड़ा हथियार बनी। उन्होंने समझ लिया था कि शिक्षा केवल अक्षर पहचा...