जेनरेशन एक्स की स्त्रियाँ : बदलाव की दहलीज़



जेनरेशन एक्स की स्त्रियाँ : बदलाव की दहलीज़
बुनियादी चिंतन : बालिका से वामा | स्तंभ 37

  हर पीढ़ी अपने समय की संतान होती है। वह अपने युग से केवल जीवन नहीं पाती, बल्कि सोचने के औज़ार भी जुटाती है। समय बदलता है तो जीवन चलाने के ही नहीं, उसके विचारों के औज़ार भी बदलते हैं। यही कारण है कि हर पीढ़ी दुनिया को एक अलग दृष्टि से देखती है। अपने जीवन स्रोतों को समझने का प्रयास करती है।

    स्त्रियों की जीवन यात्रा में यह परिवर्तन और भी गहरा दिखाई देता है। भारतीय समाज में एक स्त्री की पहली पाठशाला कोई विद्यालय नहीं, दूसरी स्त्री होती है। वह जन्म लेते ही अपनी माँ, दादी, नानी, बुआ, मौसी और अपने आसपास की स्त्रियों को देखना, सुनना और पढ़ना शुरू कर देती है। बोलना सीखने से बहुत पहले वह जीना सीख रही होती है। वह देख रही होती है कि एक स्त्री कैसे हँसती है, कैसे चुप रहती है, कैसे निर्णय लेती है, कैसे अपने हिस्से का दुःख सहती है और अपने हिस्से का सम्मान बचाती है। इस अर्थ में हर स्त्री,चाहे या न चाहे, अगली पीढ़ी की स्त्री का अपने नजरिए का निर्माण कर रही होती है। इसीलिए किसी भी समाज में स्त्री का विकास केवल उसका निजी विकास नहीं होता, वह आने वाले समय की चेतना का विकास भी होता है।

   यदि हम इस दृष्टि से देखें तो जेनरेशन एक्स, लगभग 1965 से 1980 के बीच जन्मी स्त्रियाँ, भारतीय समाज की सबसे महत्त्वपूर्ण संक्रमणकालीन पीढ़ी के रूप में दिखाई देती हैं। वे ऐसे समय में बड़ी हुईं जब एक ही घर में दो युग साथ जीवनयापन कर रहे थे। उनकी माँएँ, दादियां, नानियां प्रायः बूमर पीढ़ी से थीं, जिनकी दुनिया परंपराओं, पारिवारिक अनुभवों और मौखिक संस्कारों से निर्मित हुई थी। बेटियाँ ऐसे समय में बड़ी हो रही थीं जहाँ शिक्षा, पुस्तकें, विश्वविद्यालय, पत्र-पत्रिकाएँ और बदलती सामाजिक चेतना धीरे-धीरे उनके सामने एक नया संसार खोल रही थीं। एक स्मृतियों के, दूसरा संभावनाओं के रास्ते खोज रही थीं।

   यही वह दहलीज़ थी जहाँ स्त्री ने पहली बार केवल जीवन जीना नहीं, अपने जीवन को समझना भी शुरू किया। उसने अपनी इच्छाओं को पहचानना शुरू किया, अपने विचारों को स्वर दिया और अपनी दलील के लिए समाज से नहीं, जीवन में अपना वैध स्पेस माँगना शुरू किया। पहली बार उसने यह महसूस किया कि उसका होना केवल दूसरों की परिभाषाओं से नहीं, उसकी अपनी चेतना से तय होना चाहिए।

  संक्रमण के उस दौर की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि स्त्री की परिधि पहली बार घर की दीवारों से बाहर फैलने लगी। यह विस्तार अचानक नहीं आया और न ही किसी एक घटना का परिणाम था। यह धीरे-धीरे हुआ। शिक्षा ने उसके लिए द्वार खोले, पर उन द्वारों से होकर भीतर विचारों का प्रकाश पुस्तकों, पत्र-पत्रिकाओं, अख़बारों, पुस्तकालयों, रेडियो, दूरदर्शन और विश्वविद्यालयों के माध्यम से पहुँचा। पहली बार उसे अपने घर से बाहर के समाज को देखने का अवसर मिला।

उसने केवल समाचार नहीं पढ़े, उसने समाज को पढ़ना शुरू किया। उसने केवल उपन्यास नहीं पढ़े, उसने अपने जीवन के बिखरे हुए अनुभवों को उनमें पहचानना शुरू किया। जब उसने कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी, उषा प्रियंवदा, मृदुला गर्ग और अन्य लेखिकाओं को पढ़ा, तब उसे लगा कि उसके मन में उठने वाले प्रश्न केवल उसके घर के नहीं हैं। कहीं और भी कोई स्त्री इन्हीं प्रश्नों से जूझ रही है। यही इस पीढ़ी की सबसे बड़ी उपलब्धि थी। उसने जानकारी नहीं, दृष्टि अर्जित की। पहली बार स्त्री को यह बोध हुआ कि उसका अनुभव भी विचार का विषय हो सकता है। उसने जाना कि चुप्पी भी एक सामाजिक संरचना हो सकती है और प्रश्न करना असम्मान नहीं, बल्कि चेतना का पहला संकेत है। यही वह क्षण था, जब उसकी दुनिया का आकार बदलना शुरू हुआ।

   स्त्रियों ने डायरियां लिखना शुरू किया। रेडियो सुनना शुरू किया। क्योंकि दृष्टि का विस्तार केवल पढ़ लेने से नहीं होता। विस्तार तब होता है, जब पढ़ा हुआ जीवन से संवाद करने लगे। जेनरेशन एक्स की स्त्रियों के साथ यही हुआ। वे जो कुछ पढ़ रही थीं, उसे अपने घरों, संबंधों और अनुभवों के भीतर परख भी रही थीं। उन्हें पहली बार यह महसूस हुआ कि परंपरा का सम्मान और परंपरा पर प्रश्न, दोनों साथ-साथ संभव हैं। यही स्त्री की वैचारिक परिपक्वता की शुरुआत थी। यह वह समय था जब घरों में धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, सरिता, कादम्बिनी, नवनीत जैसी पत्रिकाएँ आने लगी थीं। अख़बार केवल पुरुषों के हाथों तक सीमित नहीं रहे। पुस्तकालयों में युवतियों की उपस्थिति बढ़ने लगी। रेडियो और दूरदर्शन ने देश के दूसरे हिस्सों के जीवन से परिचय कराया। विश्वविद्यालयों ने संवाद, बहस और असहमति की संस्कृति से परिचित कराया। यह सब मिलकर स्त्री के भीतर एक नई वैचारिक भूमि तैयार कर रहे थे।

यह कहना अतिशयोक्ति होगी कि इन माध्यमों ने स्त्री को बदल दिया। पर इतना अवश्य कहा जा सकता है कि उन्होंने उसके भीतर पहले से जन्म ले रहे प्रश्नों को दिशा दी। स्त्री ने पहली बार यह समझना शुरू किया कि उसका जीवन केवल निजी अनुभव नहीं, एक व्यापक सामाजिक संरचना का हिस्सा है। इसी बोध ने जेनरेशन एक्स की स्त्री ने अपनी बेटियों के लिए उस संसार की कल्पना करने का साहस दिया, जिसे वह स्वयं पूरी तरह जी नहीं सकी थीं।

यहीं आकर जेनरेशन एक्स की स्त्रियाँ केवल एक पीढ़ी नहीं रह जातीं, वे एक सेतु बन जाती हैं। एक ओर उनकी माँएँ थीं, जिन्होंने जीवन को सहनशीलता और कर्तव्य के धरातल पर जिया। दूसरी ओर उनकी बेटियाँ थीं, जो आत्मविश्वास, अधिकार और विकल्पों की भाषा सीख रही थीं। इन दोनों के बीच खड़ी स्त्री को दो संसारों का संतुलन साधना था। उसने अपनी माँ का सम्मान भी बचाए रखा और अपनी बेटी के लिए नए रास्ते भी खोले। इस पीढ़ी की स्त्रियों ने अपने जीवन से अधिक अपनी संतानों के जीवन के बारे में सोचा। उसे  समझ आ गया था कि विरासत केवल ज़मीन-जायदाद या गहनों की नहीं होती, विरासत दृष्टि की भी होती है। 

    एक बच्ची अपनी माँ को प्रश्न करते, पढ़ते, सीखते और अपने विचारों पर टिके रहते देखेगी, तो उसके भीतर भी वैसी ही चेतना अंकुरित होगी। यदि वह अपनी माँ को केवल समझौते करते देखेगी, तो समझौता भी उसके लिए विरासत बन जाएगा। समाज की पहली पाठशाला स्त्री है, इसलिए अगली स्त्री के निर्माण की पहली नैतिक जिम्मेदारी भी उसी की है। एक चैतन्य स्त्री केवल अपना जीवन नहीं बदलती, वह आने वाले समय की चेतना को आकार देती है। यही जेनरेशन एक्स की सबसे बड़ी ऐतिहासिक भूमिका थी।

हर पीढ़ी इतिहास में अपने पीछे कोई न कोई विरासत छोड़ जाती है। जेनरेशन एक्स की स्त्रियों ने भी छोड़ी, लेकिन उनकी विरासत ईंट-पत्थर की नहीं, विचारों की थी। उन्होंने अपनी बेटियों को केवल पढ़ने के लिए नहीं कहा,  उन्होंने पढ़ने का वातावरण बनाया। उन्होंने केवल आत्मनिर्भर बनने का उपदेश नहीं दिया, अपनी अधूरी इच्छाओं के बीच भी अगली पीढ़ी के लिए संभावनाओं का द्वार खुला रखा। वे स्वयं पूरी तरह मुक्त नहीं थीं, लेकिन अपनी संतानों को उतना बंधा हुआ नहीं रहने दिया, जितना वे स्वयं रहीं।

आज जब हम नई पीढ़ी की आत्मविश्वासी लड़कियों को देखते हैं, तो उनके पीछे इस संक्रमणकालीन पीढ़ी का मौन श्रम दिखाई देता है। उन्होंने अपने हिस्से की झिझक, संकोच, अपराधबोध और संघर्षों को पूरी तरह समाप्त नहीं किया, पर उन्हें अगली पीढ़ी का भाग्य भी नहीं बनने दिया। यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। एक सजग स्त्री केवल अपने जीवन का निर्णय नहीं करती, वह आने वाली पीढ़ियों की चेतना का भी निर्माण करती है। इसलिए प्रत्येक स्त्री को स्वयं से एक प्रश्न अवश्य पूछना चाहिए, मैं अपनी बच्ची को क्या दे रही हूँ? केवल संस्कार, या विचार भी? केवल सुरक्षा, या प्रश्न करने का साहस भी? क्योंकि समय बदलता है, समाज बदलता है, साधन बदलते हैं, पर एक चैतन्य स्त्री की दृष्टि ही वह विरासत है, जो हर युग में अगली "वामा" को जन्म देती है।

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