बुराई का पूर्ण कद
बुराई का पूर्ण कद बुरे लोगों के साथ बुरा होने में इतनी देर क्यों लगती है? यह प्रश्न लगभग हर मनुष्य के भीतर कभी न कभी उठता है। क्योंकि हम देखते हैं कि छल करने वाले आगे बढ़ रहे हैं, झूठ बोलने वाले सम्मान पा रहे हैं और दूसरों को पीड़ा देने वाले बिना किसी दंड के सुख से जी रहे हैं। ऐसे में न्याय और नैतिकता के बारे में हमारी सहज धारणाएँ डगमगाने लगती हैं। मन पूछता है, यदि बुराई का अंत निश्चित है, तो उसमें इतनी देर क्यों लगती है? शायद इसका उत्तर बुराई की प्रकृति में ही छिपा है। बहुत विचार करने के बाद कहना चाहती हूँ कि बुराई तब तक भस्म नहीं होती, जब तक वह अपने पूर्ण कद को प्राप्त नहीं कर लेती। वह अपने छोटे रूप में समाप्त नहीं होती। संसार की संरचना का यह एक विचित्र सत्य है। यहाँ जन्म और मृत्यु साथ-साथ चलते हैं। विस्तार की आकांक्षा भी एक स्वभाव है। जिस तरह अच्छाई जन्म लेती है, उसी तरह बुराई भी जन्म लेती है, फैलती है, अपने नए-नए रूप गढ़ती है और धीरे-धीरे उस स्थिति तक पहुँचती है जहाँ उसके लिए स्वयं को छिपाए रखना संभव नहीं रह जाता। वहीं से उसके अवसान की शुरुआत होती है। हमारे मिथकों में य...