भाषा में इज़्ज़त देना : पुरातन मूल्य
भाषा में इज़्ज़त देना : पुरातन मूल्य बुनियादी चिंतन : बालिका से वामा (स्तंभ–35) "भाषा में इज़्ज़त देना" आज कुछ लोगों को पुराना विचार लग सकता है। कई बार सम्मानजनक भाषा की बात होते ही यह आशंका भी व्यक्त की जाती है कि कहीं यह लड़कियों को फिर से विनम्रता, सहनशीलता और चुप्पी के पुराने खाँचों में लौटाने का प्रयास तो नहीं है। यह आशंका निराधार नहीं क्योंकि हमारे समाज में लंबे समय तक स्त्रियों को "संस्कार" और "मर्यादा" के नाम पर अपनी बात दबाने के लिए भी कहा जाता रहा है। इसलिए जब हम भाषा में सम्मान की बात करते हैं, तो सबसे पहले यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि सम्मानजनक भाषा का अर्थ चुप रहना नहीं है और न ही अन्याय को सह लेना है। दरअसल सम्मान और मौन एक ही बात नहीं हैं। सम्मान और अधीनता भी एक नहीं हैं। कोई लड़की यदि किसी गलत बात का विरोध करती है, किसी भेदभाव पर प्रश्न उठाती है या अपने अधिकारों के लिए आवाज़ बुलंद करती है, तो वह असम्मान नहीं कर रही होती है। बल्कि वह अपने मानवीय अधिकार का प्रयोग कर रही होती है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब हम सम्मान को केवल ...