लिव-इन संबंध : साथ रहने की स्वतंत्रता और जिम्मेदारी
लिव-इन संबंध : साथ रहने की स्वतंत्रता और जिम्मेदारी बुनियादी चिंतन : बालिका से वामा | स्तंभ 42 प्रत्येक वयस्क स्त्री को अपने जीवन के बारे में अपनी पसंद से सोचने और फैसला लेने का हक होना चाहिए। किसी के साथ रहना है या नहीं, किसके साथ जीवन बिताना है, इन बातों का फैसला आखिर उसी व्यक्ति को करना चाहिए, जिसके जीवन का सवाल है। परिवार और समाज अपनी राय दे सकते हैं, लेकिन उसे थोपना ठीक नहीं। हाँ, अपनी मर्जी से लिया गया फैसला अपने साथ कुछ जिम्मेदारियाँ भी लेकर आता है। आजादी का मतलब यह नहीं कि उसके बाद आने वाले फैसलों और उनके असर की चिंता ही न की जाए। लिव-इन संबंध विवाह से अलग व्यवस्था हैं और दोनों को एक ही नजर से देखना ठीक नहीं होगा। लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं कि ऐसे रिश्ते में रहने वाली महिला हर तरह के कानूनी या सामाजिक सहारे से बाहर हो जाती है। कुछ परिस्थितियों में कानून उसे सुरक्षा और अधिकार देता है। इसलिए लिव-इन को न तो विवाह मान लेना ठीक है, न ऐसी व्यवस्था समझना, जिसमें महिला के अधिकारों की कोई जगह ही नहीं है। फिर भी किसी रिश्ते की पूरी कहानी कानून के सहारे नहीं समझी जा सकती...