भारतीय स्त्री मेधा: कादम्बनी गांगुली
कादंबिनी गांगुली भारतीय स्त्री मेधा: सीमाओं में रहकर असीमित होना चुना। स्तंभ 7 किसी स्त्री के व्यक्तित्व में उसकी माँ की उपस्थिति कितनी गहरी होती है, इसे किसी एक घटना या उपलब्धि के आधार पर नहीं आँका जा सकता। माँ अपने अनुभवों, व्यवहार, आकांक्षाओं और कभी-कभी अपनी अनकही इच्छाओं के माध्यम से भी अगली पीढ़ी के व्यक्तित्व को आकार देती है। परंपराओं से बँधे परिवारों में भी स्त्रियों की दृष्टि हमेशा परंपराओं तक सीमित नहीं रहती। उनके भीतर संभावनाओं की ऐसी दुनिया हो सकती है, जिसे वे स्वयं जी न पाई हों, लेकिन जिसकी जमीन अपनी बेटियों के लिए तैयार कर सकती हों। इसी अदृश्य विरासत और बदलती सामाजिक परिस्थितियों के बीच किसी स्त्री की अपनी आकांक्षाएँ आकार लेती हैं। कादंबिनी गांगुली का जीवन इसी संदर्भ में पढ़े जाने योग्य है। 18 जुलाई 1861 को भागलपुर में जन्मी कादंबिनी बसु का जीवन ऐसे समय में आरंभ हुआ, जब भारतीय समाज में आधुनिक शिक्षा के नए रास्ते खुल रहे थे, लेकिन महिलाओं के लिए इन रास्तों पर आगे बढ़ना सहज नहीं था। बंगाल में स्त्री-शिक्षा और सामाजिक सुधार को लेकर बहसें ...