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टिनी का सपना

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                   टिनी का सपना     टिनी एक चंचल और प्यारी बच्ची थी। उसे कल्पनाओं की दुनिया में खोए रहना बहुत पसंद था। वह कहानियाँ सुनते-सुनते खाना खाती और कभी-कभी अपने विचारों में इतनी खो जाती कि आसपास की बातें भी भूल जाती। उसकी छोटी-छोटी शरारतें घर के सभी लोगों को बहुत भाती थीं। टिनी का कमरा रंग-बिरंगी तितलियों की तस्वीरों और खिलौनों से सजा हुआ था।   एक रात उसकी नानी ने उसे सुनहरी परी और उसकी पालतू तितली की कहानी सुनाई। उस तितली के पंखों पर हीरे जड़े थे, जो सूरज की रोशनी में इंद्रधनुष की तरह चमकते थे। परीलोक का वर्णन सुनकर टिनी मंत्रमुग्ध हो गई। सबसे अधिक उसे हीरे-जड़े पंखों वाली तितली की बातें अच्छी लगीं। उस दिन उसने नानी से दूसरी कहानी सुनाने की जिद भी नहीं की। कहानी समाप्त होते ही नानी अपने कमरे में चली गईं और टिनी धीरे-धीरे नींद की गोद में खो गई। नींद में उसने एक अद्भुत सपना देखा। वह परीलोक पहुँच गई थी। वहाँ सब कुछ चमक रहा था। परी कहीं बाहर गई हुई थी, लेकिन महल के दरवाज़े पर चमचमाते पंखों वाली त...

सीमाओं के बीच शिक्षा का उजास (शैक्षिक दख़ल के ताज़ा अंक में)

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                सीमाओं के बीच शिक्षा का उजास               मनुष्य का जीवन अपने प्रारंभिक अबोध अनुभवों से ही आकार लेना आरम्भ कर देता है। जिस परिवेश में मनुष्य जन्म लेता है, जिन लोगों की आँखों के सहारे से दुनिया को पहली बार देखता है, और जिस संस्कृति में बोलना, देखना, महसूस करना और अभिव्यक्त करना सीखता है, वही सब मिलकर उसकी प्रौढ़ दृष्टि और समझ का आधार बनती हैं। मेरे अनुभव का संसार का आधार, वह परिवेश रहा जो एक गाँव का आँगन था, उत्तर प्रदेश के औरैया तहसील, जिला इटावा का एक छोटा सा गाँव अटा। जितना बाहर से यह गाँव अन्य गाँवों जैसा ही सरल, स्वच्छ और सुसंस्कृत दिखता रहा, उतना ही भीतर से विरोधाभासों, सीमाओं, भावुकता, विरोध और अवरोधों से भरा हुआ था। इस में प्राथमिक पाठशाला तो थी, पर अस्पताल, पंचायत भवन या पुस्तकालय जैसी सुविधाएँ नहीं थीं। फिर भी यह गाँव समृद्ध किसानों और व्यवसायियों का गांव बना रहा। अन्य जरूरतों के लिए तीन से चार किलो मीटर की दूरी तय कर अपने सुख सुविधाओं का जुटान करता गाँव अपने आसपास किसानों की...

मनुष्य होने की विधि

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मनुष्य होने की विधि कल्पना मनोरमा कुछ समय से एक प्रश्न मन में बार-बार उठ रहा है। हम किसी व्यक्ति की सफलता, प्रसिद्धि, प्रतिभा और उपलब्धियों को देखकर मान लेते हैं कि उसके भीतर गहरा आत्मविश्वास भी होगा। लेकिन क्या आत्मविश्वास का संबंध केवल उपलब्धियों से है? आधुनिक समाज ने आत्मविश्वास को प्रायः व्यक्तिगत सफलता से जोड़ दिया है। जो व्यक्ति अपने मन का जीवन जी रहा है, आर्थिक रूप से स्वतंत्र है, सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त है और अपने निर्णय स्वयं ले सकता है, उसे आत्मविश्वासी माना जाता है। यह धारणा पूरी तरह गलत नहीं है, लेकिन अधूरी अवश्य है। आत्मविश्वास का एक दूसरा स्रोत भी है, जिस पर कम चर्चा होती है। वह है उत्तरदायित्व। मनुष्य केवल इच्छाओं वाला प्राणी नहीं है। वह संबंधों वाला प्राणी भी है। उसका जीवन अकेले नहीं बनता। जन्म से लेकर मृत्यु तक वह परिवार, समाज, मित्रता, प्रेम, सहयोग और परंपरा जैसी अनेक संरचनाओं के भीतर जीता है। इसलिए मनुष्य होने का अर्थ केवल स्वतंत्र होना नहीं, बल्कि उत्तरदायी होना भी है। यहीं से "मनुष्य होने की विधि" का प्रश्न सामने आता है। मनुष्य होने की विधि ...

मन की आँखें

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                                                     मन की आँखें दशहरे की छुट्टियाँ पड़ रही थीं। सेंट मेरी स्कूल की पाँचवीं कक्षा के बच्चे शैक्षिक भ्रमण पर अजमेर जाने वाले थे। स्कूल में यात्रा के लिए नाम लिखे जा रहे थे। जब कक्षा अध्यापक ने हार्दिक और उसके छोटे भाई आभार से पूछा कि कौन जाना चाहता है, तो आभार ने तुरंत सिर हिला दिया। “सर, मुझे इतिहास बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। आप भैया को ही ले जाइए। उन्हें पुराने किले और राजाओं की कहानियाँ बहुत पसंद हैं।” बच्चे खिलखिलाकर हँस पड़े। हार्दिक भी मुस्करा दिया। दादी ने जब से पृथ्वीराज चौहान की कहानी सुनाई थी, तब से वह अजमेर जाने का सपना देख रहा था। आखिर वह दिन आ ही गया।    बस अरावली की पहाड़ियों के बीच से धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी। बस में बच्चों की हँसी-ठिठोली गूँज रही थी। खिड़की के पास बैठा हार्दिक बाहर के दृश्य निहार रहा था। तभी उसकी नज़र दूर एक पहाड़ी पर बने प्राचीन किले पर पड़ी। उसे...

हरा समंदर (बाल भारती के ताज़ा अंक में)

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                              हरा समंदर  परेल की शिरोडकर चॉल में धीरे-धीरे सुबह उतर रही थी। पंछी आसमान की सैर पर निकल पड़े थे। अँधेरे की चादर अभी पूरी तरह फटी भी नहीं थी कि किसी ने गली का नलका खोल दिया। पानी की धार बाल्टी में गिरी और चहल-पहल शुरू हो गई। उस दिन रविवार था। किसी को भी कहीं जाने की जल्दी नहीं थी। सिवाय गोपी की माँ के। गोपी सो रहा था। बाहर की आवाज़ें धीरे-धीरे उसकी नींद के किनारों को थपकने लगी थीं। गोपी के पापा अख़बार पढ़ रहे थे। पढ़ते-पढ़ते उनकी नज़र एक खबर पर ठहर गई। समुद्र के बारे में लिखा था। लिखा था, “आने वाले सालों में मुंबई के कुछ किनारे पानी में समा सकते हैं।” पापा कुछ देर स्तब्ध रह गए। खबर को बार-बार पढ़ते रहे फिर अख़बार मोड़कर रख दिया। उनके मन में एक ही बात बार-बार उठ रही थी... कि वे बहुत दिनों से गोपी को समुद्र दिखाने की बात टालते आ रहे थे। कहीं...! नहीं नहीं, आज ले जाऊँगा। उन्होंने पत्नी को आवाज़ लगाई, “मीना, आज गोपी को समुद्र दिखा लाएँ क्या?” रसोई से माँ की आवाज़ आई, “साथ...

गलती और चरित्र एक ही बात नहीं

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            गलती और चरित्र एक ही बात नहीं        बुनियादी चिंतन : बालिका से वामा | स्तंभ 34 जीवन में लिए गए कुछ निर्णय सही सिद्ध होते हैं। कुछ गलत साबित होते हैं। कुछ संबंध टिकते हैं। कुछ टूट जाते हैं। कुछ अवसरों पर हमें संतोष मिलता है। कुछ अवसरों पर लगता है कि शायद हम बेहतर कर सकते थे। जबकि मनुष्य होने का अर्थ ही अपूर्ण होना है। फिर भी स्त्रियाँ अपनी किसी गलती को केवल एक घटना की तरह नहीं देख पातीं। वे उसे अपने व्यक्तित्व से जोड़कर देखने लगती हैं। चूक होने पर वे यह नहीं सोचतीं कि निर्णय गलत था। उन्हें लगने लगता है कि स्वयं उनमें ही कोई कमी है। यहीं से एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठता है। स्त्री की पृष्ठभूमि क्या रही। उसे स्नेह और संस्कार देने वाले हाथ तथा मन कैसे थे? क्योंकि कोई भी भावनात्मक प्रवृत्ति अचानक विकसित नहीं होती। ऐसे में यह समझना आवश्यक है कि इसका कारण केवल सामाजिक प्रशिक्षण है या इसके पीछे मनुष्य की कुछ गहरी भावनात्मक संरचनाएँ भी कार्य करती हैं। मानी हुई बात है कि लड़कियों को बचपन से संबंधों की भाषा निज भाषा से पहले स...

मन के पिंजरे

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          मन के पिंजरे वर्तमान समय का एक लोकप्रिय विश्वास है कि मनुष्य को सबसे अधिक बाँधने का काम परंपराएँ करती हैं। जैसे ही रूढ़ियों और बंधनों की बात आती है उँगली सबसे पहले परंपरा की ओर उठती है। मानो मानवीय दुखों के पिंजरे बाहर खड़े हों और उनकी चाबियाँ किसी और के हाथ में हों। पर क्या सचमुच ऐसा है? जीवन के अनुभव धीरे-धीरे एक दूसरी बात सिखाते हैं। बहुत से पिंजरे ऐसे होते हैं जिन्हें मनुष्य स्वयं बनाता है। वे पिंजरे लोहे या लकड़ी के नहीं होते। वे हमारी धारणाओं भय पूर्वाग्रहों असुरक्षाओं और अहंकार से बने होते हैं। मनुष्य उन्हें इतना अपना मान लेता है कि उनकी सलाखें दिखनी बंद हो जाती हैं। परंपराएँ निश्चित रूप से प्रश्नों से परे नहीं हैं। उनमें बहुत कुछ ऐसा हो सकता है जिसे बदलने की आवश्यकता हो। समय के साथ हर समाज अपने अनुभवों की समीक्षा करता है। लेकिन यह मान लेना कि जो कुछ पुराना है वह अनिवार्य रूप से बंधन ही है एक सरल निष्कर्ष होगा। जीवन इतनी सरल रेखाओं में नहीं चलता। यदि परंपराएँ केवल पिंजरे होतीं तो मनुष्य पीढ़ियों तक उनसे जुड़ा क्यों रहता? हर परंपर...