आज बात गांधी के काले अध्यायों की
निर्मल दिखना और निर्मल होना दोनों एक बात नहीं आज बात गांधी जी की सत्यनिष्ठा और अपने किए और अपने विचारों को सार्वजनिक करने की शक्ति के बारे में। हम में से बहुत लोग गांधी के स्वीकारबोध और सत्य कहने की उदारता से परिचित भी हैं और अभिभूत भी। लेकिन कुछ लोग उनकी जीवनी पढ़कर बुरा भला भी बहुत बोलते हैं। खैर, उससे फ़र्क नहीं पड़ता। बस कहना इतना है कि व्यक्ति के जीवन के किसी भी प्रसंग पर सवाल उठाना, उसकी आलोचना करना या उससे असहमति रखना बिल्कुल अलग बात है। मेरी बात उस सामाजिक दृष्टि के बारे में है, जो किसी मनुष्य की गलती से ज्यादा उसकी गलती स्वीकार कर लेने की क्षमता को किनारे कर उसे दंडित करती है। कहना है उस ताकत के बारे में जो गांधी जी कर पाए। आम इंसान करना तो दूर सोच भी नहीं सकता। जैसे गांधी अपनी गलतियों, विचारों और प्रयोगों के बारे में बात कर पाए। अपने जीवन को उन्होंने केवल उपलब्धियों और सद्गुणों की प्रदर्शनी नहीं बनाया। उन्होंने अपने जीवन को ऐसी जगह रखकर पेश किया, जहाँ वे स्वयं को देखते थे, परखते थे और कई बार स्वयं को कटघरे में भी खड़ा कर लेते थे। यहीं से मेरे लिए गांधी का एक दूसरा ...