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माँ से शक्ति तक : स्त्री अपने भीतर लौटती हुई

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माँ से शक्ति तक : स्त्री अपने भीतर लौटती हुई बुनियादी चिंतन : बालिका से वामा | स्तंभ 48 नवरात्रि में हम माँ दुर्गा की आराधना करते हैं। उन्हें शक्ति का स्वरूप मानते हैं। संकटों का सामना करने वाली, अन्याय के विरुद्ध खड़ी होने वाली और अपने सामर्थ्य से रास्ता बनाने वाली शक्ति। लेकिन देवी की आराधना करते हुए क्या सयानी स्त्री अपने घर की उस स्त्री को भी देखती है, जो वर्षों से पूरे परिवार की जरूरतों को सँभालते हुए अपनी शक्ति का बड़ा हिस्सा दूसरों के जीवन को बनाने में लगा देती है? स्त्री जब माँ बनती है, तो जैसे बच्चों को बड़ा करने वाली दाई बन जाती है। उनके खाने-पीने, स्वास्थ्य और भविष्य की चिंता में वह इस कदर डूबी रहती है कि कोई उससे मुखातिब होता है, तो उसके शिशु के बारे में पूछा जाता है। परिवार में किसी को कुछ भी चाहिए होता है, सबसे पहले अपने निकट की स्त्री की याद आती है। स्त्री को करुणा की शक्ति हासिल है और वह किसका काम बाकी है, किसे क्या याद दिलाना है, किसकी परेशानी कैसे दूर करनी है, इन सबके बीच उसका अपना दिन बीत जाने में बुराई नहीं मानती। अपने से जुड़े दायित्वों को प्रेम से निभा...

भारतीय मेधा: आनंदीबाई जोशी

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आनंदीबाई जोशी भारतीय स्त्री मेधा: सीमाओं में रहकर असीमित होना चुना 31 मार्च 1865 को आनंदीबाई जोशी का जन्म हुआ। उनका बचपन का नाम यमुना था। वे एक मराठी ब्राह्मण परिवार में जन्मी थीं। उनके पिता गणपतराव अमृतश्वर जोशी और माता गंगाबाई थीं। किसी स्त्री को समझने के लिए केवल उसके जन्म और परिवार का परिचय पर्याप्त नहीं होता, उस समय, समाज और परिवेश को भी देखना पड़ता है, जिसमें उसने अपना जीवन शुरू किया। उन्नीसवीं सदी में भारतीय स्त्री के लिए परिवार, विवाह और घरेलू जीवन ही प्रमुख थे। ऐसे परिवेश में अपने भीतर की किसी अलग आकांक्षा को पहचानना और फिर उसके लिए रास्ता बनाना कितना कठिन रहा होगा! आनंदीबाई जोशी का जीवन इसी प्रश्न के आसपास खुलता है। नौ वर्ष की आयु में उनका विवाह उनसे उम्र में बड़े गोपालराव जोशी से हुआ, जो डाक विभाग में कार्यरत थे। विवाह के बाद यमुना का नाम आनंदीबाई रख दिया गया। गोपालराव शिक्षा के महत्त्व को समझते थे और उन्होंने आनंदीबाई को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। बाल-विवाह की तमाम विद्रूपताओं के बीच शिक्षा उनके जीवन में एक नई संभावना बनकर उभरने लगी। तेरह वर्ष की आयु में उन्...

सिक्कों की खनक में खोती हँसी

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    सिक्कों की खनक में खोती हँसी कल्पना मनोरमा “मैंने छुटपन में छिपकर पैसे बोये थे...” सुमित्रानंदन पंत की यह कल्पना कितनी भोली और निश्छल थी। बच्चा मिट्टी में बीज नहीं, अपने छोटे-से मन के सपने बोने की बात कर रहा था। बचपन में पैसे बोने की यह कल्पना कौतुक और मासूम उम्मीद से जुड़ी थी। आज पैसे कमाने की दौड़ जीवन की एक बड़ी चिंता बन गई है। फर्क इतना है कि तब एक बच्चा सिक्के मिट्टी में छिपाने की कल्पना करता था और आज का मनुष्य मिट्टी झाड़कर अपनी पूरी उम्र धन कमाने में लगा देता है। पाने को शायद हमने बहुत कुछ पा लिया है, लेकिन इस पाने की यात्रा में जाने कितनी आत्मीय चीजें पीछे छूट गई हैं। वह बचपन, जो बिना वजह हँसता था। वह दोपहर, जिसमें पेड़ की छाँव किसी महल से कम नहीं लगती थी। वह पगडंडी, जिस पर चलते हुए जूतों से ज्यादा पैरों को मिट्टी का स्पर्श अच्छा लगता था। वह घर, जहाँ शाम का अर्थ था, सबका एक साथ लौट आना। आज जीवन की गति इतनी तेज हो गई है कि एक ही घर में रहते हुए भी परिवार के लोगों के पास साथ बैठने का समय कम होता जा रहा है। शाम आती है, लेकिन हर व्यक्ति अपने काम, मोबाइल या ...

अपनी कमाई, अपने फैसले : आर्थिक विवेक की जरूरत

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अपनी कमाई, अपने फैसले : आर्थिक विवेक की जरूरत बुनियादी चिंतन : बालिका से वामा। स्तंभ 47 स्त्री ही नहीं, पुरुष भी तभी आर्थिक रूप से सुदृढ़ माना जा सकता है, जब उसके पास आय का पर्याप्त और स्थिर साधन हो। व्यक्ति की आत्मनिर्भरता का महत्वपूर्ण आधार आर्थिक स्वतंत्रता है। लेकिन आर्थिक स्वतंत्रता का अर्थ केवल आय होना नहीं है। उसका संबंध इस बात से भी है कि व्यक्ति अपनी आर्थिक स्थिति को समझता है या नहीं और उससे जुड़े निर्णयों में उसकी कितनी भूमिका है। इसी दृष्टि से अतीत की कुछ सामाजिक व्यवस्थाओं को भी देखा जा सकता है। जिन परिस्थितियों में स्त्रियों के लिए स्वतंत्र रूप से आय अर्जित करना सहज नहीं था, वहाँ विवाह के समय मायके से मिला धन, आभूषण या संपत्ति कई बार उसके लिए निजी आर्थिक सहारे की भूमिका निभाता रहा होगा। अलग-अलग समाजों और परिस्थितियों में इसका स्वरूप अलग रहा है। इसलिए इसे केवल एक सामाजिक प्रथा के रूप में देखने के बजाय उस समय स्त्री की आर्थिक सुरक्षा के संदर्भ में भी समझा जा सकता है। आज परिस्थितियाँ बदल रही हैं। इसलिए सवाल यह नहीं है कि विवाह के समय बेटी को कितना दिया जाए, बल्कि ...

आज बात गांधी के काले अध्यायों की

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निर्मल दिखना और निर्मल होना दोनों एक बात नहीं आज बात गांधी जी की सत्यनिष्ठा और अपने किए और अपने विचारों को सार्वजनिक करने की शक्ति के बारे में। हम में से बहुत लोग गांधी के स्वीकारबोध और सत्य कहने की उदारता से परिचित भी हैं और अभिभूत भी। लेकिन कुछ लोग उनकी जीवनी पढ़कर बुरा भला भी बहुत बोलते हैं। खैर, उससे फ़र्क नहीं पड़ता। बस कहना इतना है कि व्यक्ति के जीवन के किसी भी प्रसंग पर सवाल उठाना, उसकी आलोचना करना या उससे असहमति रखना बिल्कुल अलग बात है। मेरी बात उस सामाजिक दृष्टि के बारे में है, जो किसी मनुष्य की गलती से ज्यादा उसकी गलती स्वीकार कर लेने की क्षमता को किनारे कर उसे दंडित करती है। कहना है उस ताकत के बारे में जो गांधी जी कर पाए। आम इंसान करना तो दूर सोच भी नहीं सकता। जैसे गांधी अपनी गलतियों, विचारों और प्रयोगों के बारे में बात कर पाए। अपने जीवन को उन्होंने केवल उपलब्धियों और सद्गुणों की प्रदर्शनी नहीं बनाया। उन्होंने अपने जीवन को ऐसी जगह रखकर पेश किया, जहाँ वे स्वयं को देखते थे, परखते थे और कई बार स्वयं को कटघरे में भी खड़ा कर लेते थे। यहीं से मेरे लिए गांधी का एक दूसरा ...

रमाबाई रानाडे (भारतीय स्त्री मेधा)

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भारतीय स्त्री मेधा : सीमाओं में रहकर असीमित होना चुना रमाबाई रानाडे।। स्तंभ 4 उन्नीसवीं शताब्दी का भारतीय समाज स्त्री के लिए बहुत सीमित था। लड़कियों की शिक्षा को लेकर संकोच था और उनका जीवन प्रायः घर, परिवार और पति तक ही रखा जाता था। महाराष्ट्र भी इस सामाजिक स्थिति से अलग नहीं था। इसी समय सामाजिक सुधार की कई धाराएँ चल रही थीं। लड़कियों की शिक्षा, विधवा जीवन, बाल विवाह और स्त्रियों की सामाजिक स्थिति जैसे प्रश्नों पर सार्वजनिक चर्चा शुरू हुई थी। इसी बदलते वातावरण में रमाबाई रानाडे का जीवन आगे बढ़ा। रमाबाई का जन्म 25 जनवरी 1862 को महाराष्ट्र के सांगली जिले के देवराष्ट्रे में हुआ था। उनके बचपन के समय लड़कियों की शिक्षा सामान्य बात नहीं थी। उनका विवाह बहुत कम उम्र में हुआ। 1873 में, लगभग ग्यारह वर्ष की आयु में, उनका विवाह न्यायमूर्ति महादेव गोविंद रानाडे से हुआ। महादेव गोविंद रानाडे उनसे उम्र में काफी बड़े थे और स्वयं न्यायविद, शिक्षक तथा समाज सुधारक थे। विवाह के समय रमाबाई पढ़ी-लिखी नहीं थीं। विवाह के बाद उनके जीवन में पढ़ाई की शुरुआत हुई। उन्होंने मराठी से पढ़ना लिखना सीखा और आ...

स्त्री और समाज : घर से बाहर नागरिक होने का अर्थ

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स्त्री और समाज : घर से बाहर नागरिक होने का अर्थ बुनियादी चिंतन : बालिका से वामा | स्तंभ 46 स्त्री की पहचान अक्सर उसके रिश्तों से की जाती है। वह किसी की बेटी है, पत्नी है, माँ है, बहन है। इन सभी संबंधों का अपना महत्व है। लेकिन इन पहचानों के बीच स्त्री की एक पहचान कई बार पीछे छूट जाती है। वह स्वयं एक नागरिक है। यहाँ यह समझना होगा कि नागरिक होना केवल मतदान करने तक सीमित नहीं है। इसका अर्थ है अपने आसपास की दुनिया को देखना और यह समझना कि उसमें जो कुछ हो रहा है, उसका संबंध उसके अपने जीवन से भी है। बच्चे और रसोई की जिम्मेदारियों के साथ सड़क की स्थिति, विद्यालय की व्यवस्था, पानी, अस्पताल, सार्वजनिक परिवहन, महिलाओं की सुरक्षा, पर्यावरण, रोजगार और स्थानीय प्रशासन जैसे विषय भी स्त्री के जीवन से जुड़े हैं। ये केवल पुरुषों या किसी विशेष व्यक्ति को समझने के मुद्दे ही नहीं हैं, बल्कि समाज के साझा मुद्दे हैं। भारतीय संविधान ने नागरिकों को समानता, स्वतंत्रता और गरिमा के अधिकार दिए हैं। संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की बात करता है और अनुच्छेद 15 लिंग सहित कुछ आधारों पर भेदभाव ...