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Showing posts from June 16, 2026

मन की आँखें

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                                                     मन की आँखें दशहरे की छुट्टियाँ पड़ रही थीं। सेंट मेरी स्कूल की पाँचवीं कक्षा के बच्चे शैक्षिक भ्रमण पर अजमेर जाने वाले थे। स्कूल में यात्रा के लिए नाम लिखे जा रहे थे। जब कक्षा अध्यापक ने हार्दिक और उसके छोटे भाई आभार से पूछा कि कौन जाना चाहता है, तो आभार ने तुरंत सिर हिला दिया। “सर, मुझे इतिहास बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। आप भैया को ही ले जाइए। उन्हें पुराने किले और राजाओं की कहानियाँ बहुत पसंद हैं।” बच्चे खिलखिलाकर हँस पड़े। हार्दिक भी मुस्करा दिया। दादी ने जब से पृथ्वीराज चौहान की कहानी सुनाई थी, तब से वह अजमेर जाने का सपना देख रहा था। आखिर वह दिन आ ही गया।    बस अरावली की पहाड़ियों के बीच से धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी। बस में बच्चों की हँसी-ठिठोली गूँज रही थी। खिड़की के पास बैठा हार्दिक बाहर के दृश्य निहार रहा था। तभी उसकी नज़र दूर एक पहाड़ी पर बने प्राचीन किले पर पड़ी। उसे...

हरा समंदर (बाल भारती के ताज़ा अंक में)

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                              हरा समंदर  परेल की शिरोडकर चॉल में धीरे-धीरे सुबह उतर रही थी। पंछी आसमान की सैर पर निकल पड़े थे। अँधेरे की चादर अभी पूरी तरह फटी भी नहीं थी कि किसी ने गली का नलका खोल दिया। पानी की धार बाल्टी में गिरी और चहल-पहल शुरू हो गई। उस दिन रविवार था। किसी को भी कहीं जाने की जल्दी नहीं थी। सिवाय गोपी की माँ के। गोपी सो रहा था। बाहर की आवाज़ें धीरे-धीरे उसकी नींद के किनारों को थपकने लगी थीं। गोपी के पापा अख़बार पढ़ रहे थे। पढ़ते-पढ़ते उनकी नज़र एक खबर पर ठहर गई। समुद्र के बारे में लिखा था। लिखा था, “आने वाले सालों में मुंबई के कुछ किनारे पानी में समा सकते हैं।” पापा कुछ देर स्तब्ध रह गए। खबर को बार-बार पढ़ते रहे फिर अख़बार मोड़कर रख दिया। उनके मन में एक ही बात बार-बार उठ रही थी... कि वे बहुत दिनों से गोपी को समुद्र दिखाने की बात टालते आ रहे थे। कहीं...! नहीं नहीं, आज ले जाऊँगा। उन्होंने पत्नी को आवाज़ लगाई, “मीना, आज गोपी को समुद्र दिखा लाएँ क्या?” रसोई से माँ की आवाज़ आई, “साथ...