हरा समंदर (बाल भारती के ताज़ा अंक में)
हरा समंदर
परेल की शिरोडकर चॉल में धीरे-धीरे सुबह उतर रही थी। पंछी आसमान की सैर पर निकल पड़े थे। अँधेरे की चादर अभी पूरी तरह फटी भी नहीं थी कि किसी ने गली का नलका खोल दिया। पानी की धार बाल्टी में गिरी और चहल-पहल शुरू हो गई। उस दिन रविवार था। किसी को भी कहीं जाने की जल्दी नहीं थी। सिवाय गोपी की माँ के।
गोपी सो रहा था। बाहर की आवाज़ें धीरे-धीरे उसकी नींद के किनारों को थपकने लगी थीं।
गोपी के पापा अख़बार पढ़ रहे थे। पढ़ते-पढ़ते उनकी नज़र एक खबर पर ठहर गई। समुद्र के बारे में लिखा था। लिखा था, “आने वाले सालों में मुंबई के कुछ किनारे पानी में समा सकते हैं।”
पापा कुछ देर स्तब्ध रह गए। खबर को बार-बार पढ़ते रहे फिर अख़बार मोड़कर रख दिया। उनके मन में एक ही बात बार-बार उठ रही थी... कि वे बहुत दिनों से गोपी को समुद्र दिखाने की बात टालते आ रहे थे। कहीं...! नहीं नहीं, आज ले जाऊँगा।
उन्होंने पत्नी को आवाज़ लगाई, “मीना, आज गोपी को समुद्र दिखा लाएँ क्या?”
रसोई से माँ की आवाज़ आई, “साथ में एलिफेंटा गुफाएँ भी दिखा देना।”
“तुम नहीं चलोगी?” पापा ने पूछा।
“मेरी छुट्टी नहीं है।”
“आज तो इतवार है।”
“हाँ, लेकिन आज मजदूरों की मीटिंग है।”
“उद्देश्य क्या? छुट्टी वाले दिन भी?”
“जीवन से प्लास्टिक हटाओ!”
“अरे! कहाँ हटेगी प्लास्टिक... फिजूल बात।”
“जो भी हो, मुझे जाना है।”
पापा कुछ पल चुप रहे, फिर बोले, “अच्छा ठीक है, गोपी को जल्दी से उठा दो। बस निकलूँगा।”
मम्मी बरामदे की ओर मुड़ी ही थीं, देखा गोपी आँखें मलता हुआ उठकर आया। जैसे ही उसे पता चला कि वह समुद्र देखने जा रहा है, नींद गायब हो गई। वह जल्दी-जल्दी तैयार होने लगा।
उस दिन थोड़ी ही देर में गोपी तैयार हो गया।
माँ ने नाश्ते के दो डिब्बे तैयार किए। एक में पोहे, दूसरे में आलू का पराँठा और आम का अचार। गोपी ने पानी की बोतल अपने पिट्ठू में रख ली। माँ ने कहा, “डायरी और पेन भी रख लो। जो भी देखो, लिखकर लाना।”
गोपी ने मुस्कुराकर सिर हिलाया।
कुछ ही देर में गोपी गेटवे ऑफ इंडिया पहुँच गया। मुंबई की शान सामने विशाल दरवाज़ा खड़ा था। कबूतरों के उड़ते झुंड देखकर गोपी को अजीब-सा लगा।
फोटोग्राफर लोगों की तस्वीरें खींच रहे थे। कुछ लोग नावों की तरफ जा रहे थे। पापा ने एक दुकान से दो टोपियाँ खरीदीं। गोपी ने टोपी पहनकर फोटो खिंचवाई। गोपी बहुत खुश था।
जल्दी ही पापा और गोपी समुद्र के किनारे पहुँचे। कुछ लोग दरिया दरिया कह रहे थे। गोपी ने दरिया का मतलब पापा से पूछा।
“समुद्र को ही दरिया कहते हैं लोग।” पापा ने कहा।
समुद्र की लहरें किनारे से टकराकर आवाज़ कर रही थीं। धूप में पानी चमक रहा था, जैसे छोटे-छोटे सितारे बिखरे हों।
एलिफेंटा गुफाओं तक जाने के लिए उन्हें फेरी पकड़नी थी। पापा कुछ सोच ही रहे थे कि गोपी ने उत्साह से कहा, “हम ग्रीन वाली फेरी में चलें?”
“ठीक है,” पापा ने मुस्कुराकर कहा।
फेरी में बैठते ही गोपी का मन अजीब-सा होने लगा। कभी उसे डर लगता, कभी खुशी। फेरी पानी को चीरते हुए आगे बढ़ रही थी। ऊपर सफेद समुद्री पक्षी मँडरा रहे थे।
“पापा, ये पक्षी हमारा पीछा क्यों कर रहे हैं?” गोपी ने पूछा।
पापा हँसे, “शायद इन्हें पता है कि तुम खाने का डिब्बा लेकर आए हो।”
गोपी ने तुरंत अपने बैग की पकड़ मजबूत कर ली। पास बैठे लोग मुस्कुरा पड़े।
कुछ देर बाद उसने फिर पूछा, “अगर मैं समुद्र में गिर जाऊँ तो?”
पापा ने शांत स्वर में कहा, “ऐसा नहीं होगा। मैं तुम्हें पकड़े रहूँगा। और वहाँ देखो, मछुआरे हैं। वे भी मदद करेंगे। फेरी में बचाव के छल्ले भी होते हैं।”
गोपी ने राहत की साँस ली।
समुद्र की हवा में नमक और मछली की गंध थी।
फेरी से उतरते ही गोपी को लगा जैसे वह किसी अलग दुनिया में आ गया है। पेड़ों की छाँव, बंदरों की उछल-कूद और ऊपर जाती सीढ़ियाँ उसका स्वागत कर रही थीं। गुफाओं के भीतर पत्थर की मूर्तियाँ देखकर वह देर तक खड़ा रहा।
गोपी ने देखा कि विशाल पत्थर के खंभे पूरी गुफा को थामे खड़े हैं। उसने पापा से पूछा, “समुद्र के बीच टापू कैसे बन जाते हैं?”
पापा प्रश्नों के उत्तर देते हुए थक रहे थे। उन्होंने कहा, “अपनी टीचर से पूछना।”
गोपी झेंप गया। पर उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि इतने बड़े-बड़े पत्थरों को काटकर यह गुफा बनाई कैसे गई होगी।
“पापा, क्या ये मूर्तियाँ सचमुच पत्थर की हैं?” उसने आश्चर्य से पूछा।
पापा मुस्कुराए, “नहीं, प्लास्टिक की।”
“नहीं पापा, ये पत्थर की हैं।”
गोपी ने फिर कोई प्रश्न पूछा। पापा झुँझलाने को हुए, लेकिन उन्हें मम्मी की बात याद आ गई, “अकेले जा तो रहे हो, गोपी प्रश्न बहुत पूछता है। उसके सवालों का जवाब देते रहना।”
पापा ने उसे लाई चना का पैकेट पकड़ा दिया। सोचा, कुछ कम बोलेगा।
लेकिन गुफा से निकलते ही गोपी ने कहा, “क्या हम समुद्र के किसी मशहूर बीच पर चल सकते हैं?”
पापा ने थोड़ी देर सोचा, फिर बोले, “चल सकते हैं।”
गोपी और पापा चौपाटी बीच पहुँचे। वहाँ का माहौल अलग था। बच्चे दौड़ रहे थे, पतंगें उड़ा रहे थे और खाने की खुशबू हवा में घुली थी।
गोपी ने जूते उतारे और रेत पर दौड़ पड़ा। कुछ देर बाद वह पापा के पास आया और बोला, “पानी दूर से हरा और पास से भूरा क्यों लगता है?”
पापा ने कहा, “पानी का अपना रंग नहीं होता। वह आसमान का रंग चुरा लेता है।”
गोपी ने ध्यान से समुद्र को देखा। फिर रेत का घर बनाने लगा। एक लहर आई और उसका घर बहा ले गई। उसी के साथ एक छोटी मछली गड्ढे में रह गई।
“पापा...” वह घबराया।
“डरो मत, अगली लहर उसे ले जाएगी।”
पापा ने बोला ही था कि सचमुच अगली लहर मछली को बहा ले गई। गोपी ने राहत की साँस ली।
उसी समय उसकी नज़र किनारे पर पड़े एक सफेद समुद्री पक्षी पर पड़ी। वह उड़ने की कोशिश कर रहा था, लेकिन बार-बार गिर रहा था।
“पापा, वो पक्षी उड़ क्यों नहीं रहा?” गोपी ने पूछा।
दोनों उसके पास गए। पापा ने ध्यान से देखा। पक्षी के पैर में प्लास्टिक की पतली पन्नी फँसी थी।
गोपी घुटनों के बल बैठ गया।
“क्या इसे दर्द हो रहा होगा पापा?”
“हाँ शायद, अगर तुमने न देखा होता तो मर भी सकता था।”
पापा जल्दी से एक नारियलवाले से छोटी-सी कैंची ले आए। फिर सावधानी से पन्नी को काटकर अलग किया।
कुछ देर पक्षी वहीं बैठा रहा। फिर पंख फड़फड़ाकर समुद्र के ऊपर उड़ गया।
“सिर्फ इतनी-सी प्लास्टिक की पन्नी...?”
“समुद्र में लाखों जीव रहते हैं। प्लास्टिक उनके लिए जाल बन गई है। कभी वे फँस जाते हैं, कभी खाना समझकर निगल लेते हैं।” पापा बोले।
गोपी रेत पर पड़े प्लास्टिक और पन्नियाँ उठाने लगा। उसे कुछ अलग लग रहा था।
गोपी को बीच की सफाई करते देख पापा गुनगुनाने लगे, “हरा समुंदर गोपी चंदर...”
गोपी हँस पड़ा, “पूरा गीत सुनाओ न, पापा।”
“मुझे नहीं आता। दादी सुनाती थीं मेरे बचपन में। गाँव चलेंगे तो उनसे सुनना। चलो अब घर चलते हैं।”
समुद्र का रंग बदल रहा था। पहले सुनहरा, फिर धुँधला। शहर की रोशनियाँ जल उठी थीं।
पापा थके-थके लोकल में बैठे थे लेकिन गोपी के मन में ढेर सारी बातें तूफ़ान की तरह हलचल मचाए थीं। कब वह घर पहुँचे और कब मम्मी को सब बताकर मन का डिब्बा खाली कर ले।
घर लौटकर रात में गोपी जब माँ के पास लेटा, मम्मी उससे पूछने लगीं।
“मम्मी, आज हमने एक पक्षी को बचाया।”
माँ ने मुस्कुराकर पूछा, “कैसे?”
गोपी ने पूरी घटना बता दी।
फिर कुछ देर चुप रहकर बोला,
“मम्मी, अगर लोग प्लास्टिक समुद्र में फेंकते रहे तो क्या मछलियाँ और पक्षी मर जाएँगे?”
“कई बार ऐसा होता है,” माँ ने कहा, “इसीलिए हम लोगों को समझाने की कोशिश करते हैं।”
गोपी कुछ देर सोचता रहा। फिर उसे सुबह वाली खबर याद आई, जो रास्ते में पापा ने बताई थी।
“और अगर समुद्र बढ़ता गया तो? क्या चौपाटी डूब जाएगी? क्या एलिफेंटा भी पानी में चली जाएगी?”
माँ ने उसके सिर पर हाथ फेरा।
“अगर हम प्रकृति का ध्यान नहीं रखेंगे तो बहुत-सी जगहों को खतरा हो सकता है। लेकिन अगर लोग मिलकर काम करें, प्रदूषण कम करें और समुद्र को साफ रखें, तो बहुत कुछ बचाया जा सकता है।”
गोपी की आँखों के सामने समुद्र की लहरें, छोटी मछली और उड़ता हुआ वह पक्षी तैरने लगे।
माँ ने उसे अपने पास खींच लिया। थोड़ी देर में गोपी सो गया।
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