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Showing posts with the label बाल कथा

तीन सहेलियाँ

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                    तीन सहेलियाँ बरगद के बड़े-से पेड़ की जड़ों में चींटियों का एक बड़ा-सा नगर बसा था। सूरज की पहली किरण पड़ते ही वहाँ चहल-पहल शुरू हो जाती। कोई भोजन की खोज में निकल पड़ता, कोई बच्चों की देखभाल में लग जाता, तो कोई नए रास्ते खोजने में जुट जाता। उसी नगर में तीन सहेलियाँ रहती थीं। लाली, काली और गोरी। लाली बहुत फुर्तीली थी। उसे दूर-दूर तक जाकर दाने खोजने में मज़ा आता था। काली समझदार थी, मगर धीरे-धीरे चलती थी। चलते समय वह गंध की एक पतली-सी लकीर छोड़ती जाती, ताकि पीछे आने वाली चींटियाँ, चाहे कितनी भी थकी हों, रास्ता न भूलें। गोरी धैर्यवान थी। वह भारी-से-भारी सामान को भी सावधानी से घर तक पहुँचाने में माहिर थी। एक सुबह तीनों भोजन की तलाश में निकलीं। बाग में पेड़-पौधे हवा में डोल रहे थे। ओस से भीगी घास धूप में चमक रही थी। तभी लाली की नज़र गेहूँ के एक बड़े दाने पर पड़ी। उसने खुशी से आवाज़ लगाई, "देखो, देखो! मुझे क्या मिला!" गोरी दौड़ती हुई वहाँ पहुँची और दाने को देखकर दंग रह गई। "इतना बड़ा दाना! इसे कौन ले जा सकता ह...

टिनी का सपना

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                   टिनी का सपना     टिनी एक चंचल और प्यारी बच्ची थी। उसे कल्पनाओं की दुनिया में खोए रहना बहुत पसंद था। वह कहानियाँ सुनते-सुनते खाना खाती और कभी-कभी अपने विचारों में इतनी खो जाती कि आसपास की बातें भी भूल जाती। उसकी छोटी-छोटी शरारतें घर के सभी लोगों को बहुत भाती थीं। टिनी का कमरा रंग-बिरंगी तितलियों की तस्वीरों और खिलौनों से सजा हुआ था।   एक रात उसकी नानी ने उसे सुनहरी परी और उसकी पालतू तितली की कहानी सुनाई। उस तितली के पंखों पर हीरे जड़े थे, जो सूरज की रोशनी में इंद्रधनुष की तरह चमकते थे। परीलोक का वर्णन सुनकर टिनी मंत्रमुग्ध हो गई। सबसे अधिक उसे हीरे-जड़े पंखों वाली तितली की बातें अच्छी लगीं। उस दिन उसने नानी से दूसरी कहानी सुनाने की जिद भी नहीं की। कहानी समाप्त होते ही नानी अपने कमरे में चली गईं और टिनी धीरे-धीरे नींद की गोद में खो गई। नींद में उसने एक अद्भुत सपना देखा। वह परीलोक पहुँच गई थी। वहाँ सब कुछ चमक रहा था। परी कहीं बाहर गई हुई थी, लेकिन महल के दरवाज़े पर चमचमाते पंखों वाली त...

मन की आँखें

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                                                     मन की आँखें दशहरे की छुट्टियाँ पड़ रही थीं। सेंट मेरी स्कूल की पाँचवीं कक्षा के बच्चे शैक्षिक भ्रमण पर अजमेर जाने वाले थे। स्कूल में यात्रा के लिए नाम लिखे जा रहे थे। जब कक्षा अध्यापक ने हार्दिक और उसके छोटे भाई आभार से पूछा कि कौन जाना चाहता है, तो आभार ने तुरंत सिर हिला दिया। “सर, मुझे इतिहास बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। आप भैया को ही ले जाइए। उन्हें पुराने किले और राजाओं की कहानियाँ बहुत पसंद हैं।” बच्चे खिलखिलाकर हँस पड़े। हार्दिक भी मुस्करा दिया। दादी ने जब से पृथ्वीराज चौहान की कहानी सुनाई थी, तब से वह अजमेर जाने का सपना देख रहा था। आखिर वह दिन आ ही गया।    बस अरावली की पहाड़ियों के बीच से धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी। बस में बच्चों की हँसी-ठिठोली गूँज रही थी। खिड़की के पास बैठा हार्दिक बाहर के दृश्य निहार रहा था। तभी उसकी नज़र दूर एक पहाड़ी पर बने प्राचीन किले पर पड़ी। उसे...

हरा समंदर (बाल भारती के ताज़ा अंक में)

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                              हरा समंदर  परेल की शिरोडकर चॉल में धीरे-धीरे सुबह उतर रही थी। पंछी आसमान की सैर पर निकल पड़े थे। अँधेरे की चादर अभी पूरी तरह फटी भी नहीं थी कि किसी ने गली का नलका खोल दिया। पानी की धार बाल्टी में गिरी और चहल-पहल शुरू हो गई। उस दिन रविवार था। किसी को भी कहीं जाने की जल्दी नहीं थी। सिवाय गोपी की माँ के। गोपी सो रहा था। बाहर की आवाज़ें धीरे-धीरे उसकी नींद के किनारों को थपकने लगी थीं। गोपी के पापा अख़बार पढ़ रहे थे। पढ़ते-पढ़ते उनकी नज़र एक खबर पर ठहर गई। समुद्र के बारे में लिखा था। लिखा था, “आने वाले सालों में मुंबई के कुछ किनारे पानी में समा सकते हैं।” पापा कुछ देर स्तब्ध रह गए। खबर को बार-बार पढ़ते रहे फिर अख़बार मोड़कर रख दिया। उनके मन में एक ही बात बार-बार उठ रही थी... कि वे बहुत दिनों से गोपी को समुद्र दिखाने की बात टालते आ रहे थे। कहीं...! नहीं नहीं, आज ले जाऊँगा। उन्होंने पत्नी को आवाज़ लगाई, “मीना, आज गोपी को समुद्र दिखा लाएँ क्या?” रसोई से माँ की आवाज़ आई, “साथ...