मन की आँखें
मन की आँखें दशहरे की छुट्टियाँ पड़ रही थीं। सेंट मेरी स्कूल की पाँचवीं कक्षा के बच्चे शैक्षिक भ्रमण पर अजमेर जाने वाले थे। स्कूल में यात्रा के लिए नाम लिखे जा रहे थे। जब कक्षा अध्यापक ने हार्दिक और उसके छोटे भाई आभार से पूछा कि कौन जाना चाहता है, तो आभार ने तुरंत सिर हिला दिया। “सर, मुझे इतिहास बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। आप भैया को ही ले जाइए। उन्हें पुराने किले और राजाओं की कहानियाँ बहुत पसंद हैं।” बच्चे खिलखिलाकर हँस पड़े। हार्दिक भी मुस्करा दिया। दादी ने जब से पृथ्वीराज चौहान की कहानी सुनाई थी, तब से वह अजमेर जाने का सपना देख रहा था। आखिर वह दिन आ ही गया। बस अरावली की पहाड़ियों के बीच से धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी। बस में बच्चों की हँसी-ठिठोली गूँज रही थी। खिड़की के पास बैठा हार्दिक बाहर के दृश्य निहार रहा था। तभी उसकी नज़र दूर एक पहाड़ी पर बने प्राचीन किले पर पड़ी। उसे...