Posts

2025 सितम्बर की एक डायरी

Image
21 सितम्बर 2025 आज पंद्रह सोलह वर्षों बाद उस स्त्री के तीन संदेश आए जो रिश्ते में मेरी भांजी लगती है। किताबें लिखते हुए मैंने अपने भीतर जमी दुख की परतों को न जाने कितनी बार खरोंचा है। हर बार लगा जैसे शब्द नहीं, अपनी ही आत्मा को कुरेद रहा हूँ। इतनी बार कि भीतर तक लहूलुहान हो गया। यह एक प्रसंग है। दूसरा प्रसंग तब का है जब उम्र में मुझसे लगभग तीन गुना छोटी एक स्त्री कह देती है, "I don't know, so called your fucking sensitivity." तब समझ में आता है कि संवेदनाएँ एक दिन में नहीं मरतीं। उन्हें धीरे धीरे मारा जाता है। आज उसके संदेश में अपने पिता के बारे में घटनाओं की एक लंबी सूची थी। चरित्रहीनता के आरोप थे। आर्थिक शोषण की बातें थीं। अपमान था। अश्लील व्यवहार का वर्णन था। मानसिक प्रताड़ना थी। रिश्तों को तोड़ने के आरोप थे। हो सकता है उसमें बहुत कुछ सच हो। हो सकता है वह सच का केवल एक हिस्सा हो। मैं उसका निर्णय नहीं कर सकता। न मुझे किसी को दोषी ठहराना है और न निर्दोष। लेकिन उस पूरे संदेश में जो बात मुझे सबसे ज्यादा दुख दे गई, वह आरोप नहीं थे। दुख इस बात का था कि एक बे...

जेन ज़ी की युवतियाँ : डिजिटल दौर की आवाज़(1997-2012 में जन्मी पीढ़ी)

Image
जेन ज़ी की युवतियाँ : डिजिटल दौर की आवाज़ (1997-2012 में जन्मी पीढ़ी) बुनियादी चिंतन : बालिका से वामा।।स्तंभ 39 हर पीढ़ी अपने समय की परिस्थितियों से बनती है। किसी पीढ़ी को युद्ध आकार देता है, किसी को आर्थिक बदलाव और किसी को सामाजिक आंदोलनों का प्रभाव बदल देता है। जेन ज़ी की युवतियाँ उस दौर की संतान हैं, जहाँ इंटरनेट केवल सुविधा नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा बन चुका है। उन्होंने दुनिया को किताबों से कम और स्क्रीन से अधिक देखा है। उनकी पहली दोस्ती, पहली जिज्ञासा, पहला विरोध और कई बार पहला प्रेम भी डिजिटल माध्यमों से जुड़ा रहा है। इसलिए उन्हें केवल मोबाइल में डूबी हुई पीढ़ी कह देना उनके अनुभवों के साथ न्याय नहीं होगा। इन युवतियों का सबसे बड़ा संघर्ष अवसरों की कमी नहीं, बल्कि विकल्पों की अधिकता है। उनके सामने करियर के अनगिनत रास्ते हैं, लेकिन हर रास्ते पर प्रतियोगिता पहले से अधिक कठिन है। वे ऐसे संसार में जी रही हैं, जहाँ किसी की सफलता कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुँच जाती है। ऐसे में तुलना अनजाने ही जीवन का हिस्सा बन जाती है। दूसरों की उपलब्धियाँ दिखाई देती हैं, उनके संघर्ष...

लेखक की गढ़ी हुई छवि

Image
दूसरों के द्वारा गढ़ी हुई छवि                            22 जुलाई 2026 अब जाकर एहसास होता है कि लेखक का जीवन केवल उसके अच्छे लेखन से नहीं चलता। एक रचनाकार के साथ उसकी रचनात्मक छवि ही नहीं चलती, उसके समानांतर एक गढ़ी हुई अदृश्य छवि भी चलती है। आश्चर्य यह है कि उस छवि को गढ़ने में स्वयं लेखक का कोई योगदान नहीं होता। लोग उसे अपने अनुभवों, अपनी धारणाओं, अपने अहं और अपने पूर्वाग्रहों के अनुसार आकार देते रहते हैं। धीरे-धीरे वह छवि इतनी दूर तक पहुँच जाती है कि स्वयं लेखक उससे अपरिचित रह जाता है। हाल ही की एक घटना ने वर्षों पुरानी एक स्मृति फिर से जगा दी। कुछ महीने पहले एक पत्रिका के संपादक ने स्वयं कहानी माँगी थी...कहानी भेजते समय अच्छा लगा। लगा कि मेरे लेखन पर संपादकों का विश्वास बनने लगा है। कोने में बैठकर लिखी गई वह कहानी पाठकों तक पहुँचेगी। वैसे भी कहानी का प्रकाशित होना या न होना बड़ा प्रश्न नहीं है। हर संपादक को अपना निर्णय लेने का अधिकार है। मुझे तो देर तक उस मौन ने रोके रखा जो रचना लेने के बाद लगातार बना रहा।...

दो किनारों के बीच

Image
दो किनारों के बीच 20 जुलाई 2026 आज सुबह फेसबुक खोला। कल गोल चक्कर ऑनलाइन पत्रिका पर संपादक देवेश पथ सारिया ने मेरी कुछ डायरियाँ प्रकाशित की थीं। सहज ही मन उस पोस्ट की ओर लौट गया। यह देखने की एक स्वाभाविक उत्सुकता थी कि कितने लोगों ने उन्हें पढ़ा और किसने क्या कहा होगा। लेकिन वहाँ कुछ भी विशेष नहीं जुड़ा था। उसी क्षण भीतर एक प्रश्न ने सिर उठाया। क्या कला सचमुच दूसरों की स्वीकृति पर आश्रित होती है? क्या रचनाकार की तृप्ति पाठकों की प्रतिक्रिया से निर्मित होती है? थोड़ी देर बाद लगा, नहीं। कला अपने स्वभाव में स्वतंत्र है। वह स्वयं में पूर्ण है। वह किसी प्रशंसा की अपेक्षा नहीं करती। वह ब्रह्म की भाँति स्वयंसिद्ध है। रचनाकार केवल उसका माध्यम है। फिर भी प्रत्येक रचना के बाद उसके भीतर यह जानने की एक सहज आकांक्षा होती है कि जो अनुभूति उसके भीतर उदित हुई थी, क्या वह शब्दों में उसी ताप और उसी सत्य के साथ उतर सकी? पाठकों की प्रतिक्रियाओं में वह अपनी प्रतिष्ठा नहीं, अपनी अभिव्यक्ति की प्रामाणिकता खोजता रहता है। इन्हीं विचारों के बीच फेसबुक की न्यूज़ फ़ीड में एक चित्र ...

मिलेनियल स्त्रियाँ : अपनी पहचान की तलाश (1981–1996)

Image
मिलेनियल स्त्रियाँ : अपनी पहचान की तलाश (1981–1996) बुनियादी चिंतन : बालिका से वामा ।। स्तंभ 38 समय कभी अकेला नहीं बदलता। उसके साथ मनुष्य की दृष्टि, जीवन के मूल्य और समाज की संरचना भी बदलती है। एक पीढ़ी के अनुभव अगली पीढ़ी की विरासत बनते हैं और उसी विरासत पर भविष्य अपनी नई संभावनाएँ निर्मित करता है। भारतीय समाजशास्त्री योगेन्द्र सिंह का मानना है कि भारतीय समाज में परंपरा और आधुनिकता परस्पर विरोधी नहीं हैं। बदलते समय में परंपराएँ नए रूप ग्रहण करती हैं और आधुनिकता उन्हें नए अर्थ प्रदान करती है। बूमर और जेनरेशन एक्स की स्त्रियों ने जिन संघर्षों से परिवर्तन की राह बनाई, उसी विरासत पर मिलेनियल स्त्रियों ने अपने जीवन की नींव रखी। वे उस पीढ़ी की प्रतिनिधि हैं जिसने बदलते भारत को केवल देखा नहीं, बल्कि उसे अपने जीवन में जिया भी। उनका बचपन आज की पीढ़ी से अलग था। गर्मियों की छुट्टियाँ ननिहाल में बीतती थीं। मोहल्ले में सब एक दूसरे को जानते थे। बच्चों की डाँट और कभी-कभार की पिटाई को भी पालन-पोषण का सामान्य हिस्सा माना जाता था। अनुशासन को अधिकार से अधिक स्नेह और जिम्मेदारी का विस्तार समझ...

जेनरेशन एक्स की स्त्रियाँ : बदलाव की दहलीज़

Image
जेनरेशन एक्स की स्त्रियाँ : बदलाव की दहलीज़ बुनियादी चिंतन : बालिका से वामा | स्तंभ 37   हर पीढ़ी अपने समय की संतान होती है। वह अपने युग से केवल जीवन नहीं पाती, बल्कि सोचने के औज़ार भी जुटाती है। समय बदलता है तो जीवन चलाने के ही नहीं, उसके विचारों के औज़ार भी बदलते हैं। यही कारण है कि हर पीढ़ी दुनिया को एक अलग दृष्टि से देखती है। अपने जीवन स्रोतों को समझने का प्रयास करती है।     स्त्रियों की जीवन यात्रा में यह परिवर्तन और भी गहरा दिखाई देता है। भारतीय समाज में एक स्त्री की पहली पाठशाला कोई विद्यालय नहीं, दूसरी स्त्री होती है। वह जन्म लेते ही अपनी माँ, दादी, नानी, बुआ, मौसी और अपने आसपास की स्त्रियों को देखना, सुनना और पढ़ना शुरू कर देती है। बोलना सीखने से बहुत पहले वह जीना सीख रही होती है। वह देख रही होती है कि एक स्त्री कैसे हँसती है, कैसे चुप रहती है, कैसे निर्णय लेती है, कैसे अपने हिस्से का दुःख सहती है और अपने हिस्से का सम्मान बचाती है। इस अर्थ में हर स्त्री,चाहे या न चाहे, अगली पीढ़ी की स्त्री का अपने नजरिए का निर्माण कर रही होती है। इसीलिए किसी भी समाज म...

बालमन, प्रकृति और संस्कारों का जीवंत संसार : ‘देखा एक सपना’

Image
बालमन, प्रकृति और संस्कारों का जीवंत संसार : ‘देखा एक सपना’ समकालीन हिंदी बालसाहित्य में ऐसे रचनाकार अपेक्षाकृत कम हैं, जो मनोरंजन और शिक्षण के बीच संतुलन स्थापित करते हुए बच्चों की जिज्ञासाओं, भावनाओं और सामाजिक सरोकारों को रचनात्मक रूप से अभिव्यक्त कर सकें। कल्पना मनोरमा इसी श्रेणी की सशक्त बालसाहित्यकार हैं। उनकी रचनाओं में बालमन की सहजता, प्रकृति के प्रति अनुराग, मानवीय संवेदनाएँ तथा जीवन-मूल्यों के प्रति गहरी आस्था दिखाई देती है। उनका बाल कहानी-संग्रह ‘देखा एक सपना’ इस दृष्टि से उल्लेखनीय है कि इसमें संगृहीत ग्यारह कहानियाँ केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं बनतीं, बल्कि बच्चों के भीतर संस्कार, संवेदना और सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने का कार्य भी करती हैं। बालसाहित्य की सार्थकता इसी में है कि वह बच्चे को उपदेश देकर नहीं, बल्कि अनुभव और आनंद के माध्यम से जीवन की उपयोगी सीख प्रदान करे। ‘देखा एक सपना’ इस कसौटी पर सफल सिद्ध होता है। संग्रह की कहानियाँ विविध विषयों को समेटे हुए हैं- प्रकृति, परिवार, अनुशासन, पर्यावरण, आत्मनिर्भरता, श्रम-सम्मान, आत्मविश्वास और सामाजिक उत्तरदायित्...