जेन ज़ी की युवतियाँ : डिजिटल दौर की आवाज़(1997-2012 में जन्मी पीढ़ी)
जेन ज़ी की युवतियाँ : डिजिटल दौर की आवाज़ (1997-2012 में जन्मी पीढ़ी) बुनियादी चिंतन : बालिका से वामा।।स्तंभ 39 हर पीढ़ी अपने समय की परिस्थितियों से बनती है। किसी पीढ़ी को युद्ध आकार देता है, किसी को आर्थिक बदलाव और किसी को सामाजिक आंदोलनों का प्रभाव बदल देता है। जेन ज़ी की युवतियाँ उस दौर की संतान हैं, जहाँ इंटरनेट केवल सुविधा नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा बन चुका है। उन्होंने दुनिया को किताबों से कम और स्क्रीन से अधिक देखा है। उनकी पहली दोस्ती, पहली जिज्ञासा, पहला विरोध और कई बार पहला प्रेम भी डिजिटल माध्यमों से जुड़ा रहा है। इसलिए उन्हें केवल मोबाइल में डूबी हुई पीढ़ी कह देना उनके अनुभवों के साथ न्याय नहीं होगा। इन युवतियों का सबसे बड़ा संघर्ष अवसरों की कमी नहीं, बल्कि विकल्पों की अधिकता है। उनके सामने करियर के अनगिनत रास्ते हैं, लेकिन हर रास्ते पर प्रतियोगिता पहले से अधिक कठिन है। वे ऐसे संसार में जी रही हैं, जहाँ किसी की सफलता कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुँच जाती है। ऐसे में तुलना अनजाने ही जीवन का हिस्सा बन जाती है। दूसरों की उपलब्धियाँ दिखाई देती हैं, उनके संघर्ष...