Posts

किसान जीवन का करुण और वैचारिक दस्तावेज : ‘खरगांव का चौक

Image
                    लेखिका: आशा पाण्डेय            उपन्यास: खरगाँव का चौक  खरगांव का चौक समकालीन हिंदी उपन्यासों में एक ऐसा रचना-कृति है, जो किसी एक कथा-घटना या किसी एक पात्र की नियति तक सीमित न रहकर एक पूरे सामाजिक–आर्थिक यथार्थ को अपने भीतर समेट लेती है। यह उपन्यास महाराष्ट्र की खेती-किसानी, किसान आत्महत्याओं, ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विघटन और उससे उपजते मानवीय संबंधों के टूटने-जुड़ने की कथा कहता है। लेखिका आशा पांडेय ने इस यथार्थ को करुणा, संवेदना और गहरी सामाजिक जिम्मेदारी के साथ रूपायित किया है। ‘खरगांव का चौक’ का केंद्रीय विषय महाराष्ट्र में लंबे समय से चली आ रही किसान आत्महत्याओं की त्रासदी है। यह उपन्यास इस समस्या को किसी आँकड़े, सरकारी रिपोर्ट या प्रत्यक्ष राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप की तरह नहीं, बल्कि घर-परिवार, खेत-खलिहान और रिश्तों की बारीक परतों के माध्यम से प्रस्तुत करता है। संतोष का आत्महत्या करना केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं है, बल्कि एक पूरे परिवार और समुदाय के भवि...

लेखन की तैयारी या सहजता की खोज

Image
किसी भी रचनाकार के लिए सबसे कठिन क्षण शायद वही होता होगा, जब वह तय कर लेता होगा कि आज उसे कुछ अद्भुत लिखना है। मेरे लिए भी ये क्षण कठिन से कठिनतम हो जाते हैं। क्योंकि जिस वक्त रचनात्मकता को धैर्य की ज़रूरत होती है, उसी क्षण अधीरता अपना खेल शुरू कर देती है। शब्द ठोस हो जाते हैं, विचार जुगनुओं की तरह जलते-बुझते हैं, और सामने रखे कागज़ मुझे देखते रह जाते हैं कि उन पर मन की इबारत उतरे। मैं खुद को ज़्यादा समय इसी स्थिति में पाती हूँ। इससे उबर भी जाएँ, लेकिन सुनी-सुनाई बातों पर मन अमल कर लेता है कि लेखन एक साधना है। इसलिए उसे साधने के लिए विधि-विधान होना ही चाहिए। जैसे योगी आसन बिछाकर ध्यान में बैठता है, एक लेखक को भी अपनी टेबल सजाकर, किताबें व्यवस्थित कर, पूरी तैयारी के साथ लिखने बैठना चाहिए। इस सोच के साथ मैं कई बार स्टडी टेबल की सफाई और सजावट में लग जाती हूँ—किताबें जमाना, पेन-पेंसिल ठीक करना, सामने की दीवार पर प्रेरक पंक्तियाँ चिपकाना। सब कुछ तैयार हो जाने पर लगता है कि अब तो लिखना सहज हो जाएगा। लेकिन ठीक उसी समय मन नए भाव में भटकने लगता है। कभी चाय का बहाना, कभी फोन, कभी को...

सुंदर लड़के

Image
सुनो सुंदर लड़के  सुंदर होना निजी उपलब्धि की तरह  मत देखा करो यह एक साँझी घटना है जिसमें तुम्हारा कम, एक स्त्री का जागना ज्यादा  मानीखेज बन पड़ा है जब दर्पण के सामने खुद पर मुग्ध होने का मन करे, तो ठहर जाया करो याद किया करो  नींद भरी उन आँखों को, तुम्हारी आँखों में  ठहर सके चमक  भूली रही थीं सोना  उम्र के विस्तार भर  और ये भी कि बुरी नज़र  सिर्फ़ तुम्हें ही नहीं लगती उन हाथों को भी लगती है जो रह गए तुम्हारे पीछे जब करे मन  अपने अस्तित्व पर इतराने का लगा लिया करो चुपके से  स्मृति का काला टीका कान के पीछे सुंदर होने की न्यूनतम नैतिकता  थामें रहेगी तुम्हारा हाथ। कल्पना मनोरमा

मैं पेड़ होना चाहती हूँ

Image
मन यूँ करता है अब  कि कुछ दिन ही सही  न भूख लगे, न प्यास की उठे कोई पुकार  देह अपना बोझ ख़ुद ही उतार कर फेंक दे और मैं सिर्फ़ स्वांस भर रह जाऊँ न बच्चों को चुगाने की चिंता हो, न समय के दाँत काटने का डर यह इनकार नहीं है जीवन से, बस पल भर के लिए शोर से बाहर आना चाहती हूं मैं उस पेड़ पर रहना चाहती हूँ जहां जड़ें उसकी हों, और भरोसा मेरा  जहाँ हर प्रश्न का उत्तर फल की तरह नहीं, छाया की तरह उतरे मेरे भीतर मैं किताब में खोना चाहती हूँ अक्षरों के बीच अपना नाम भूलकर पन्ने पलटते हुए सबसे बुरी कथा की किरदार बन पाठकों की आँखों में  झांकना चाहती हूँ  चिड़ियों से बातें करना चाहती हूँ— बिना अर्थ का बोझ ढोए जो जानती हैं चिड़ियां  सीखना चाहती हूँ  और उन्हें बताना चाहती हूँ कि  उड़ान कोई उपलब्धि नहीं, एक सहज आदत है हवा में उड़ना चाहती हूँ बिना दिशा,बिना मंज़िल जहाँ से लौटना अनिवार्य न हो और ठहरना अपराध न बने किसी अनजाने जंगल में  खो जाना चाहती हूँ  मैं ख़ुद को थोड़ी देर जीने देना चाहती हूँ  मैं पेड़ होना चाहती हूँ। कल्पना मनोरमा

मां की स्मृति में

Image
माँ की आँखें मामूली नहीं थीं। उनकी चिंतनधारा ने मुझे विचारों की समृद्ध विधि सौंपी है। आपके होने के आगे मेरा होना हमेशा नतमस्तक रहेगा। मलाल बस इतना, मैं ही वह न दे पाई जो एक स्त्री को दूसरी स्त्री को देना चाहिए। यह स्वीकार आज भी भीतर कहीं ठहरा रहता है।  मां का जीवन साहित्यिक नहीं था। पर सोच साहित्यिक थी। अब सोचती हूँ तो लगता है कि आप एक किरदार की तरह थीं। उत्साह और जिजीविषा से भरीं। आप साधारण स्त्री तो बिल्कुल नहीं थीं। न सोच में। न व्यवहार में। न भाषा में। न जीवन में। आप असाधारण थीं। मां ने अपने कार्यान्वयन से वह सिखाया जो साधारण स्त्री सोच नहीं सकती। मां ने सिखाया सामने चाहे पुरुष हो या स्त्री बात दोनों से की जा सकती है। झेंपने की की जरूरत नहीं। मैंने आपसे ही अपनी देह यानी स्त्री-देह से विरक्त और आत्मा में स्थिर रहना सीखा। मैंने आपसे अपनी परिधि को बड़ा बनाना सीखा। मैंने आपसे अपने कर्तव्यों के प्रति सचेत रहना सीखा। साथ ये भी सीखा कि जो रिश्ते संवेदना रहित होकर उपयोग करने लगें, उन्हें त्यागना ही उचित है। आपके सिखाए हुए रास्ते पर चलते हुए कई कई बार मैं खुद को परेशानियों स...

मैं अपने प्रेम में हूँ

Image
मैं अपने प्रेम में हूँ ।। कल्पना मनोरमा  जो बात कहने जा रही हूँ, देखो—तुम चौंकना मत हालाँकि, यह बात कुछ चौंकाने जैसी ही है। हो सकता है तुम्हें यह उतनी खास न लगे, मगर बड़ी कठिनाई से समझ आई है  यह बात मुझे इसीलिए बेहद खास है मेरे लिए बात ये है कि मैं अपने प्रेम में हूँ यही विशेष है, और यही मुझमें अपने भर  बचाए हुए है शेष जब मन में जीने का भाव उठा, तभी यह विचार भी पहले-पहल आया खुद से प्रेम करना माने ज़िंदा बने रहना  या ज़िंदा रहने के लिए खुद से प्रेम करना… इसका मतलब नहीं पता बस इतना जान गई हूँ  कि मैं अपने प्रेम में हूँ और यह जान लेना ही मुझे राहत दे रहा है।

बूढ़ी होती स्त्री

Image
बात ये नहीं कि मैं बूढ़ी हो रही हूँ बात ये है कि मैं सुंदर हो रही हूँ धुंधलाई आँखों में जीवन के रंग अब दिखते हैं अपने सबसे मौलिक स्वरूप में साथी की कही हर बात में ढूँढ़ लेती हूँ कुछ अपने योग्य अर्थ; बिगड़ी बात पर अब घबराहट नहीं होती बातों के मायने तुरंत नहीं बदलती— सारे अर्थ उधारी खाते में डिपॉज़िट कर देती हूँ कभी फुर्सत में समझने को आँखों के नीचे उभर आई महीन रेखाएँ कभी दुलराती हैं मुझे, कभी सच का पानी बनकर आँखें साफ कर जाती हैं घर से निकलते हुए अब आईने की नहीं घड़ी और छड़ी की याद रहती है समय के साथ कदम मिलाकर चलने में एक अनोखा आनंद है और आनंद है जीवन के अंतिम शब्दनाद को धीरे-धीरे अपने भीतर  उतरते हुए देखने में। कल्पना मनोरमा