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जेनरेशन एक्स की स्त्रियाँ : बदलाव की दहलीज़

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जेनरेशन एक्स की स्त्रियाँ : बदलाव की दहलीज़ बुनियादी चिंतन : बालिका से वामा | स्तंभ 37   हर पीढ़ी अपने समय की संतान होती है। वह अपने युग से केवल जीवन नहीं पाती, बल्कि सोचने के औज़ार भी जुटाती है। समय बदलता है तो जीवन चलाने के ही नहीं, उसके विचारों के औज़ार भी बदलते हैं। यही कारण है कि हर पीढ़ी दुनिया को एक अलग दृष्टि से देखती है। अपने जीवन स्रोतों को समझने का प्रयास करती है।     स्त्रियों की जीवन यात्रा में यह परिवर्तन और भी गहरा दिखाई देता है। भारतीय समाज में एक स्त्री की पहली पाठशाला कोई विद्यालय नहीं, दूसरी स्त्री होती है। वह जन्म लेते ही अपनी माँ, दादी, नानी, बुआ, मौसी और अपने आसपास की स्त्रियों को देखना, सुनना और पढ़ना शुरू कर देती है। बोलना सीखने से बहुत पहले वह जीना सीख रही होती है। वह देख रही होती है कि एक स्त्री कैसे हँसती है, कैसे चुप रहती है, कैसे निर्णय लेती है, कैसे अपने हिस्से का दुःख सहती है और अपने हिस्से का सम्मान बचाती है। इस अर्थ में हर स्त्री,चाहे या न चाहे, अगली पीढ़ी की स्त्री का अपने नजरिए का निर्माण कर रही होती है। इसीलिए किसी भी समाज म...