प्यास से मुमुक्षा तक : स्मृति में बचा एक शहर

प्यास से मुमुक्षा तक : स्मृति में बचा एक शहर

“इस शहर में इक शहर था“  यह उपन्यास अभी हाल ही में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित होकर आया है। इसके आवरण को देखा तो एक अजीब-सी उदासी महसूस हुई। जर्जर दीवारें, पुराना-सा मकान, बालकनी में खड़ी एक स्त्री जो शोक में डूबी है। आवरण पर लिखा शीर्षक ‘इस शहर में एक शहर था’ मन में एक सवाल आया, कौन-सा शहर?

    सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाला शब्द है ‘था’। शहर ‘है’ क्यों नहीं, ‘था’ क्यों है? यही ‘था’ इस शीर्षक में एक उदासी का कारक बन जाता है। शहर केवल मकानों और गलियों से नहीं बनता। उसमें लोग और उनकी आवाजें होती हैं, रिश्ते होते हैं, भाषा होती है और स्मृतियाँ होती हैं। इनमें से कुछ बदल जाए तो शहर अपनी जगह मौजूद रहकर भी भीतर से ‘था’ हो सकता है। 

इस कृति में बात शिकारपुर की है। सिंधी माध्यम स्कूलों की है। सिंधी भाषा की है। छूटने और भूलने की है। विस्थापन का दर्द प्रसव पीड़ा से कम नहीं। 

   उपन्यास का शहर गलियों और मकानों से आगे जाकर स्मृति का शहर बन जाता है। वह कथावाचक नन्द की यादों में है। उन्हीं लोगों में है जिनसे मिलने वह वर्षों बाद शिकारपुर की ओर निकलता है। उन जगहों में है जहाँ पहुँचकर वह अपने बीते जीवन को फिर से पहचानने की जुगत करता रहता है।

उपन्यास तीन खंडों में बँटा है। पहला खंड ‘प्यास’, दूसरा ‘तलाश’ और तीसरा ‘मुमुक्षा’। जैसा कि लेखिका का दर्शन चिंतन अन्य लिखे में देखा जाता है। इन तीनों शब्दों को साथ में रखकर देखें तो बाहर की कम अंतर्मन की यात्रा ज्यादा लगती है। ‘प्यास’  अपने शहर की ओर खींचती है। ‘तलाश’ उसे उन लोगों तक ले जाती है जो उस शहर को अपने भीतर बचाए हुए हैं। ‘मुमुक्षा’ में प्रश्न बाहर से भीतर की ओर मुड़ जाता है।

कथावाचक नंद अक्की का बेटा है। कराची में वह माई जिन्ना से मिलता है। माई जिन्ना कभी उसके घर में कपड़े धोने और घर की सफाई का काम करती थी। लेकिन अक्की के लिए वह सिर्फ काम करने वाली स्त्री नहीं थी। काम पूरा करने के बाद दोनों घंटों बैठकर बातें करती थीं। नंद को यह रिश्ता याद है।

लेखिका नंद और माई जिन्ना को केवल आमने-सामने लाकर नहीं छोड़तीं। एक जगह नंद अपने निवाले में से माई जिन्ना को भी खिलाता है। माई जिन्ना के लिए यह सहज नहीं है। वह सोचती है कि वह कैसे खा सकती है। लेकिन नंद के लिए वह अजनबी नहीं है। वह उसकी माँ अक्की की सहेली रही है। बचपन की वही पहचान नंद के व्यवहार में आज भी बनी हुई है।

इस छोटे-से प्रसंग में रिश्तों की वह गर्माहट दिखाई देती है जो किसी देश की सीमा से बड़ी होती है। नंद कराची में जयराम गंगवानी को भी तलाशता रहता है। वहाँ वही उसका अकेला परिचित है। इस तलाश के बहाने कराची और वहाँ बसे लोगों की दुनिया भी सामने आती है।

इस हिस्से में कहीं-कहीं सिंधी भाषा के संवाद और उससे जुड़ी जानकारियाँ भी आती हैं। ये प्रसंग कहानी को केवल आगे नहीं बढ़ाते बल्कि उस पूरे संसार को हमारे सामने थोड़ा और जीवित कर देते हैं। 

   कैसे कैसे नन्द आगे बढ़ता है, अपने जीवन की कहानी सुनाता है। उसकी स्मृति में बचपन है। शिकारपुर है। सिंध है। विभाजन का दर्द है। भारत आकर बसने की कठिन शुरुआत है। मुंबई का जीवन है और रोजी-रोटी के लिए किए गए छोटे-बड़े काम हैं। इन सबके बीच एक व्यक्ति है जो अपने छूटे हुए घर और शहर को खोज लेना चाहता है। 

नन्द के जीवन में इसी दौरान एक दूसरी दिशा भी खुलती है। हशू के साथ उसका जुड़ाव उसे सामुदायिक काम की ओर ले जाता है। आर्थिक कठिनाइयों के बीच शिक्षा का सवाल सामने आता है। हशू का विचार है कि किताबों की कमी, बच्चों की पढ़ाई में बाधा नहीं बननी चाहिए। एक सेट से कई बच्चे पढ़ सकते हैं। बुक बैंक बनाई जा सकती है। बड़ी कक्षा के बच्चे छोटी कक्षा के बच्चों को पढ़ा सकते हैं। आज इन विचारों को सुनना सहज लगता है लेकिन उस समय इनके लिए पहल करना आसान नहीं रहा होगा।

 एक ब्रेजियर सिलवाकर बेचने का प्रसंग खास तौर पर ध्यान खींचता है। किरदारों मुस्लिम दर्जियों से कपड़ों की बची हुई कतरनें लेता है, और मुस्लिम कारीगरों से ब्रेजियर बनवाता है। रोजी-रोटी का यह छोटा-सा काम आगे चलकर धार्मिक पहचान के सवाल से जुड़ जाता है। नन्द कहता है, “जब तक चोटी थी, वे मुझसे दूरी बरतते हुए व्यवहार करते थे। पर चोटी कटते ही मैं उनके निकट आ गया।”

  पहचान बदली है तो व्यवहार बदल गया है। चोटी इसलिए यहाँ एक धार्मिक संकेत से अधिक अर्थ ग्रहण करती है। नन्द के अनुभव से यह सवाल उठता है कि क्या धार्मिक पहचान हमारे सामाजिक व्यवहार को इतनी गहराई से प्रभावित करती है कि एक बाहरी संकेत भी दूरी या निकटता तय करने लगे।  नन्द किसी राजनीतिक सिद्धांत से यह निष्कर्ष नहीं निकालता। वह अपने अनुभव से वहाँ पहुँचता है। इसके बाद चेंबूर कॉलोनी युवक मंडल की स्थापना होती है। रीडिंग रूम शुरू होता है। बुक बैंक और कोचिंग क्लास चलती है। इंडोर गेम की व्यवस्था होती है। आँखों के इलाज और ऑपरेशन की सुविधा भी शुरू होती है। अलग-अलग पृष्ठभूमि से आए लोग एक-दूसरे के करीब आते हैं। हशू के लिए शिक्षा किताब और कक्षा तक सीमित नहीं है। लोगों के बीच रिश्ता बनाना भी उसका हिस्सा है। बीमारी के समय लोगों की मदद के लिए जाना इसी सोच का विस्तार है। नन्द का कहना कि “हशू के साथ काम करने का नशा चढ़ गया था” उसके काम का अर्थ बदलता गया। रोजी-रोटी की चिंता के साथ अब दूसरे लोगों के जीवन में शामिल होने की इच्छा भी होने लगी।

नन्द की स्मृति में उस समय की राजनीति भी इसी सामाजिक जीवन के बीच आती है। लालकृष्ण आडवाणी का उल्लेख है। जो सिंध छोड़कर जयपुर आने और संघ के कार्यालय में रहने के दिनों को याद करता है। उनकी पत्रकारिता में रुचि और बाद का राजनीतिक जीवन भी स्मृति में आता जाता रहता है। अटल बिहारी वाजपेयी से मुलाकात का प्रसंग अलग तरह से ध्यान खींचता है। नन्द उन्हें दादर की शिवाजी प्रिंटिंग प्रेस से लेने जाता है और वहाँ अखबारों पर उन्हें सोते हुए देखता है। बाद में बड़े राजनीतिक व्यक्तित्व के रूप में पहचाने जाने वाले व्यक्ति को उनके आरंभिक दिनों में देखना उस स्मृति को खास बना देता है।

फिर आपातकाल आता है। नन्द सूरत जाने वाली ट्रेन में राजनीतिक साहित्य लेकर चल रहा है। उसे खतरे का अंदेशा होता है। एक व्यक्ति उसके और दूसरे यात्रियों के बीच इस तरह खड़ा हो जाता है कि नन्द सावधान हो जाता है। वह साहित्य वहीं फेंक देता है। बाद में उसे पता चलता है कि वह व्यक्ति आज के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। 

इन राजनीतिक प्रसंगों का महत्व इस बात में है कि वे नन्द के जीवन से अलग कोई इतिहास नहीं बनाते। उसकी स्मृति में राजनीति और रोजमर्रा का जीवन साथ-साथ चलते रहते हैं। चेंबूर की गलियाँ हैं। छोटे कारोबार हैं। सामुदायिक काम है। उसी समय का राजनीतिक वातावरण भी है। इसलिए नन्द की कहानी पढ़ते हुए एक व्यक्ति के जीवन के साथ एक पूरे दौर से रूबरू होने का अवसर मिलता है।

‘तलाश’ में नन्द की स्मृति और फैलती है। वह कराची में जयराम गंगवानी को खोजता है। पता बदल चुका है लेकिन फोन नंबर वही है। संपर्क होते ही पुराने संबंध की गर्माहट लौट आती है। नन्द पहले से लोगों के बारे में जानकारी जुटाकर आया है। अब उसकी तलाश एक अस्पष्ट इच्छा नहीं रह गई है। नाम और संबंध उसके लिए रास्ता बन रहे हैं। जयराम से मिलने के बाद शिकारपुर के और लोग उसकी स्मृति में लौटते हैं। शिकारपुर में वे उसके ननिहाल के पड़ोसी थे और बाद में चेंबूर में भी पड़ोसी रहे। जगह बदल गई लेकिन संबंध की स्मृति बनी रहती है।

 विभाजन के आर्थिक, शिकारपुर की दुकान खाली करते समय माल सस्ते में बेचना और अनजान जगह भारत आना….और बेरोजगारी का सामना करना, गहराई से मन को पकड़ लेता है। विभाजन इतिहास की किताब में दर्ज एक घटना भर नहीं है। उसके प्रभाव में लोगों के घर बदले। काम छूटे। रिश्तों की दिशा बदली और लोगों का जीवन बेपटरी हो गया। 

  नन्द की स्मृति में सम्पन्न अतीत भी है। हवेली है। पुश्तैनी ज्वेलरी का कारोबार है। हीरे और मोती हैं। रिश्तेदार हैं। परदादी के साथ रबड़ी खाने की छोटी-सी स्मृति है। इन विवरणों से उसके पुराने जीवन की आर्थिक स्थिति सामने आती है। 

‘मुमुक्षा’ में पहुँचते-पहुँचते यह अनुभव और तीखा हो जाता है। नन्द अपने पुराने घर के सामने खड़ा है। वर्षों बाद। जगह वही है लेकिन लोग नहीं हैं। दीवारें बची हैं लेकिन वह जीवन नहीं है जिसके कारण वह घर था। इसी अनुभव के बीच आती है पंक्ति, “शाम का वक्त घर जाने का वक्त होता है। मैं अपना घर ढूँढ रहा हूँ।”

यह वाक्य नन्द की पूरी बेचैनी को एक साथ सामने रख देता है। दूसरों के लिए शाम घर लौटने का समय है। नन्द के लिए घर ही एक प्रश्न है। उसके घर में शिकारपुर है। सिंध है। परिवार है। रिश्तेदार हैं। बचपन है। वे लोग हैं जो अब वहाँ नहीं हैं। नन्द की शिकारपुर यात्रा में अतीत लगातार मौजूद है लेकिन वह पूरी तरह उसी में नहीं रहता। 

जया जी की लेखकीय दृष्टि में दर्शन मौजूद है लेकिन वह जीवन से अलग दिखाई नहीं देता। “वह शाम हमेशा खूबसूरत होती है जब हम कुछ नहीं जानते, बजाय उस शाम के जब हम सब कुछ जान लेते हैं।” नन्द की यात्रा के संदर्भ में यह विचार अलग अर्थ ग्रहण करता है। तलाश तब तक चलती है जब तक कोई प्रश्न बाकी है। ‘मुमुक्षा’ शब्द भी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाता है। भारतीय दार्शनिक परंपरा में इसका संबंध मुक्ति की इच्छा से है। लेकिन नन्द के संदर्भ में यह मुक्ति किससे है, इसका उत्तर उपन्यास आसानी से नहीं देता। क्या वह छूटे हुए घर की स्मृति से मुक्त होना चाहता है? क्या वह अपने भीतर जमा दुख से बाहर निकलना चाहता है? या उसे यह स्वीकार करना है कि जिस घर को वह खोज रहा है वह अब बाहर उसी रूप में मौजूद नहीं है? उपन्यास इस प्रश्न का एक निश्चित उत्तर नहीं देता। 

इस शहर में इक शहर था की सबसे बड़ी खूबी मुझे यह लगती है कि विभाजन इसकी पृष्ठभूमि है लेकिन कथा वहीं ठहरती नहीं। विस्थापन के बाद जीवन कैसे दोबारा बनाया जाता है, यह महत्वपूर्ण बिंदु है। इसमें काम है। रिश्ते हैं। शिक्षा है। संगठन है। राजनीति है। दुख है और स्मृति है। नन्द के माध्यम से जया जादवानी ऐसे मनुष्य को सामने लाती हैं जिसने बहुत कुछ खोया लेकिन जीवन से अपना संबंध नहीं छोड़ा। उसने काम किया। लोगों के साथ जुड़ा। अपने आसपास के जीवन में हिस्सा लिया। फिर भी उसके भीतर शिकारपुर बचा रहा। घर की तलाश का कठिन पक्ष शायद यही है कि कभी-कभी मनुष्य उस जगह तक पहुँच जाता है, जहाँ उसका घर था लेकिन वहाँ अपना पुराना जीवन नहीं  मिलता। तब वह अपनी स्मृति में अपना शहर जीवित बनाए रखता है। और मनुष्य उसे अपने भीतर लेकर चलता है।

नन्द की यात्रा को मैं इसी क्रम में देखती हूँ। प्यास उसे अतीत की ओर खींचती है। तलाश उसे अपने लोगों तक ले जाती है और मुमुक्षा उसे उस प्रश्न के सामने खड़ा करती है जहाँ घर, स्मृति और मुक्ति एक-दूसरे से जुड़ने लगते हैं।

लेखक: जया जादवानी

उपन्यास: इस शहर में इक शहर था

प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन

समीक्षक: कल्पना मनोरमा

मूल्य: ₹250

पृष्ठ: 134



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