फातिमा शेख
भारतीय स्त्री मेधा: सीमित रहकर असीमित होना चुना स्तंभ 3 : फातिमा शेख उन्नीसवीं सदी का भारत सामाजिक विषमताओं, जातिगत ऊँच-नीच और स्त्रियों की शिक्षा पर लगे अनेक पहरों का भारत था। लड़कियों का विद्यालय जाना सामान्य बात नहीं थी और वंचित समुदायों के बच्चों को शिक्षा दिलाना सामाजिक व्यवस्था को चुनौती देने जैसा माना जाता था। ऐसे समय में महाराष्ट्र के पुणे में कुछ लोगों ने शिक्षा को केवल अक्षर ज्ञान नहीं, बल्कि मनुष्य की गरिमा और बराबरी का रास्ता माना। ज्योतिराव फुले और सावित्रीबाई फुले इस प्रयास के सबसे परिचित नाम हैं। उनके साथ एक और नाम धुँधला ही सही, सामने आता है, फातिमा शेख का। फातिमा शेख को याद करना उस स्त्री को याद करना है, जिसने अपने समय की सामाजिक सीमाओं के बीच शिक्षा को अपना कर्म बनाया। जिस दौर में स्त्रियों का सार्वजनिक जीवन सीमित था और लड़कियों की शिक्षा को लेकर समाज में अनेक बंदिशें थीं, उस दौर में फातिमा शेख ने सावित्रीबाई फुले के साथ शिक्षा के उस अभियान में अपनी भूमिका निभाई, जो आगे चलकर सामाजिक बराबरी की एक बड़ी पहल बना। फातिमा शेख का नाम ज्योतिराव और सावित्रीबाई फुले...