प्यास से मुमुक्षा तक : स्मृति में बचा एक शहर
प्यास से मुमुक्षा तक : स्मृति में बचा एक शहर “इस शहर में इक शहर था“ यह उपन्यास अभी हाल ही में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित होकर आया है। इसके आवरण को देखा तो एक अजीब-सी उदासी महसूस हुई। जर्जर दीवारें, पुराना-सा मकान, बालकनी में खड़ी एक स्त्री जो शोक में डूबी है। आवरण पर लिखा शीर्षक ‘इस शहर में एक शहर था’ मन में एक सवाल आया, कौन-सा शहर? सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाला शब्द है ‘था’। शहर ‘है’ क्यों नहीं, ‘था’ क्यों है? यही ‘था’ इस शीर्षक में एक उदासी का कारक बन जाता है। शहर केवल मकानों और गलियों से नहीं बनता। उसमें लोग और उनकी आवाजें होती हैं, रिश्ते होते हैं, भाषा होती है और स्मृतियाँ होती हैं। इनमें से कुछ बदल जाए तो शहर अपनी जगह मौजूद रहकर भी भीतर से ‘था’ हो सकता है। इस कृति में बात शिकारपुर की है। सिंधी माध्यम स्कूलों की है। सिंधी भाषा की है। छूटने और भूलने की है। विस्थापन का दर्द प्रसव पीड़ा से कम नहीं। उपन्यास का शहर गलियों और मकानों से आगे जाकर स्मृति का शहर बन जाता है। वह कथावाचक नन्द की यादों में है। उन्हीं लोगों म...